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सोमवार, 4 अगस्त 2014

अत्यल्प है यह आयु , यह देह, यह आँच

इस बीच  अपने इस  ब्लॉग पर निरन्तरता का निर्वाह करने में कुछ कठिनाई , कुछ , व्यस्तता, कुछ आलस्य और कुछ  बस यों ही - सा रहा। इस बीच पढ़ना तो बदस्तूर जारी रहा लेकिन लिखत का काम बहुत कम हुआ।आज एक कविता लिखी है ; उसे साझा करने का मन है। कोशिश रहेगी कि  अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी का  क्रम भंग न हो  और न ही  कोई लम्बा विराम खिंच जाय। सो, आज साझा है ,बहुत दिनों बाद लिखी अपनी एक कविता......


अभी तो यह क्षण

किस टेक पर टिकी है पृथ्वी
क्या पता किस ओट पर उठँगा है आकाश
वह कौन -सी ताकत है पेड़ों के पास
कि वे शान से मुँह चिढ़ा जाते हैं गुरुत्वाकर्षण को ?

यह जरूरी नहीं कि सबको सब पता हो
सोचो, कौन चाहेगा
कि रह्स्यहीन हो जाए सारा कार्य व्यापार
और हम अनवरत देख पायें चीजों के आरपार
अगर उधड़ जाए हर बात का रेशा-रेशा
तो कैसे कहेगा कोई कि बात कुछ बन ही गई।

अभी तो , तुम हो बस तुम
मैं कहाँ हूँ क्या पता ; कौन जाने
अभी तो
एक बात है शब्दहीन
एक लय है तुममें होती हुई विलय
अभी तो
किसी दुनिया में
तुम हो
मैं हूँ
स्वप्न और यथार्थ के संधिस्थल पर थिर।

बहुत कम है एक समूचा जीवन
अत्यल्प है यह आयु , यह देह,  यह आँच
कितनी लघु है तुम्हारी केशराशि तले अलोप हुई वसुधा
हस्तामलक है तुम्हारी चितवन से सहमा व्योम
कुछ नही ; कुछ भी तो नही
अभी तो
अनन्त अशेष असमाप्य अनश्वर है बस यह क्षण।
.............


( चित्रकृति : साइमन रश्फील्ड की पेंटिंग 'लवर्स' / गूगल छवि से साभार)

रविवार, 11 अगस्त 2013

सुबह की कुछ कहानियाँ

'पेड़ों के झुनझुने
बजने लगे ;
लुढ़कती आ रही है
सूरज की लाल गेंद।'
                  -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  ( 'उठ मेरी बेटी सुबह हो गई' कविता से )

सुबह की कुछ कहानियाँ

०१- आज सुबह - सुबह हिन्दी का अख़बार नहीं आया। फीकी चाय कुछ ज्यादा ही फीकी लगी। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि  अख़बार बाँटने वाला वह लड़का नहीं आया जिसका पूरा नाम भी मुझे नहीं मालूम । हो सकता है कल रात तक  अखबार छापने  वालों के पास छपने लायक कोई ख़बर ही न रही हो। यह भी  हो सकता है कि अख़बार बाँटने वाले  वाले लड़के तबीयत खराब हो गई हो। अब जो भी हो , पहली बात को मैं सच होते हुए देखना चाहता हूँ और दूसरी बात की संभावित सच्चाई  को पूरी तरह झूठ साबित करना चाहता हूँ।साथ ही  खुद से सवाल करने से भी बच रहा हूँ  कि कल सुबह मैं किसका इंतजार करूंगा , अख़बार का या कि  उस लड़के का जिसका पूरा नाम भी मुझे नहीं मालूम?

०२-  आज सुबह - सुबह एक कवि ने फोन पर 'नागपंचमी' की ' बहुत - बहुत हार्दिक बधाई' दी। जवाब में मैं  उन्हें  तुरंत कुछ न  बोल सका ; शुक्रिया या 'सेम टु यू' जैसा कुछ भी नहीं। वे  इधर बीच पत्रिकाओं में अपनी कविताओं के छपने की खबर देते रहे , साथ ही हिदायत भी अगर नहीं पढ़ा अब तक तो पढ़ लेना जरूर। उस वक़्त  बस दो चीजें सहसा याद आईं - एक तो गाँव की नागपंचमी जिसे अपन 'पचैंया' कहा करते थे  और दूसरी अज्ञेय की कविता 'साँप'। 'पचैंया' अब स्मृतियों में है और 'साँप' अब किताबों में। कुर्सी पर बैठा- बैठा ध्यान से बुकशेल्फ़ को निरख रहा हूँ। काँच के पल्ले के पार रखी पुरानी डायरी के भीतर  से दो चमकीली आँखें चमक रही हैं।

०३- आज सुबह - सुबह सब्जी बाज़ार की लगभग नियत - नियमित रविवासरीय सैर की। यह दुकानों - फड़ों  पर हरापन सजने का समय होता है और कूड़ागाड़ी की सड़ाँध से साक्षात्कार का भी। मात्र  पचास रुपए में बिक रहे एक किलो प्याज  को जी भर देखा किया। इधर से उधर घूमकर अरबी के पत्ते की खोज की , न मिला आज की छुट्टी के दिन भी । लगता है कि इस बार की बरसात बिना 'रिकवँछ' सेवन किए ही बीत -सी जाएगी। 'रिकवँछ' बूझ रहे हैं न आप? मैं तो महीने भर से बस बूझ - समझ  ही रहा हूँ।

०४- आज सुबह- सुबह कल रात मे फेसबुक साझा किए मेरे स्टेटस पर भाई अजेय ने बाबा मीर के शेर 'आगे किसू के क्या करें, दस्ते तमअ दराज़ / वो हाथ सो गया है, सिरहाने धरे-धरे। ' में आए 'तमअ' शब्द का आशय  / अर्थ जानना चाहा चाहा। बाबा मीर का यह शेर मुझे बहुत पसंद है। 'तमअ' या 'तमा' का अर्थ भी  पता है लेकिन तसदीक के लिए उर्दू - हिन्दी शब्दकोश  में उतरना हुआ। 'लोभ' व /या 'लालच' का अर्थ व्यक्त करने वाले इस शब्द के अन्य समानार्थी शब्दों की अदृश्य उपस्थिति को आज की  कविता के संसार के  आसपास देखकर डर लगता है।

०५- आज सुबह नाश्ते में बासी रोटी + दो मिनट में तैयार हो जाने वाली ताजी  मैगी के साथ  खूब सारे बीजों वाला पियराया  अमरूद और बिल्कुल बिना बीज का टहटह लाल पपीता खाया। रोटी तो  अपनी रोटी है ; उससे कोई सवाल नहीं , शुक्रिया जरूर। मैगी से  क्या पूछूँ ; किस भाषा में पूछूँ समझ नहीं आता पर मेरे अमरूद प्यारे तुम इस पृथ्वी पर तोते, सुग्गे और चिड़िया - चुरगुन की बदौलत  बचे रहोगे। चिड़ियों की उड़ान में तुम्हारे बीज भी शामिल होंगे लेकिन ये तो बताओ पपीते भाई कि बिना बीज तुम  आ कहाँ से रहे हो भला और कितनी दूर तक हमें ले जाओगे ? क्या कहूँ,  मुझे तो चिड़ियों के खिलाफ़ साजिश लगती है तुम्हारे भीतर के बीजों का गायब कर दिया जाना।

** 'बदतमीज़ी बन्द करो
     लालटेनें मन्द करो
     बल्कि बुझा दो इन्हें एकबारगी
     शाम तक लालटेनों में मत फँसाए रखो अपने हाथ
     बल्कि उनसे कुछ गढ़ो हमारे साथ-साथ।'
                   -- भवानी प्रसाद मिश्र ( 'सुबह हो गई है' कविता से ) 
------------
( चित्र : अदिति देवधर की पेंटिंग 'बर्ड्स आन पपाया ट्री' / गूगल छवि से साभार )

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

प्रतिसंसार में कुछ सांसारिक संवाद

इसी संसार में एक बनता हुआ प्रतिसंसार है। कभी - कभी लगता है कि इसे 'बनता हुआ' कहना कहीं खुद को 'बनाना' तो नहीं है ; एक मुहावरे का वाक्य प्रयोग करते हुए स्वयं को भुलावे में रखने जैसा कुछ तो नहीं? अपने आसपास देखता  हूँ तो पाता हूँ कि  नेट ने कुछ लोगों के लिए  एक ऐसा प्रतिसंसार रच दिया है जो हमारे रोजमर्रा के संसार को दूर से देखने का विधान  निर्मित करने के उपक्रम में  सतत संलग्न है। आज  प्रस्तुत हैं इसी  नेट प्रसंग पर कुछ  कथायें, संवाद की शक्ल में....


प्रतिसंसार में कुछ सांसारिक संवाद

 01: मिलन

- सुनो , कुछ बात करते हैं।
- यहाँ ? आमने - सामने?
- तो फिर..!
- घर पहुँचकर बात करते हैं न नेट पर।
- अभी बस्स  चुप रहो और बात करो।
- किया।
- क्या?
- बात , सुना नहीं क्या?
- नहीं।
- तो फिर भाड़ में जाओ।
- गया।
- कहाँ?
- भाड़ में , देखा नहीं क्या?
- नहीं।
- तो क्या करें?
- मिलते हैं न नेट पर।

 02 : साझेदारी

- कल मैंने कुछ शेयर किया था।
- क्या?
- दु:ख।
- किसका?
- अपना।
- किससे?
- खुद से।
- कहाँ?
- नेट पर।

 03 : मित्रता

- हजार से ऊपर हैं मेरे  मित्रों की संख्या
- नेट पर न ?
- हाँ।
- और नेट से बाहर?
- ........
- मुझसे दोस्ती करोगे?
- यह किसी फ़िल्म का नाम है। मैंने देखी थी शायद।
- मुझसे दोस्ती करोगे?
- हाँ, नेट पर।
- और नेट से बाहर?
- .....यह बताउंगा , नेट पर।
--------
(चित्र : जॉर्डन इसिप की पेंटिंग 'लांग शाट' / गूगल छवि से साभार)

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

कर्मनाशा से गुजरते हुए

इस बीच पत्र पत्रिकाओं में मेरे कविता संग्रह ' कर्मनाशा' की कुछ समीक्षायें आई है / आ रही हैं। सही बात है कि इनसे समीक्षाओं से को देखकर  अपने सोचे -सहेजे लिखे को दूसरों के नजरिए से देखने में  मदद अवश्य मिलती है।हिन्दी की लिखने - पढ़ने वालों की बिरादरी में पुस्तक समीक्षायें अमूमन गद्य में ही लिखी जाती है। आज मैं 'कर्मनाशा' की एक समीक्षा जो गद्य से इतर है और कविता के निकट  है , को सबके साथ साझा करना चाह रहा हूँ। वैसे देखा जाय तो यह समीक्षा भी नहीं है ; यह एक आत्मीय की , मित्र की सहज प्रतिक्रिया है ; ऐसे मित्र की से जिसके साथ लंबे समय  पढ़े - पढ़ाये, सोचे - समझे को साझा करते एक उम्र बीत गई है और हम साथ - साथ हैं। यहाँ पर यह भी कहा जा सकता है कि आपसी संवाद को साझा या सार्वजनिक करना कोई  अच्छी बात तो नहीं है।  डा०  प्रकाश चौधरी मेरे मित्र हैं, सखा हैं और फिलहाल गाजियाबाद के एम०एम०एच० कालेज में  फिजिक्स के एसोशिएट प्रोफ़ेसर के रूप में काम कर हैं ।उन्होंने मेरी किताब पर लिखी यह प्रतिक्रिया फेसबुक पर  साझा किया था। मैं तो बस उनकी  साझेदारी के काम को थोड़ा और आग्रसर कर रहा हूँ बस।  डा० प्रकाश लम्बे समय से सहित्य  - संपादन- थिएटर-  संस्कृति- समाज से जुडी़ गतिविधियों में सक्रिय जुड़ाव रखते हैं। आइए, देखते हैं  कविता की किताब की यह एक काव्यात्मक  समीक्षा या काव्य -  प्रतिक्रिया...

कर्मनाशा से गुजरते हुए .....

सरसों के खेत
और नहाती स्त्रियों के
सानिध्य मे
नदी अपवित्र नहीं हो सकती ....
तभी तुम
बचा लाते हो दाज्यू ढूंढती लड़की को
दिल्ली के शिकंजो से.

और हां
वो कांच की खिड़की
पर आंसू की लकीर...
माफ़ करना, लड़की के नहीं
कर्मनाशा के नायक के हैं - तुम्हारे हैं
जो कीमत चुका रहे हैं - कविता कहने की.

स्मृतियों-विस्मृतियों के बीच
बहती तुम्हारी कर्मनाशा
स्वप्निल पहाड़ों, जादुई विस्तारों से
होते हुए
धूल - गंध और गुबार तक .
बहती जरूर है.

चटख धूप में
ढलवां छत पर पसरी बर्फ,
नीले आकाश में
नए गीत लिखते
नुकीले देवदार वृक्ष,
चाय के गिलास से उठती भाप की लय,
धुएं के छल्ले बनाते गोल होंठ,
फिर भला अमलतास
क्यों न दे
तुम्हें भरपूर उर्जा,
कि तुम रचो अपनी कर्मनाशा का भरा-पूरा संसार.
-----
- प्रकाश चौधरी

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

इससे आगे कोई तुक मिलती नहीं

हिन्दी में तरह - तरह के शब्दकोश हैं किन्तु मेरे देखे - सुने में कोई तुक कोश या rhyming dictionary नहीं है। हो सकता है  ऐसा कोई कोश हो भी। छोटे बच्चे जब अपनी किताबों में rhyming words पढ़ते हैं और अपनी नोट्बुक्स में शब्दों की तुक मिलाते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है। लगता है  कि इस असार संसार में कोई चीज निपट अकेली नहीं है। एक चीज के जैसी कोई न कोई चीज दूसरी चीज कहीं न कहीं है जरूर। कविता और तुक का बड़ा ही पुराना रिश्ता रहा है। हो सकता है यह बोलने, सुनने और याद करने की सुन्दरता , माधुर्य और सरलता के कारण  हुआ हो। हिन्दी में आजकल कविता और तुकबंदी  को एक दूसरे का प्राय: विरोधी माना जाता है लेकिन तुक  की अपनी प्रतिष्ठा है, अपनी जगह है  और उसकी खूबसूरती भी  बहुत मायने रखती है; बस इतना जरूर हो कि  यह सहज हो ,सायास नहीं, जबरदस्ती नहीं । कल रात  सोने से पहले कुछ कवितायें, कुछ गीत पढ़े और यूँ ही कुछ लिख - सा लिया। आज सुबह जब उन्हें देखा - पढ़ा तो लगा कि यह  अभिव्यक्ति तुक में हैं। आज के इस बेतुके वक्त में यदि  कहीं कुछ तुक में दिख जाए तो भला - सा लगता है। उम्मीद है कि 'कर्मनाशा' के पाठकों और प्रेमियों को यह ठीकठाक लगे...आइए देखते - पढ़ते हैं ये तीन शीर्षकहीन तुकबंदियाँ... 


बेतुके वक्त में तीन तुकबंदियाँ


01-

खुद की
खुद से कहो

सहो
चुप रहो
भावुकता में बहो

उठो
लहर सी
रेत की दीवार सी ढहो

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
इसलिए
चुप रहो।

02-

हर ओर
शोर

घूम रहे करघे
टूट रही डोर

बे- मौसम
नाच रहे मोर

जो कमजोर
उसी पर
सबका जोर

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
चुरा ले गए
शब्द सारे चोर।

03-

मछली
जल की रानी

जीवन उसका
पानी

तड़प रही बेपानी
जल की रानी

बिक रहा
बोतल में
पानी ही पानी

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
खत्म करो
यह कथा - कहानी।
----
चित्र : शेली ब्याट की पेंटिंग 'डोंट हुक द फिश' / गूगल से साभार।

शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

आज उस साधारण व्यक्ति का जन्मदिन है जिसकी उपलब्धियाँ असाधारण रहीं


आज दो अक्टूबर है। आज गाँधी जयंती है। अभी कुछ ही देर पहले इस अवसर पर आयोजित दो शैक्षिक कार्यक्रमों में शिरकत कर लौटा हूँ। वहाँ वही सब कुछ हुआ जो इस अवसर पर होता है , होता रहा है। हाँ, बच्चे आज के दिन तैयारी करके आते हैं और उनके मुख से कुछ सुनना अच्छा लगता है। आज के दिन बार - बार मैं अपने स्कूली दिनों को याद करता हूँ जब बड़े उत्साह से अपन आज के नारे लगाते थे और कार्यक्रमों में भाग लेते थे थे। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जि जैसे लोग 'भाग' ले रहे हों , एक लगभग रस्म अदायगी जैसा कुछ। खैर, यह दुनिया है यह अपनी ही चाल में चलती है। बस कोशिश यह रहे कि अपनी 'चाल' न बिगड़ने पाये।

आज के दिन अभी मन हुआ कि इस 'छुट्टी' का लाभ लेकर कुछ पढ़ा जाय। एकाध किताबें निकालीं लेकिन यूँ ही पन्ने पलटकर रख दिया और कविताओं की पुरानी डायरी के पन्नों को पलटना शुरू किया। इसमें एक कविता है - 'बापू के प्रति' | यह मेरी पहली कविता है। उस समय मैं क्लास नाइन्थ का विद्यार्थी था। अच्छी तरह याद है कि उस दौर में अपने गाँव से तीन किलोमीटर दूर कस्बे में स्थित इंटर कालेज तक जाने के लिए सड़क नहीं थी ( न ही गाँव में बिजली थी ) और हम लोग धान के खेतों की मेड़ और नहर की पटरी से होकर जाया करते थे। उस साल दो अक्टूबर को सुबह - सुबह पता नही क्यों कुछ ऐसा लगा था कि कुछ न कुछ लिखना चाहिए और जब लिख - सा लिया तो मन हुआ कि इसे सबको सुनाना भी चाहिए। दिन अच्छा था, अच्छा अवसर भी था , स्कूल के कार्यक्रम में मौका भी मिल गया। 'आदरणीय' , 'माननीय' आदि के संबोधन के उपरांत भूमिका स्वरूप केवल एक वाक्य कहा था - "आज उस साधारण व्यक्ति का जन्मदिन है जिसकी उपलब्धियाँ असाधारण रहीं"। उस समय मैं बालक था, जो मन में आया वह बोल दिया। पता नहीं इस वाक्य में ऐसा क्या खास या ठीकठाक था कि प्रिंसिपल साहब व कुछ अध्यापकों ने कहा कि तुम्हें इस साल अंतरवियालयी डिबेट में भाग लेना होगा और जब कविता सुनाई अध्यापकों की यह प्रतिक्रिया थी कि बेटा अभी खूब पढ़ो और कविता कम लिखो। इसके बाद तो डिबेट , नाटक इत्यादि में भाग लेने का जो क्रम जारी हुआ वह विश्वविद्यालय स्तर तक जमकर चला। खूब पढ़ने का क्रम अब भी जारी है और कम लिखने का सिलसिला भी बदस्तूर चल ही रहा है। मैं कविता या कवितानुमा कुछ लिख लेता हूँ। कैसा लिखता हूँ यह तो सुधी पाठक ही बतायेंगे लेकिन आज दो अक्टूबर के बहाने पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया में अपनी 'पहली कविता' साझा करने का मन हो रहा है। तो आइए, इसे देखें - पढ़े :



बापू के प्रति

श्रद्धा के  फूल   चढ़ाता   हूँ,
हे बापू ! कर लो स्वीकार।
एक बार    आओ भारत में ,
फिर से करो इसका उद्धार।

अहिंसा का मार्ग दिखाकर,
हिंसा   को दूर   भगा    दो।
देकर अपनी शिक्षाओं को,
फिर से रामराज्य ला दो।

वैसा  ही प्यार    सिखाओ,
जैसा तुम करते थे प्यार।
भारत बने अहिंसा- परक,
विश्व करे उसका सत्कार।

जिनको सौंपा था काम,
कर   रहे   नहीं कल्याण।
है    चारों   ओर     अँधेरा,
मुश्किल में सबके प्राण।

पुकार रही भारत की जनता,
विश्वास है फिर से आओगे।
आकर   के इस   भारत को,
धरती का स्वर्ग बनाओगे।

बुधवार, 16 दिसंबर 2009

बाज़ार , जाम , कविता.. और ब्लाग कविता जैसी कोई चीज है क्या ?


अपने गाँव से कस्बे तक पहुँच कर बाज़ार को पार करना और कार्यस्थल तक पहुँचना व वहाँ से वापसी ट्रैफिक जाम की वजह से दिनोंदिन एक दुखदायी काम होता जा रहा है। आज से कुछ साल पहले तक इस जगह ऐसा नहीं होता था। लोगबाग कहते हैं अपना कस्बा अब शहर होता जा रहा है , देखो तो बाज़ार में रौनक बढ़ती जा रही है। क्या करूँ इसी बाज़ार से रोजाना गुजरना होता है। पहले तो 'हमारा बजाज' बाज़ार के बीच से बड़ी आसानी से गुजर जाया करता था किन्तु अब जाम की वजह से रुकना ही पड़ता है , एक तरह से रेंगना पड़ता है और इसी जाम की कृपा से 'रौनक' के दर्शन हो जाया करते हैं। जाम में फँसे - फँसे ही अक्सर अगल - बगल के लोगों से जब दुआ - सलाम हो जाती है तो याद अता है कि बहुत दिनों से कहीं की सोशल विजिट नहीं हुई । परसों इसी तह की 'जाममय' स्थिति में नई मोटर साईकिल पर सवार एक पुराने परिचित सज्जन से 'नमस्ते - नमस्ते' हो गई , कुशल क्षेम का समानुपातिक वितरण - सा हो गया और उलाहना भी कि 'कभी घर आओ ना..' और तत्क्षण एक कवितानुमा अभिव्यक्ति नमूदार हो गई -

दिसम्बर की
एक ढलती हुई शाम
लगा हुआ है
बाज़ार में जाम
इसी में , इसी बहाने
हो गई उनसे दुआ सलाम।

ऊपर लिखी पंक्तियों को यदि कविता मान लिया जाय तो जाम में झींकने और बाज़ार की 'रौनक' के बीच रीझने - खीझने के जादू से खुद को बचाते हुए अपने कार्यस्थल और वापसी में अपने घोंसले तक पहुँच जाने के अंतराल के बीच कविता / कवितानुमा चीज ही तो मरहम का काम करती जान पड़ती है नहीं तो तमाम तरह की प्रतिकूलताओं के समानान्तर आत्मीय अनुकूलन कहाँ से मिले ! समझदार लोग कहते हैं कविता एक शरण्य है; जगत और जीवन की तपती रेत में मुग्धता का मायाजाल रचने वाली मरीचिका जैसी छलना ..छलावा। जयशंकर प्रसाद के शब्दों कहें तो - 'ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे - धीरे' जैसा कुछ..। वे सही ही होंगे , समझदार जो हैं लेकिन अपन को अगर मूर्खता के मजे लेने की आदत - सी हो गई है तो क्या करें ! कहा भी गया है - 'सबसे भले हैं मूढ़ जिन्हें न व्यापे जगत गति'।

शाम को घर आया
ऊपर - ऊपर सुरक्षित - साबूत
अंदर से जगह- जगह छिलन - खँरोंचे - खराश।
इसके लिए कोई मलहम नहीं ड्राअर में शायद
कविता की एक छोटी - सी किताब उठाई
चिनचिनाहट कुछ कम हुई
लगा कि यह फर्स्ट एड है कुछ खास।

कविता की किताबों और साहित्य शास्त्र / काव्यशास्त्र की पोथियों में कविता के बनने , बदलने , बिगड़ने और मनुष्यता की अविराम नदी में यूँ ही मंथर गति से बहने के बाबत बहुत कुछ कहा गया है / कहा जाता रहेगा। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में कविताओं की खूब आमद - आमद है और कहीं से यह भी सुनने को मिलने लग पड़ा है कि ब्लाग कविता जैसी कोई चीज है क्या ? इसका उत्तर तो उन लोगों के पास होगा जो इस बनती हुई विधा में सक्रियता और सार्थकता के साथ सतत हस्तक्षेप कर रहे हैं और इस बात पर उनकी निगाह भी होगी जो इस माध्यम का शास्त्र लिख रहे होंगे। अपन को इससे क्या काम? अपन तो अपने में ही गुम। चुपचाप किए जा रहे हैं अपना काम।

कविता क्या है?
क्या पता !
शब्द क्या हैं पता है
शिल्प कैसा?
नो प्राब्लम चलेगा कैसा भी
आओ संवेदना को छुयें
जो होती जा रही है निरन्तर लापता।

फिलहाल तो बाज़ार से रोजाना गुजरते हुए कभी - कभार खरीददार की तरह तथा अक्सर 'बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ' का भाव लिए कस्बे के शहर बनने की प्रक्रिया का साक्षात्कार करते हुए ट्रैफिक जाम को डेवलपमेन्ट के एक 'इंडीकेटर' की तरह ( ! ) देखते - देखते बुधवार की साप्ताहिक बन्दी के कारण बीच बाज़ार से आज अपना चौदह साल पुराना स्कूटर अपेक्षाकृत आसानी से पार कर ले जाना सुखद रहा - अगले छ: दिनों तक याद रहने लायक... और इसी में कुछ कविता या कवितानुमा या ब्लाग कविता जैसी अभिव्यक्तियाँ प्रकट हो गई हैं जिन्हें सबके साथ साझा करने का मन कर रहा है। तो लीजिए :



बाज़ार : कुछ यूँ ही

०१-

बाज़ार तो खुद बाज़ार का भी नहीं !
किसका?
पता नहीं !
फिर भी गर्म है बाज़ार का बाज़ार
ख़ुद का मोल लगाए घूम रहे हैं खरीददार !
और कहते हैं-
बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदर नहीं हूँ
अब आप ही बतायें
क्या मैं सही हूँ?

०२-

इमर्तियाँ छानते
कारीगर को देखकर
रुक गया
चौदह साल पुराना स्कूटर।
अंतस में भर गई मिठास
फिर भी
हाथ न गया
अपने ही पाकेट के पास।
याद आई
इ से इमली
बड़ी ई से ईख
भाव पूछा
तो संख्या की जगह
कानों तक पहुँची कोई चीख।

शनिवार, 17 नवंबर 2007

पहली पहली पाती : सुन मेरे बन्धु ,पढ़ मेरे साथी


कर्मनाशा में सभी का स्वागत है ।

एक अनजानी ,अनचीन्ही -सी नदी का नाम है। देश -दुनिया के नक्शे को खंगालने , थोडा जूम करने पर संभव है कि इसकी निशानदेही का कुछ अनुमान हो जाय लेकिन इसमें दिलचस्पी कोई ठोस वजह तो होनी चाहिए ! यह अपनी कर्मनाशा कोई बड़ी ,वृहद,विशालकाय नदी तो है नहीं , छोटी-पतली-कृशकाय,अपने आप में सिमटी हुई । इसके तट पर न कोई नगर है ,न मंदिर , न कोई मठ न ही अन्य कोई पुण्य स्थल जहां साल -दो साल में कोई मेला -कौतुक लगे । और तो और इसके आजू-बाजू कोई बड़ा कल-कारखाना भी नहीं जिससे निकलने वाला कूड़ा-कचरा इसके `सौन्दर्य ´ को बनाता-बिगाड़ता हो ।

तो कर्मनाशा में है क्या ?इसका जवाब बड़ा सीधा-सा है मामूली चीजों में आखिर होता क्या है ।उनका मामूली होना ही उन्हें खास बनाता है । ऐसा मेरा मानना है । अपने मानने न मानने को साझा करने की चाह है और यह ब्लाग उसी की एक राह है ।

बहुत सारे करम किए
कुछ छोटे ,कुछ बड़े ,कुछ आम,कुछ खास
बुन न सका लाज ढांपने भर को कपड़ा
कातता ही रह गया मन भर कपास ।


खूब सारी मिट्टी गोड़ी
खूब निराई खरपतवार
खूब छींटे किसिम -किसिम के बीज
पर उगा न एक भी बिरवा छतनार ।


फिर भी क्या सब अकारथ
सब बेकार ???