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मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

आज फिर से किताबें पूछेंगी

' I have a pack of memories.......'
                          - Anne Sexton

धीरे - धीरे उतर रही है यात्रा की थकान। इस बीच कितनी जगहों पर कितनी - कितनी सवारियों में घूम आया। अब अपने घोंसले में कुछ समय दुबक कर रहना है। धीरे - धीरे सम पर आ रही दिनचर्या। धीरे - धीरे चीजें पकड़ में आ रही हैं। कितना - कितना काम पड़ा है। मौसम है कि रोज नए - नए करतब दिखा रहा है। कस्बे से दो किलोमीटर दूर गाँव में रहता हूँ। अपना रहवास राष्टीय राजमार्ग के लगभग किनारे पर है। दिन भर आवाजाही की धमक रहती है। मौसम के बदलते मिजाज में कल सुबह जब दुकान तक गया तो  हर तरहफ कोहरा ही कोहरा था , घना  , बरसता हुआ कोहरा। ऐसे में सावधानी पूर्वक सड़क पार कर घर तक आते हुए , मोबाइल से सड़क  का चित्र उतारते हुए कुछ पंक्तियां जेहन में उतरा आईं , वे  ही साझा हैं यहाँ....


कोहरे में आते - जाते..

आज फिर से तना घना कोहरा
आज से बहुत महीन है घाम।

आज फिर से पलट रहा जाड़ा
आज फिर से हैं सर्द सुबहो शाम।

आज से है अनमना - सा मन
आज फिर से हैं सब अधूरे काम।

आज फिर से उसे भुलाना है
आज फिर से रहेंगे हम नाकाम।

आज फिर से किताबें पूछेंगी
आज फिर से लिखा है किसका नाम?

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

सब कुछ गूगलमय

रात लगभग आधी बीत ही चुकी। लेकिन बात कुछ ऐसी है कि 'रह न जाए बात आधी।' घड़ी का काँटा १२ के डिजिट को विजिट कर  उस पार की यात्रा पर निकल गया। अब तो डेट भी बिना लेट किए करवट बदल ली। २७ की अठ्ठाइस हो चुकी। लेकिन बात तो आज ही  की है; आज ही की  शाम की है.....ये शाम कुछ अजीब थी....

आज शाम एक ताना सुनने को मिला कि मैं बहुत 'कर्री' और लगभग  'गद्द नुमा कवितायें' लिखने लग पड़ा हूँ। प्रोफ़ेसरी अपनी जगै है और कविता अपनी जगै। कविता तो भई वई है जिसमे लय होय, तुक होय और देखने - पढ़ने में एक अच्छी - सी लुक होय। लगे हाथ और बिल्कुल फ़्री में  एक अदद नसीहत भी मिली कि भय्ये  कभी कुछ हल्का-  फुल्का भी लिख लिया करो। ये कोई अच्छी बात तो नहीं है कि हर बखत माथे पर बल पड़ा रवे  और मुस्कुराहट को तरसते चेहरे के पतंग की डोर में थोड़ी ढील न दी जा सके। रात साढ़े नौ- पौने दस बजे कस्बे के एक बौद्धिक जमावड़े से घर की  लौटते हुए कुछ सोचा किया और गूगल के जन्मदिन पर कुछ  कागज पर गेर दिया । वही माल  अब कंपूटर के धरम काँटे पर भी मौजूद है।  ल्यो साब !  अब आपको कैसी लगे  क्या पता  किन्तु - परन्तु -लेकिन मेरी  समझ से जे एक हल्की - फुल्की-सी कवितानुमा  पेशकश.... उससे पहले पूर्वरंग या प्रीफेस..

कलम हाथ से छुट गई , की-बोर्ड माउस हाथ। 
जब देखो तब बना रहे  , कंप्यूटर  का साथ ॥
कंप्यूटर का साथ ,  विराजतिं  इंटरनेट  रानी।
उसी लोक की आज सुनाते , अकथ कहानी ॥
नेट दुनिया में राजते ,  गूगल जी   महाराज ।
सुनो ध्यान से चालू आहे उनका किस्सा आज


सब कुछ गूगलमय

गूगल जी का जन्मदिवस है , हैप्पी बड्डे आज।
इंटरनेट की इस दुनिया में बनें उन्हीं से काज ॥

डे नाइट खिदमत करने में रहें सदा ही तत्पर।
खोज-खाजकर ले आते हैं हर क्वेस्चन का उत्तर॥

देश वेश भाषा और यूजर उनके लिए सब यकसां।
देख - देख कर उनको बिसुरे,  घर का बुद्धू बक्सा॥

कुंजी और किताबों में जो ,  भरी ज्ञान की थाती।
बस एक क्लिक करते ही वह तो पास हमारे आती॥

बच्चे बूढ़े और यंगस्टर्स, हर  इक है   बलिहारी।
जिसको देखो वो ही गाए , गूगल विरद तुम्हारी ॥

जय हो जय हो सचमुच जय हो गूगल जी की जय।
आज तुम्हारे  बड्डे  पर तो  सब कुछ गूगलमय॥






गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बदलो अपना छब - ढब

हुत दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं - कुछ साझा नहीं किया। कुछ व्यस्तता , कुछ मौज, कुछ आलस्य और कुछ बस्स एवें ही। रुटीन आजकल लगभग बँधा - बँधाया है। तीन बजे के आसपास लौटकर लंच का समय लगभ बीत जाने पर लंचन। उसके बाद दोपहर आया हुआ अंग्रेजी का अख़बार उलटते - पुलटते हुए एक झपकी और उठकर  चाय - शाय के साथ कुछ देर पढ़न+ टीवी दर्शन+कंप्य़ूटर पर खटरम - पटरम। इस शगल में कभी कभी साँझ भी घिर आती है तब याद आता है कि चलो थोड़ा घूम आयें। आज भी कुछ इसी क्रम में शाम को यह लिखा गया - कवितानुमा कुछ - कुछ। आइए इसे देखते पढ़ते हैं.....


साँझ की सीख

साँझ हुई अब घर से निकलो
बंद करो जी यह कंप्यूटर
रुकी है बारिश बड़ी देर से
बोल रहे हैं मेंढक टर - टर

गली में ठेला ले आया है
भुट्टे वाला भैया
नाबदान -नाली में बच्चे
चला रहे कागज की नैया

गमक पकौड़ी की नथुनों तक
चली आ रही बिना बुलाए
बाहर निकलो खोज खबर लो
किसने क्या पकवान बनाए

इन्द्रधनुष शायद उग आए
बरस चुका है अच्छा पानी
खेतों का रंग बदल चुका है
धान हुआ है और भी धानी

बाहर कितना दृश्य सुहावन
घर से निकलो  बाबू साहब
हवा बतास लगने दो तन को
अब तो बदलो अपना छब - ढब

सोमवार, 28 मई 2012

चले दिल्ली : शेख चिल्ली

इस समय गर्मी अपने चरम पर है। सही बात है गर्मी अपने चरम पर है तभी तो मौसम खूब गरम है। ऐसे में कहीं जाना मानो वही सब कुछ जिसे शायरी में कहा गया है 'आग का दरिया और डूब के जाना'। फिर जब जाना है तो जाना है , कोई नहीं  बहाना है। झोले में रख दिया गया है सब सामान ; अब  ट्रेन का टिकट भी प्रिन्ट कर लो  हे श्रीमान। सुबह - सुबह नौकरी पर जाना है, वहाँ से लौटकर खाना  खाकर निकल जाना है ; इसलिए आज जल्दी सो जाना है। फिर भी सोने से पहले कवितानुमा जो कुछ है अभी - अभी  लिखा ; उसे सब सहृदय   कविता  प्रेमी  साथियों को तनिक दें दिखा .....

चले दिल्ली : शेख चिल्ली

दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली

डर लागे , लागे डर
काँपे जिया थर - थर
झोले में सामान रखा
गिन कर , चुन कर

सहेजे हैं कागज पत्तर
मानो सोने की सिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली ।

दिल्ली को लेकर बहुत
मन में है आशंका
खो न जाये तूती अपनी
सुनकर नगाड़ा -  डंका

क्या पता टकरा जाए
कोई बिल्ला या बिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली  ।

बेतुका है वक्त यह तो
सीमित है लय व तुक
सिल्ली और बिल्ली में
खत्म सब , गया चुक

दूर है बहुत ही दिल्ली
फिर भी चल पड़े दिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली॥
---


शनिवार, 29 जनवरी 2011

गोया कोई तुक बे-तुक

तमाम फेसबुकिया मित्रों से क्षमा सहित और इसी दुनिया के यायावरों के  लिए आदर और प्यार के साथ एक अतुकान्त तुक.. 

फेसबुक

की-बोर्ड की काया पर
अनवरत - अहर्निश
टिक - टिक टुक- टुक।

खुलती - सी है इक दुनिया
कुछ दौड़ - भाग
कुछ थम - थम रुक- रुक।

उनींदेपन की
पटरियों पर रेंगते
किसी भाप इंजन की
छक - छक  छुक - छुक।

एक दिल है बेचारा
मुहब्बत का मारा
फिर भी
धड़कता है
धीरे - धीरे
धुक - धुक।

अपनी मौज में है
सारा संसार
इत - उत दिखता - छिपता है
दु:ख में सुख- सुख
सुख में दु:ख - दु:ख।

गोया कोई तुक बे-तुक।

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मोबाइल में भिलाई का रावण और कुछ कविताई



इस बार की बिलासपुर - भिलाई यात्रा बहुत संक्षिप्त और भाग - दौड़ वाली रही।यह एक तरह से पाला छूकर लौटना जैसा ही था। इस बार कई वर्षों के बाद दुर्गापूजा और रावण - दहन देख पाया। बच्चॊं ने तो यह सब इतने नजदीक से और निश्चिंत होकर पहली बार देखा। १७ अक्टूबर को सुबह बिलासपुर - चेन्नई सुपरफ़ास्ट से चले । उतरना तो दुर्ग में था लेकिन ट्रेन ने ऐसी मेहमान नवाजी दिखाई कि वह पावर हाउस पर ही रुक गई।सीधे कुशवाहा जी के सेक्टर टू वाले नए निवास पर पहुँचे । पंडित जी काफी देर बाद आए और पूजापाठ शुरु हुई । अपन कुछ देर बैठे , फोन - फान किया तभी पता चला कि बिल्कुल पास में ही हनुमान मंदिर  और छठ तालाब के सामने वाले मैदान में रावण का पुतला खड़ा है। यह जान अपन बेटे अंचल जी को लेकर उनसे मिलने चल दिए। धूप में चुपचाप खड़े रावण से कुछ गपशप की और तस्वीर खींच ली। अंचल जी का मन हुआ  कि वह रावण के साथ फोटो उतरवायेंगे। उनकी यह इच्छा भी पूरी हुई।दोपहर बाद एक बार फिर तस्वीर खींची और शाम को दहन के समय भी। लीजिए इन्हें आप भी देखिए :




धूप में अब हो रही है युद्ध की तैयारी।
शाम को ही  आएगी राम की सवारी।
मरता है , जलता है हर साल रावण, 
फिर भी सुधरती नही दुनिया हमारी।


चलो करें ,दर्शन दशानन का आज।
शाम होते आएगा राम जी का राज।
आज है , दशहरा खूब कर लो  मौज
रोज तो लगा ही रहता है काम काज।



देखो , भीड़ लगी  हर   ओर।
तरह - तरह का उठता शोर।
रंग - रंग  की  अतिशबाजी
जनता  सचमुच माँगे मोर !


हुई असत्य पर सत्य की जय।
ऐसे ही अशुभ का होता क्षय ।
खुद के  भीतर  झाँके हम भी ,
ताकि न बिगड़े जीवन - लय!
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पुनश्च : इससे आगे का अहवाल  अगली पोस्ट में...

रविवार, 19 सितंबर 2010

यह भी हो सकता है कि यह कहा जाय कि बारिश तो हुई ही नहीं थी !


कई दिन हुए बारिश है कि रुकने का नाम नही ले रही है। लगातार पानी , पानी और पानी। इधर - उधर, हर तरफ - चारो तरफ जल ही जल । इतनी बरसात भी अच्छी नहीं। अब मन खिन्न - सा होने लगा लगा है। काम पर निकलो तो इतनी तैयारी करनी पड़ती है कि ऐसा लगता है मानो लाम पर जा रहे हों। बाहर से लौटो तो सब कुछ गीला, सीला। सड़कों पर पानी के बीच अवाजाही करते - करते, लगभग सूने - से बाजार में खरीदारी करते अब बहुत अजीब - सा लगने लगा है। यह कोई एक दिन की बात हो तो इसे देख - समझ - झेल लिया जाय लेकिन पिछले कई दिनों से ( अब तो महीना भर होने जा रहा है ) बारिश - बादल का राग सुहा नहीं रहा है। किताबें खोलो या फिर उनके रखने की जगह की ओर देखो तो लगता है बारिश को लेकर / बारिश पर इतना कुछ जो लिखा गया है वह कितना सच है या कितना झूठ यह तो अलग ही किस्म का मसला है लेकिन यह जरूर ध्यान में आता है कि इनके लिखने वाले क्या सचमुच इसी दुनिया में रहते थे या कि इसी दुनिया में रहते हैं?

इस मौसम में यह भी एक अजीब - सी बात कि पिछले तीन दिन से डाकिया लगातार आ रहा है। कोई चिठ्ठी नहीं , कोई पत्री नही ..बस पत्रिकायें और अखबार लेकर। और बारिश है रुकने का नाम नहीं ले रही है....

आज इस गीले - सीले मौसम में कुछ यूँ ही कवितानुमा लिखा है। आइए देखते - पढ़ते हैं:
०१- पत्र

आज बहुत दिनों बाद डाकिया दिखाई दिया।
उसके कपड़े बदल गए थे। मैंने सोचा कि उसे रोककर कुछ सवाल पूछूँ । मसलन :

१- तुम्हारी खाकी वर्दी कहीं फट तो नहीं गई?
२- तुम्हारे घर में चोर तो नहीं घुस आए थे?
३- डाकखाने वालों ने कटौती तो नहीं शुरू कर दी।
४-कपड़ा मिल की हड़ताल अभी चल रही है क्या?
५- तुम्हारी नौकरी तो नहीं चली गई?

( यह सब सोचा लेकिन पूछा कुछ और ही )

- मेरी कोई डाक है क्या?
'आज इतवार है!' डाकिए ने कहा और उसकी साईकिल हवा से बातें करने लगी।

मुझे याद आया यूँ टहलना बहुत हुआ।
अब घर चलना चाहिए। कुछ जरूरी फोन करने हैं।

****

०२- बारिश
बारिश के बाद सब कुछ धुल गया था।
धूल , धुआँ , गर्द ..सब कुछ...।
कहीं और चला गया था वह सब जिसकी अब कोई दरकार नहीं थी।

क्या पता यह सब अपने आप हुआ था या कि इसके लिए किसी ने कोई कोशिश की थी। यह भी हो सकता है कि यह कोशिश, अगर सचमुच हुई थी तो; किसी अकेले की नहीं बल्कि एक से अधिक लोगों की रही हो। 'वे' दो भी हो सकते हैं और दो सौ या दो हजार भी। दुनिया की किसी भी भाषा में एक से अधिक जितनी भी संख्यायें हो सकती हैं उन सबका यहाँ पर अनुमान किया जा सकता है। यह भी हो सकता है कि उन 'एक से अधिक' लोगों की तस्वीर बनाई जा सकती है। उन पर कोई किताब लिखी जा सकती है या कोई स्मारक बनाकर उन सबको अमरत्व प्रदान किया जा सकता है। उन सबका कोई 'दिवस' तय किया जा सकता है। होने को कुछ भी हो सकता है। संभावनाओं की कोई कमी नहीं नहीं।

यह भी हो सकता है कि यह कहा जाय कि बारिश तो हुई ही नहीं थी।

क्या आपको गिनती आती है?
यदि हाँ , तो गिनते रहिए।

संभावनायें कभी खत्म नहीं होतीं।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

धूप में खड़ा है धान


* आज बहुत दिनों के बाद ब्लाग पर सीधे / आनलाइन कुछ यँ ही लिख - सा दिया है। अब यह कविता है तो ठीक ! नहीं है तो भी ठीक !  क्या करूँ 'कवित विवेक एक नहिं मोरे..'  घर से जहाँ तक निगाह जाती है बस  धान के हरे भरे खेत..उनके पार जंगल का हरापन और दूर क्षितिज पर झाँकते पहाड़ों का नीलापन । हर ओर रंग ही रंग हैं ..फिर भी ..कभी कबार दबे पाँव दुबक कर  चला ही आता है उदासी का एकाध टुकड़ा...।
* अब मैं  और क्या कहूँ? आप ही देखें.... अपन तो कंप्यूटर जी को बा - बाय कर चले अपने काम पर...


स्वगत

धूप में खड़ा है धान
हरियाया।
छाँह में छिपता हूँ मैं
घबराया।

खेतों में पसरा है
चहुँओर
काहिया हरापन
और इधर इस ठौर
बस रंगहीन - रसहीन
एक चित्रण

लगता है
अपना ही दु:ख
सर्वाधिक गहराया।

ऊपर सूरज का तेज
नीचे मिट्टी नर्म - नम
फिर भी क्यों चुभते हैं
तलवों में
अनदेखे काँटे हरदम

चलो उदासी को
आज झुठलायें
खिल जाये मन कमल
मुरझाया।

धूप में खड़ा है धान
हरियाया।
छाँह में छिपता हूँ मैं
घबराया।

बुधवार, 21 जुलाई 2010

राइम्स इन द रेन


* आज झमाझम , नहीं ..नहीं मूसलाधार बारिश का तीसरा दिन है। इतवार की शाम पाँच बजे से जो तेज बारिश शुरू हुई थी वह आज शाम पाँच बजे के आसपास बंद - सी  हुई है। बंद क्या हुई है , इसे स्थगित होना या थमना जैसा कह सकते हैं। आज शाम को थोड़ी देर के लिए धूप भी निकली , फिर जल्द ही गायब हो गई। लगा कि पेंसिल स्केच जैसे दीखने वाले पहाड़ों के ऊपर क्षितिज पर सहसा कोई इन्द्रधनुष उदित होगा किन्तु ऐसा न हुआ। शाम हुई , धीरे - धीरे अँधियारा उतरना आरंभ हुआ और आसमान में बादलों की ओट से चाँद झाँकने लगा । पश्चिम में एक चमकीला तारा भी दिखाई दिया जिसका भला - सा नाम है।...और सहसा बादलों का घनापन बढ़ने लगा और चाँद - तारा दोनो गायब। अभी बारिश नहीं हो रही है , होनी भी नहीं चाहिए। पिछले तीन दिनों में इतना पानी बरसा है कि निचले क्षेत्रों में बाढ़ आ गई है। जिधर देखिए जल ही जल है।

 * इन तीन दिनों में बारिश को दूर चले जाने की हिदायत देने के लिए बार - बार बच्चों की किताबों में लिखी नर्सरी राइम - 'रेन रेन गो अवे, कम अगेन एनदर डे'  की याद आती रही। पता नहीं नर्सरी राइम्स कौन ,कैसे  बनाता होगा पर बारिश को दूर चले जाने की मनुहार के सिलसिले में 'रेन रेन गो अवे' की खूब याद आई और घर में बारिश में बंद होकर झींकने - खीझने- कलपने के बजाय हमने अपने परिवार में ही खूब मौज की क्योंकि जलभराव के कारण बच्चों का स्कूल बंद है। खाने - पीने की फरमाइशों और उनके सुस्वादु प्रस्तुतीकरण का दौर चल रहा है। इसी मौज में तीन नर्सरी राइम्स बन गई हैं जो एक तरह से बारिश को दूर चले जाने की मनुहार के मूड में ही लिखी गई हैं क्योंकि घर के पास वाले बूढ़े आम के पेड़ पर बैठने - बोलने वाली कोयल बारिश में गायब है और मेंढकों की कर्कश आवाज सुनाई देने लगी है, सड़क घूमने वाले छुट्टा जानवर भी कहीं दुबके पड़े हैं।  आप इन राइम्स को  देखें - पढ़ें -गुनगुनायें। वैसे ये इस अकेले नाचीज के  मौजपने  की उपज नहीं हैं बल्कि बिटिया हिमानी, बेटे अंचल और शैल का महत्वपूर्ण योगदान भी इसमें शामिल है। वैसे भी , सबको पता है कि अंग्रेजी में अपना हाथ बहुत तंग है। खैर , हमारे साथ बारिश से दूर चले जाने यानि 'रेन - रेन गो अवे' की तर्ज पर तैयार  की गईं राइमनुमा इन तीन अभिव्यक्तियों का अंग्रेजी में ही आनंद लीजिए ।आज इस बारिश के मौसम में अनुवाद का काम बंद है :




थ्री राइम्स इन द रेन
(Three Rhymes in the Rain )

01-

Cuckoo –cuckoo
come along.
I want to sing
a lovely song.

Let’s compare
who is sweet.
If you win
give me a treat.

02-

Rain - rain
leave the plain.

Go away
up the hillock.
Where is grazing
a bumpy bullock.

03-

Froggy – froggy
keep quite.
Why are you croaking
all the night?

Go to bed
bid good night.
Otherwise I ‘m
coming to fight.

सोमवार, 12 जुलाई 2010

ब्लागिंग की बनती दुनिया में बड़े - बड़े लिक्खाड़ पड़े हैं


यह शुद्ध मौज है। एक घरेलू मस्ती। चार दीवारों और एक छत के नीचे ऊष्मा बिखेरती एक आम चुहल। इसी चुहल से बनी रहती है घर के बीच चहल - पहल। अंचल जी ( क्लास फ़ोर्थ - बी) ने कल शाम को जब आम का चित्र बनाया और उसके नीचे पोएम लिखने की बात कही तो ..कुछ हमने कही ..; कुछ उसने कही .. और मिल - मिलाकर पोएम बन ही गई। आज अभी जब शाम हो रही है , अंचल जी अपना होमवर्क कर रहे हैं, बिटिया नींद का आनंद ले रही है , शैल हल्की फुल्की झपकी के बाद अंचल जी का होमवर्क चेक कर रही  हैं और अपन कंप्यूटर जी पर खटर - पटर कर रहा हूँ तो मन हुआ कि कुछ तुक मिला  लिया जाय। तो , मिले तुक मेरा तुम्हारा..आइए देखें आम और अमरूद के साथ एक आनलाइन आशुकविता या कवितानुमा कविता  का नज्जारा...




आम और अमरूद के बहाने...

अंचल जी ने चित्र बनाया
एक अमरूद और एक आम
बीच में लिख दी कविता छोटी
यह तो हो गया अच्छा काम।

कंप्यूटर पर करता रहता
मैं तो खटर - पटर अविराम।
थोड़ा लिखता ज्यादा पढ़ता
मचता अंतर में कोहराम।

पर क्या बच्चों की खातिर भी
लिखता हूँ कोई अच्छी चीज?
सोच सोचकर मन झुँझलाता
खुद पर आती अक्सर खीज।

पर अब यह सोचा है मैंने
लिखना है बच्चों की खातिर।
उनसे ही जग में रौनक है
वर्ना तो यह दुनिया शातिर।

अंचल जी की फल महिमा ने
भीतर के कवि को उकसाया ।
तभी तो मैंने आज प्रेम से
तुक से तुक को है भिड़वाया।

कविता क्या है मैं क्या जानूँ!
बच्चों में कविता दिखती है।
बस इसलिए लेखनी अक्सर
अपने घर पर कुछ लिखती है।

ब्लागिंग की बनती  दुनिया में
बड़े - बड़े लिक्खाड़ पड़े हैं।
हम तो हल्का - फुल्का लिखकर
कोने में चुपचाप खड़े हैं।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

नहीं चाहिए हमको ब्लॉग ! बिल में ही गाना है राग !


* आज जुलाई माह की पहली तारीख है। आज से स्कूल री-ओपेन। छूट्टी खतम। मस्ती खतम। पढ़ाई चालू। सुबह जल्दी उठो। जल्दी से रेडी -शेडी। स्कूल को निकलो। टाटा - बाय। थके हारे आओ। कुछ खाओ - पीओ। थोड़ा रेस्ट। शाम को थोड़ी खेल - कूद। फिर होमवर्क , असाइनमेंट, प्रोजेक्ट एस्सेट्रा। थोड़ी देर टीवी - गेम। खाना। चलो जल्दी सो जाओ। सुबह जल्दी उठना है । स्कूल जाना है.....ओके..गुड नाइट.....

** सचमुच बच्चों के पास कितना काम है। और (अब) कितना कम आराम है। छुट्टियाँ क्या खत्म हुईं। बच्चों की मौज खत्म हो गई। खैर, फिर छुट्टियाँ आयेंगी - बहारें फिर से छायेंगीं। फिर से जी भर टाम - जेरी देखने के दिन आयेंगे।

*** अक्सर मुझे लगता है बच्चों के लिए प्राय: कुछ नहीं लिख पाता हूँ। आज यूँ ही शाम को जब बच्चे डिनर के बाद टीवी देख रहे थे और शैल किचन में कुछ कर रही थीं तब बैठे - बैठे कुछ लिख मारा। तीनों को सुनाया और जब लिखा हुआ पास हो गया तब सबके साथ साझा करने के उद्देश्य से 'कर्मनाशा' के पन्नों पर प्रस्तुत कर रहा हूँ । आप इसे चाहे जो समझें - एक कविता  / कवितानुमा मस्ती या फिर बाल कविता :


बिल में ही गाना है राग !


चूहे जी ने ब्लॉग बनाया।
तरह- तरह से उसे सजाया।

प्रोफ़ाइल बढ़िया दे मारा
चित्र लगाया प्यारा - प्यारा।

पहली पोस्ट लगाई अच्छी।
कविता एक सीधी और सच्ची।

उसमें अपना हृदय उँड़ेला।
लगने लगा टिप्पणी -मेला।

कहा किसी ने 'अच्छी रचना'।
'नाइस' कह कोई चाहे पढ़ना ।

'उत्तम' , 'बढ़िया' , 'अद्भुत' , 'अच्छा'।
बना प्रशंसक बूढ़ा - बच्चा।

फ़ालोअर्स की लगी कतार।
सबने खूब लुटाया प्यार।

लिंक लगे जब चारो ओर।
'चूहा -ब्लॉग ' का मच गया शोर।

चर्चाकारों ने अपनाया।
टीप - टीप कर मान बढ़ाया।

बिल्ली जी तक पहँची बात।
लैपटाप पर फ़ेरा फिर  हाथ।

आकर टीपा 'म्याऊँ - म्याऊँ'।
डर कर चूहा चला बदाय़ूँ।

बोला यह दुनिया अनजानी ।
बाय - बाय टाटा बिल्ली रानी।

नहीं चाहिए हमको ब्लॉग !
बिल में ही गाना है राग !

सोमवार, 15 मार्च 2010

एक पक्षी के साथ सुबह


* आज की सुबह एक पक्षी के साथ हुई। अपनी बैठक का परदा जब धीरे से सरकाया तो खिड़की के बाहर गमले का निरीक्षण करते हुए एक पाखी को पाया। रूप - रंग का क्या करूं बखान ! कमरे के भीतर से ही मोबाइल से खींची गईं दो तस्वीरें हाजिर हैं श्रीमान !
*मन में आया है अभी कुछ - कुछ...कविता या कवितानुमा कोई चीज...आइए देख - पढ़ लेते हैं..



किस चिड़िया का नाम

मुझे पता नहीं इस चिड़िया का नाम
मैं यह भी नहीं जानता
कि पक्षी विज्ञान है किस चिड़िया का नाम।
बस इसे देखा तो
'सुन्दर' शब्द के कई पर्यायवाची याद आ गए
- जैसे : रमणीय, मोहक , अभिराम ...

जल्दी से उसे बुलाया
और एक सुन्दर संसार से
साक्षात्कार कराने का सुख पाया।

बच्चे अभी नींद में थे
इस दुनिया के कोलाहल से दूर
उनके सपनों में तैर रहे थे
इस दुनिया को
सुन्दर बनाने वाले खग -मृग - पुष्प।

बाहर चढ़ रही थी धूप
शुरू कर दिया था सबने अपना कामकाज
हम खुश थे
दिख गया था कुछ नया - नया आज।



'सुबह उठने के कितने फायदे हैं'
कानों पड़ा एक स्वर
यह उलाहना भी थी और सेहत के लिए सीख भी
ओह !
तो ऐसी ही अभिव्यक्तियों को
'कान्ता सम्मित उपदेश' कहते हैं संस्कृत के काव्याचार्य !

प्यारे पाखी ! जो भी है तुम्हारा नाम
ऐसे ही रोज आ जाओ
और हर दिन मेरी सुबह में नए - नए रंग भर जाओ।

बुधवार, 20 जनवरी 2010

वसंतागम और 'सब्जी है उपहार प्रकृति का'

शिशिर का हुआ नहीं अन्त
कह रही है तिथि कि आ गया वसन्त !

अभी कुछ देर पहले एक कार्यक्रम से लौटा हूँ। सरस्वती पूजा , वसन्त पंचमी और निराला जयन्ती को लेकर कस्बे में एक आयोजन था जिसमें बहुत कुछ सुनने को मिला। आज सुबह का अख़बार भी ' सखि वसन्त आया' की पंक्ति लेकर नमूदार हुआ था। सुना है , पढ़ा है कि वसन्त आ गया है लेकिन इतनी भयंकर शीत है यकीन नहीं हो रहा है उसके आगमन का। जाड़े की वार्षिक छुट्टियों का आज आखिरी दिन है। इस बीच लगभग दो सप्ताह तक घर में खूब मौज रही। कुछ लिखना पढ़ना भी हो ही गया लेकिन बाकी तो मौजा ही मौजा। अभी १६ जनवरी को बेटे अंचल जी का 'हैप्पी बर्थडे' था सो खूब मस्ती हुई और इसी में वह कविता जैसा कुछ बन गया जो इससे ठीक पहले की पोस्ट के रूप में आप सबके साथा साझा किया गया। बेटा और बेटी की शिकायत थी कि मम्मी के लिए तो कविता लिख दी लेकिन हमारे लिए कुछ नहीं लिखा। हमने कहा कि लो जी, अभी लिख देते हैं जब ठंड में सारी दुनिया सो राही है तो हमरे भीतर का 'कबी' जाग रहा है और कल शाम को एक तुकबन्दी - सी हो गई। आज दोपहर में उसे टाइप भी कर लिया और अब जबकि रात घिरने जा रही है ,सर्दी की रंगत रंग ला रही है और लोगबाग वसन्त की अगवानी में अपनी अभिव्यक्ति कर रहे हैं तब सारी चीजों को दरकिनार करते हुए बेटे अंचल जी के लिए लिखी एक कविता साझा कर रहा हूँ। अंचल जी ने इसी महीने की १६ तारीख को अपना जन्मदिवस मनाया है और वे क्लास थी -बी में पढ़ते हैं। सब्जी तो वे खाते हैं लेकिन कम - कम।उनसे कहा गया है कि अगर लम्बाई बढ़ानी है तो सब्जी खूब खाओ। तो आइए देखिए पढ़िए यह कविता:


सब्जी खाओ अंचल भाई !

सब्जी से बढ़ती लम्बाई।
सब्जी खाओ अंचल भाई।

देखो ये जाड़े के दिन हैं
सब्जी की है आमद भारी।
मंडी कितनी हरी - भरी है
सजी - धजी है तर- तरकारी।

तुम यह याद हमेशा रखना
सब्जी से मिलती गरमाई।

सब्जी में तो गुण अनेक हैं
पौष्टिकता है इनमें सारी ।
तन्दुरुस्त तन सब्जी रखती
दूर रहे इनसे बीमारी।

तुमको बहुत बड़ा है बनना
ऊँची रखनी है ऊँचाई।

तुम तो एक अच्छे बच्चे हो
खाते गोभी मूली शलजम।
पालक से परहेज नहीं है
मेथी बथुआ भाए हरदम।

सब्जी है उपहार प्रकृति का
खाओ इसे और करो पढ़ाई।

सब्जी से बढ़ती लम्बाई।
सब्जी खाओ अंचल भाई।
________

* इस सीरीज की एक किश्त बाकी है बिटिया के लिए कुछ लिखना है वह भी जल्द ही
* क्या लिखा जाय ?

शनिवार, 16 जनवरी 2010

विबग्योर बिखराए प्रेम का यह प्रिज्म


छंदबद्ध, लयबद्ध व तुकान्त कविताओं के लिए मेरे मन में बहुत आदर का भाव है किन्तु जबरदस्ती की तुकमिलावन और त्वरित तुकबन्दी को पढ़ने - गढ़ने के लिए मेरे पास न तो समय है और न जगह। आज यूँ ही फरमाइश पर कुछ लिख रहा था और जब उसका पहला ड्राफ़्ट घर में सुनाया तो हाय - हाय मच गई। सुझाव पर सुझाव कि तुम तो वही लिखो जो तुम्हें लिखना आता है , यह सब तुक - वुक बिल्कुल नहीं सुहाता है। मैं ने कहा क्या करूँ कभी - कभी चुनौती के रूप में लिया गया काम गले पड़ जाता है और अच्छा भला आदमी 'कबी जी' बन जाता है। आज सर्दी चरम पर है। अपनी तो हालत यह है कि रजाई में तसव्वुरे जानां किए औंधे पड़े हैं और मूँगफलियों पर प्यार उमड़ रहा है। आज बच्चों ने भी स्कूल से बंक मार ली किन्तु कोई है जो इस भयंकर ठंड में भी पूरे कुनबे के लिए कुछ न कुछ किए जा रहा है। उसे कभी तीन शब्दों से बना वह छोटा - सा वाक्य नहीं कहा जो पिछली शताब्दी में इस पृथ्वी पर शायद सबसे अधिक बार बोला गया होगा। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया तरह - तरह की चीजें सामने ला रही हैं। एक बनते हुए संसार में हम सब अपने - अपने स्तर पर योगदान कर रहे हैं और अभिव्यक्ति के भंडार को भर रहे हैं। पता नही मेरी यह अभिव्यक्ति कैसी है! किन्तु पूरा यकीन दिलाता हूँ कि इसमें जबरदस्ती की तुकमिलावन और त्वरित तुकबन्दी तो बिल्कुल नहीं है। यह वही चीज है जिसे मैं अपनी भाषा की तमीज में 'ब्लाग कविता' कहता हूँ। तो आइए देखिए , पढ़िए यह ब्लाग कविता आई मीन एक सीरियस ब्लाग कविता :


लिरिकल रिफ़्लेक्शंस

तू मेरी पेचकस मैं अदना सा स्क्रू
आई लव आई लव आई लव यू।

करती नहीं तुम कभी भी इफ़ आर बट
वैसे हममें भी अक्सर होती है झंझट
अपना यह घर जैसे कोई वर्कशाप है
बच्चे हमारे हैं ये छोटे- छोटे नट ।

विबग्योर बिखराए प्रेम का यह प्रिज्म
बनी रहे दुनिया यह गुड नाइस न्यू।
आई लव आई लव आई लव यू।
**
दुनिया में हर तरह का राग है खटराग भी
बुरी - बुरी साइट्स इसमें अच्छे - अच्छे ब्लाग भी
इसमें ही हँसना है रोना भी इसमें ही
इसमें ही खोजना है जल भी और आग भी।

बात थी मजाक की सीरियस - सी हो गई
चलती रहे गड्डी फारवर्ड एन्ड थ्रू।
आई लव आई लव आई लव यू।

तू मेरी पेचकस मैं अदना सा स्क्रू
आई लव आई लव आई लव यू।
-------
चित्र परिचय : कोई भी मौसम हो ये कबूतर अपने घर पास की दुकान के पास बिजली के तार पर यूँ ही बैठते हैं , अक्सर लम्बी और ऊँची उड़ान के बाद। उन्हें भी तीन शब्दों वाला वही वाक्य !

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

बाज़ार , जाम , कविता.. और ब्लाग कविता जैसी कोई चीज है क्या ?


अपने गाँव से कस्बे तक पहुँच कर बाज़ार को पार करना और कार्यस्थल तक पहुँचना व वहाँ से वापसी ट्रैफिक जाम की वजह से दिनोंदिन एक दुखदायी काम होता जा रहा है। आज से कुछ साल पहले तक इस जगह ऐसा नहीं होता था। लोगबाग कहते हैं अपना कस्बा अब शहर होता जा रहा है , देखो तो बाज़ार में रौनक बढ़ती जा रही है। क्या करूँ इसी बाज़ार से रोजाना गुजरना होता है। पहले तो 'हमारा बजाज' बाज़ार के बीच से बड़ी आसानी से गुजर जाया करता था किन्तु अब जाम की वजह से रुकना ही पड़ता है , एक तरह से रेंगना पड़ता है और इसी जाम की कृपा से 'रौनक' के दर्शन हो जाया करते हैं। जाम में फँसे - फँसे ही अक्सर अगल - बगल के लोगों से जब दुआ - सलाम हो जाती है तो याद अता है कि बहुत दिनों से कहीं की सोशल विजिट नहीं हुई । परसों इसी तह की 'जाममय' स्थिति में नई मोटर साईकिल पर सवार एक पुराने परिचित सज्जन से 'नमस्ते - नमस्ते' हो गई , कुशल क्षेम का समानुपातिक वितरण - सा हो गया और उलाहना भी कि 'कभी घर आओ ना..' और तत्क्षण एक कवितानुमा अभिव्यक्ति नमूदार हो गई -

दिसम्बर की
एक ढलती हुई शाम
लगा हुआ है
बाज़ार में जाम
इसी में , इसी बहाने
हो गई उनसे दुआ सलाम।

ऊपर लिखी पंक्तियों को यदि कविता मान लिया जाय तो जाम में झींकने और बाज़ार की 'रौनक' के बीच रीझने - खीझने के जादू से खुद को बचाते हुए अपने कार्यस्थल और वापसी में अपने घोंसले तक पहुँच जाने के अंतराल के बीच कविता / कवितानुमा चीज ही तो मरहम का काम करती जान पड़ती है नहीं तो तमाम तरह की प्रतिकूलताओं के समानान्तर आत्मीय अनुकूलन कहाँ से मिले ! समझदार लोग कहते हैं कविता एक शरण्य है; जगत और जीवन की तपती रेत में मुग्धता का मायाजाल रचने वाली मरीचिका जैसी छलना ..छलावा। जयशंकर प्रसाद के शब्दों कहें तो - 'ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे - धीरे' जैसा कुछ..। वे सही ही होंगे , समझदार जो हैं लेकिन अपन को अगर मूर्खता के मजे लेने की आदत - सी हो गई है तो क्या करें ! कहा भी गया है - 'सबसे भले हैं मूढ़ जिन्हें न व्यापे जगत गति'।

शाम को घर आया
ऊपर - ऊपर सुरक्षित - साबूत
अंदर से जगह- जगह छिलन - खँरोंचे - खराश।
इसके लिए कोई मलहम नहीं ड्राअर में शायद
कविता की एक छोटी - सी किताब उठाई
चिनचिनाहट कुछ कम हुई
लगा कि यह फर्स्ट एड है कुछ खास।

कविता की किताबों और साहित्य शास्त्र / काव्यशास्त्र की पोथियों में कविता के बनने , बदलने , बिगड़ने और मनुष्यता की अविराम नदी में यूँ ही मंथर गति से बहने के बाबत बहुत कुछ कहा गया है / कहा जाता रहेगा। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में कविताओं की खूब आमद - आमद है और कहीं से यह भी सुनने को मिलने लग पड़ा है कि ब्लाग कविता जैसी कोई चीज है क्या ? इसका उत्तर तो उन लोगों के पास होगा जो इस बनती हुई विधा में सक्रियता और सार्थकता के साथ सतत हस्तक्षेप कर रहे हैं और इस बात पर उनकी निगाह भी होगी जो इस माध्यम का शास्त्र लिख रहे होंगे। अपन को इससे क्या काम? अपन तो अपने में ही गुम। चुपचाप किए जा रहे हैं अपना काम।

कविता क्या है?
क्या पता !
शब्द क्या हैं पता है
शिल्प कैसा?
नो प्राब्लम चलेगा कैसा भी
आओ संवेदना को छुयें
जो होती जा रही है निरन्तर लापता।

फिलहाल तो बाज़ार से रोजाना गुजरते हुए कभी - कभार खरीददार की तरह तथा अक्सर 'बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ' का भाव लिए कस्बे के शहर बनने की प्रक्रिया का साक्षात्कार करते हुए ट्रैफिक जाम को डेवलपमेन्ट के एक 'इंडीकेटर' की तरह ( ! ) देखते - देखते बुधवार की साप्ताहिक बन्दी के कारण बीच बाज़ार से आज अपना चौदह साल पुराना स्कूटर अपेक्षाकृत आसानी से पार कर ले जाना सुखद रहा - अगले छ: दिनों तक याद रहने लायक... और इसी में कुछ कविता या कवितानुमा या ब्लाग कविता जैसी अभिव्यक्तियाँ प्रकट हो गई हैं जिन्हें सबके साथ साझा करने का मन कर रहा है। तो लीजिए :



बाज़ार : कुछ यूँ ही

०१-

बाज़ार तो खुद बाज़ार का भी नहीं !
किसका?
पता नहीं !
फिर भी गर्म है बाज़ार का बाज़ार
ख़ुद का मोल लगाए घूम रहे हैं खरीददार !
और कहते हैं-
बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदर नहीं हूँ
अब आप ही बतायें
क्या मैं सही हूँ?

०२-

इमर्तियाँ छानते
कारीगर को देखकर
रुक गया
चौदह साल पुराना स्कूटर।
अंतस में भर गई मिठास
फिर भी
हाथ न गया
अपने ही पाकेट के पास।
याद आई
इ से इमली
बड़ी ई से ईख
भाव पूछा
तो संख्या की जगह
कानों तक पहुँची कोई चीख।

सोमवार, 21 सितंबर 2009

फिर - फिर यह कविताई !

चलो अब सो जाओ रे भाई !

असरा - पसरा है सन्नाटा देखो रात अधियाई।
चिड़िया - चरगुन सोय रहे हैं सोयें कुकुर -बिलाई।

पर तुम जाग - जागकर भैया करते कौन कमाई ?
उजले कागज को काला कर लिखते कौन लिखाई ?
जिसको तुम कविता कहते हो वह तो तुकम - तुकाई।

जग है , स्याना मारे , ताना तुमको समझ न आई !
यह सब छोड़ो , माया जोड़ो , सीखो कुछ चतुराई ।

समय बीतने पर ना कहियो , हमने ना समझाई !
सिद्धू बाबू ना सुधरोगे , फिर - फिर यह कविताई !

आधी रात उतार पै आई तुमको नींद न आई !
चलो अब सो जाओ रे भाई !

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

एक आनलाईन कबाड़ कविता

भीतर भरा पड़ा है कचरा कबाड़
ऊपर -ऊपर सब कुछ  शानदार.
खाट के नीचे रद्दी   का       अंबार
किताबें पत्रिकायें  पुराने अखबार.

बाहर जाओ तो  झोले झक्कड़ में
आती हैं पढ़ने सुनने लायक चीजें
दुनिया बटोर रही है माल -माया
पर ये बाबूजी तो इनपे ही रीझें.

चलो यह भी एक रंग है दुनिया है
यह भी है एक  निज का  ससार .
खाट के नीचे रद्दी का अंबार
किताबें पत्रिकायें पुराने अखबार.

अभी सुबह के  बजे हैं साढ़े छह
रात कबकी कर चुकी है बाय - बाय.
कम्पूटर कर रहा हूँ खिटर - पिटर
किचन में बन रही है फीकी चाय .

जीवन में बन्द नहीं हुए है छन्द के द्वार
इसीलिए शुरु किया  है कविता का कारोबार.
अब घाटा होय सो होय कोई फिकर नहीं
कबाड़ काम में ऐसा होता ही है यार !

भीतर भरा पड़ा है कचरा कबाड़
ऊपर -ऊपर सब कुछ शानदार.
खाट के नीचे रद्दी का अंबार
किताबें पत्रिकायें पुराने अखबार.

शनिवार, 22 अगस्त 2009

कुत्ता _ बिल्ली डॊट काम@ दिल्ली


१६अगस्तकी दुपहरिया ढलने के क्रम में जब आलस्य और हल्की नींद की खुमारी अपने चरम पर थी तब याद आया कि बहुत दिन हुए बच्चों के लिए कोई कविता नहीं लिखी. ब्लाग और पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कवितायें तथा कवि गोष्ठियों में कविता प्रस्तुतियों की रपटें आदि देखकर बच्चे इस नाचीज को कवि तो मानने लगे हैं लेकिन खुद को यह मलाल जरूर रहता है कि मैं बच्चों के लिए अभी कुछ नहीं लिख पा रहा हूँ. बिटिया छोटी थी तो उसके साथ खेल - तमाशा करते हुए कुछ कवितायें जरूर लिखी थीं. खैर , १६ अगस्त को दो कवितायें बन गईं जिनमें से एक तो यहाँ प्रस्तुत है और दूसरी को किसी पत्रिका के लिए भेजने का मन बन रहा है.प्रस्तुत कविता में बिल्ली और दिल्ली का तुक मिलाने की बड़ी परेशानी पेश आई. पहले 'सोने की किल्ली' था फिर खयाल आया कि आजकल अपने बच्चे जिस तरह की हिन्दी को बरत रहे हैं उसमें 'किल्ली' जैसे शब्दों की कोई जगह शायद नहीं बची है. अत: 'सोने की सिल्ली' कर दिया गया. अब सिल्ली को समझने में भी परेशानी पेश आए तो क्या किया जा सकता है. बताया जा सकता जैसे बर्फ की सिल्ली होती है वैसी कुछ सोने की सिल्ली होती होगी. अब आख्या - व्याख्या बन्द और कविता चालू. तो, अपने बच्चों हिमानी और अंचल के साथ 'कर्मनाशा' के सभी पाठकों के लिए प्रस्तुत है यह कविता -

कुत्ता _ बिल्ली डॊट काम @ दिल्ली

शेरू जी के बड्डे गिफ्ट में
देना है सोने की सिल्ली.
शापिंग करने दिल्ली जायें
सोच रहे हैं कुत्ता - बिल्ली.

बस से जायें या कि ट्रेन से
या फिर कर लें मोटर कार.
भों - भॊं म्याऊँ - म्याऊँ
छिड़ी हुई है एक तकरार .

बकरी बैठी पूँछ हिलाती
देख रही थी झगड़ा भारी.
बोली- चुप हो जाओ कंजूसो !
क्या खाली है जेब तुम्हारी ?

बस भी छोड़ो ट्रेन भी छोड़ो
छोड़ भी तुम मोटर कार .
एयरोप्लेन का टिकट कटाओ
आसमान में उड़ लो यार.

लेकिन उसमें चुप ही रहना
मत करना तुम भों-भों म्याऊँ.
वर्ना होस्टेस उतार ही देगी
जंगल में या बीच बदायूं.

शान्त हुए अब कुत्ता - बिल्ली
चुप होकर जाना है दिल्ली.
शेरू जी के बड्डे गिफ्ट में
देना है सोने की सिल्ली.

( चित्र गूगल सर्च से साभार)

बुधवार, 3 जून 2009

कद्दू की बेल पर तितली का खेल

बदल रही दुनिया बदल रहा संसार।
कीट - पतंगों ने भी बदला घरद्वार।
नई - नई चीजों से नया - नया मेल ।
अद्भुत - अपूर्व है प्रकृति का खेल ।
तितली रानी क्या बदल गया स्वाद?
फूल छोड़ कद्दू की आ गई याद !
गर्मी बहुत है रानी छाँह में जुड़ा लो।
भूख अगर लग जाए पत्तों को खा लो।
बुरा तो नहीं माना खींच लिया चित्र।
तू मेरी दोस्त प्यारी मैं तेरा मित्र ।
यूं ही आती रहो भाता है संग ।
भरती रहो सबके जीवन में रंग ।

शुक्रवार, 29 मई 2009

गरीब रथ : चार अनुभव शब्द चित्र


गर्मियों के दिन हैं -लू , आँधी , अंधड़ , बवंडर वाले. सड़कों के किनारे लगे तरु - विटप -वृक्षों की कतार के बीच धूप में सीझते हुए गुलमुहर और अमलतास अलग से पहचाने जा रहे हैं. यह अवकाश और छुट्टियों का मौसम भी है और यात्राओं का भी. अभी परसों ही सप्ताह भर की लंबी यात्रा के बाद अपने घोंसले में लौटा हूँ. नीचे दिये हुए चार अनुभव शब्द चित्र अगर कुछ - कुछ कविता या कवितानुमा मान लिए जायें तो ये इसी यात्रा बीच कहीं उपजे हैं जिसकी थकान और खुमारी से मुक्त होने में थोड़ी कसर बाकी है. संदर्भ - प्रसंग इन शब्द चित्रों में ही कहीं है - अलग से उसके बारे में क्या लिखा जाय ! तो आइए देखते हैं - गरीब रथ : चार अनुभव शब्द चित्र .....

१-
गाड़ी क्रमांक : २५३५
लखनऊ से बिलासपुर - रायपुर
इधर दसहरी आम की डलिया
उधर धान का कटोरा भरपूर
यात्रा संपन्न हुई बेतरतीब
आते रहे विचार
कुछ अच्छे , कुछ सच्चे , कुछ झूठे ,कुछ अजीब
न कहीं रथ दिखा
न कहीं गरीब.

२-
दो दुनियाओं के बीच
पारदर्शी काँच की पतली कच्ची दीवार
इधर शान्त सुशीतल हवा
निरन्तर नियंत्रित तापमान
उधर धूल - धक्कड़ - अंधड़ - गुबार
फिर भी
दोनो ओर
हा - हाय - हाहाकार.

३-
जय हो !
बलिहारी ! !
क्या ग़ज़ब माया तुम्हारी -
न्यूनतम व्यय में
अधिकतम सुख की खरीददारी
जिसने भी उकेरी यह संकर संज्ञा
रखा यह कुछ भला - सा नाम
उसे नमस्ते
उस पर खीझ भरी रीझ
उसे सलाम.

४-
हमारे समय की
भाषा का
लगभग टटका तेवर
हिन्दी की नई चाल वाली बिन्दी की
चौंधभरी चंचल चमकार
अभिव्यक्ति के रीमिक्स का उदाहरण
कुछ अनूठा - तनिक लाजवाब
गोया आधी नींद - आधा जागरण
गोया आधी हकीकत - आधा ख़्वाब.

(चित्र गूगल सर्च से साभार / यात्रा के अनुभव की कुछ कड़ियाँ और ... क्रमश:....अगली पोस्ट में जारी )