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बुधवार, 12 जनवरी 2011

विमोचन , ब्लॉगर मिलन और आभासी दुनिया का एक सार्वजनिक संसार

09 जनवरी 2011, रविवार का दिन बहुत अच्छा गुजरा। ऐसे समय में जबकि ठंड अपने चरम है व पारा काफी नीचे तक चला जाता है। सुबह , शाम और रात कोहरे के आवरण में डूबी रहती है। सूरज दिखाई नहीं देता ; बस उसके होने का आभास रहस्यमयी रोशनी कराती रहती है तब सुख का सूरज उगे और आभासी दुनिया के  बाशिन्दे एकाएक प्रकट होकर अपनत्व की ऊष्मा बिखेर जायें तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा। कुछ ऐसा ही हुआ 09 जनवरी 2011, रविवार के दिन। आजकल कुहरीली - सर्द सुबह में सबसे पहले मुँह से  राणा जी  लिए  धन्यवाद निकलता है जो अखबार डाल जाते हैं और उसके धन्यवाद - आभार के  लिए तो  दुनिया की किसी भाषा में कोई शब्द ही नहीं है जिसके हाथों से बनी फीकी चाय जीवन में मिठास घोले हुए है। चाय के साथ अखबार 'अमर उजाला' की जुगलबंदी शुरू हुई तो रविवासरीय परिशिष्ट 'जिन्दगी लाइव' तक आते - आते  मन मुदित हो गया क्योंकि वहाँ अपनी एक कविता ' इस ठंड के आगे'  प्रकाशित दीख रही थी। अपने सोचे, गुने , बुने संवेदन को छपे हुए शब्दों के रूप में देखना सुखकर लगा सुबह - सुबह। 


11 बजे से 'मयंक' जी की  दो सद्य प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन या लोकार्पण समारोह था और इसी के साथ  'हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में ब्लॉगिंग की भूमिका' पर चर्चा के निमित्त  'ब्लागर मीट' का आयोजन भी  किया गया था। रात में बाहर से आए साहित्यकारों - ब्लॉगरों ने मिलकर एक कवि गोष्ठी भी की थी जिसमें आमंत्रण तो  था किन्तु ठंड व कुहरे की अधिकता के कारण उसमें शामिल होना संभव न हो सका और गोष्ठी का लाइव आनंद मैंने अपने कंप्यूटर के माध्यम से उठाया था। 'मयंक' जी एक सहृदय व्यक्ति हैं। उनके आमंत्रण पर पर बहुत सारे लोग बाहर से आए  हुए थे जिनको मैंने अब तक  केवल पढ़ा था। हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया के माध्यम से सोच - संवेदना और सहभागिता का जो एक सार्वजनिक संसार निरंतर निर्मित हो रहा है उसके एक साक्षात रूप से यह एक तरह से मेरा लगभग पहला परिचय था। इससे पहले भिलाई , दिल्ली और मेरठ में कई ब्लॉगर मित्रों से  बहुत संक्षेप में मिल चुका हूँ लेकिन आज उनके साथ और उनके बीच दिए गए विषय पर कुछ बात करनी थी , सुननी थी और हिन्दी भाषा व साहित्य के बरक्स ब्लॉगिंग - विमर्श का सहभागी बनना था। छोटे - से कस्बे खटीमा से सटे एक गाँव अमाऊँ में इस तरह का आयोजन एक नई चीज थी।

'मयंक' जी की दो सद्य प्रकाशित पुस्तकों  ' सुख का सूरज ' और ' नन्हें सुमन' का विमोचन - लोकार्पण केवल इस अर्थ में ही  अलग और विलक्षण नहीं कहा जाएगा कि इसका लाइव प्रसारण इंटरनेट के जरिए पूरे विश्व में देखा सुना  गया बल्कि इस अर्थ में भी यह अलग है कि दोनो संग्रहों में प्रकाशित कवितायें हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया से निकली हैं। ब्लॉगिंग को लेकर हमारे नामचीन साहित्यकारों और पत्रिकाओं को प्राय: यह शिकायत रहती है वहाँ गंभीरता नहीं व त्वरित प्रकाशन व आत्मालोचन, आत्म- अनुशासन की शिथिलता के कारण बहुत कुछ अच्छा - स्तरीय नहीं आ पा रहा है। यह बात कुछ सीमा तक ठीक हो सकती है किन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि संचार के साधनों की सहज उपलब्धता व सूचना के समान वितरण  की प्रक्रिया ने बहुत सारे लोगों को अपनी संवेदना व सोच को साझा करने का एक मंच ब्लॉगिंग के माध्यम से उपलब्ध कराया है। हिन्दी में यह बहुत पुराना भी नहीं है और संख्या व परिमाण की दृष्टि से विश्व की अन्य भाषाओं के मुकाबले बहुत समृद्ध भी नहीं है फिर भी नई शताब्दी में  नई चाल  में ढलती हुई (नई) हिन्दी की नब्ज को पकड़ने और साहित्य की विपुल थाती को सहेजने, उसका दस्तावेजीकरण करने की दिशा में ब्लॉगिंग की बहुत बड़ी भूमिका है। इस नजरिए से ब्लॉगिंग मुझे एक गंभीर सांस्कृतिक कर्म लगता है और उसमें किया जाने वाला योगदान 'निज भाषा' की उन्नति की दिशा में एक सतत प्रयास की तरह दिखाई देता है जिसका प्रतिफल आज और अभी पा लेना शायद बहुत जल्दबाजी होगी।

'सुख का सूरज'  'और  'नन्हें सुमन' का लोकार्पण रचनाकार के घर पर उनके माता - पिता और परिवारजनों , इष्ट मित्रों की उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता  पूर्व प्राचार्य डा० इन्द्र राम जी ने की । इस अवसर पर मुख्य अतिथि अविनाश वाचस्पति और विशिष्ट अतिथि रवीन्द्र प्रभात रहे। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि दोनो संग्रहों की कवितायें हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया से निकली हैं और इस बात को बहुत उदारता से रचनाकार  डा० रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' ने अपने 'दो शब्द' में स्वीकार भी किया है लेकिन केवल इतना ही नहीं है;  दोनो पुस्तकों की भूमिका और फ़्लैप लेखन में प्रसिद्ध साहित्यकारों प्रो० वाचस्पति, डा० राष्ट्र बंधु, आशा शैली 'हिमाचली' के अतिरिक्त  सुपरिचित ब्लॉगर ही शामिल हैं जैसे - रावेंद्र कुमार 'रवि'  , अजित वडनेकर , समीर लाल 'समीर', पी०सी० रामपुरिया, अलबेला खत्री. डा० नूतन गैरोला, अविनाश वाचस्पति, वन्दना गुप्ता आदि। आरती प्रकाशन लालकुआँ ,नैनीताल द्वारा प्रकाशित दोनो  पुस्तकें  लोकार्पित हुईं। रचनाकार के पौत्र प्रांजल और पौत्री प्राची के साथ छोटी बच्ची मनीषा ने मिलकर वंदना व स्वागत गान गाया। सगीर अशरफ, डा० गंगाधर राय, देवदत्त 'प्रसून' , गुरु सहाय भटनागर 'बदनाम' और डा० अशोक शर्मा ने किताबों पर अपनी समीक्षात्मक चर्चा की साथ ही और भी कई लोगों ने कविता , किताब व कवि के बाबत 'दो शब्द' कहे , कविता पाठ किया। यदि सबके नाम गिनाना शुरूँ करूँ तो पूरा पृष्ठ भर जाएगा। महत्वपूर्ण यह नहीं है किसने क्या कहा क्योंकि यह सबकुछ स्थानीय अखबारों में छप चुका है और विभिन्न ब्लॉगों तथा वेब पत्रिकाओं के माध्यम से देश - दुनिया में  विस्तारित हो चुका है। महत्वपूर्ण यह है कि आज की दुनिया में जब  तमाम तरह की भौतिक सुविधाओं की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद यदि हमारे पास सबसे कम कोई चीज उपलब्ध है तो व है समय और दूसरे के महत्व को स्वीकार करते सहज संवाद का रचाव। ऐसे समय और संसार में मौसम की प्रतिकूलता को परे करते हुए और दूरी - दुर्गमता को दूर करते हुए एक छोटे - से उनींदे गाँव में ढेर सारे लोगों का मिल - बैठ कर शब्द की सत्त्ता का सानिध्य प्राप्त करना  और पूरी दुनिया में उसके सजीव प्रसारण का सहभागी बनना सुखकर आश्चर्य ही कहा जाएगा।

'हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में ब्लॉगिंग की भूमिका'  पर विषय प्रवर्तन करते हुए रवीन्द्र प्रभात ने आँकड़ों के माध्यम से हिन्दी ब्लॉगिंग का एक खाका प्रस्तुत किया , हिन्दी भाषा व साहित्य की नई रचनाशीलता , नए भाषाई संस्कार, सृजन की नई त्वरा, साहित्य के मल्टीमीडिया प्रेजेंटेशन और ब्लॉगिंग के माध्यम से अवतरित हो रहीं एक से एक एक्स्क्लूसिव चीजों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे इस काम की उपादेयता व गुणवत्ता का महत्व आने वाला समय  बताएगा इसलिए सचेत, सजग  व सहभागी होते हुए सार्थक रचने की जरूरत है। पवन चंदन ने कई उद्धरणॊं के माध्यम से ब्लॉगिंग के विकास व विस्तार पर प्रकाश डाला। रणधीर सिंह 'सुमन' ने कहा कि बहुत से स्थापित साहित्यकारों का रुझान ब्लॉगिंग की ओर हो रहा है; यह एक शुभ संकेत है। राजीव तनेजा , केवल राम, पद्म सिंह  और मनोज पांडेय ने  भाषा , साहित्य, समाज और ब्लॉगिंग के अंतर्संबंधों के विविध पक्षों  को उद्घाटित किया। मुख्य अतिथि  अविनाश वाचस्पति ने ब्लॉगिंग के वर्तमान के प्रति आश्वस्ति प्रकट करते हुए इसके भविष्य को लेकर सजग व क्रियाशील होने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विद्याथियों को हिन्दी भाषा में कंप्य़ूटिंग और ब्लॉगिंग के प्रति रुचि जागृत करके उद्देश्य से स्कूलों में कार्यशालाओं का अयोजन किया जाना चाहिए ताकि आज जो लोग भी इस दिशा में कार्य कर रहे हैं उसे आगे बढ़ाते हुए एक नई दिशा का निर्माण संभव हो सके। कार्यक्रम अध्यक्ष डा० इन्द्र राम ने कहा कि यह उनके लिए एक  नया अनुभव है जब साहित्य और ब्लॉगिंग से  जुड़े रचना धर्मियों का सानिध्य एक छोटे से कस्बे से जुड़े इस गाँव को प्राप्त हो रहा है। सुबह जिस गर्मजोशी से 'मयंक' जी ने सभी स्वागत किया था उसी गर्मजोशी से उन्होंने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। इस पूरे कार्यक्रम का सफल - सुंदर संचालन 'सरस पायस' के संपादक रावेंद्र कुमार रवि ने किया। जबलपुर में बैठे गिरीश बिल्लौरे 'मुकुल' के श्रम , संयोजन व स्नेह से इस आयोजन की लाइव कवरेज इंटरनेट के जरिये पूरी दुनिया में व्यापती रही। यह काम निश्चित रूप से एक बड़ा और हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाला काम है। 

ठंड दिन भर रही और शाम घिरने के साथ ही अपनी तीव्रता को वह और बढ़ाने के उपक्रम में लग गई थी। इस बीच कॉफी की चुस्कियों और मौर्या कैटरर्स के सुस्वादु भोजन ने ठंड को कुछ कम किया। किताब , कविता , भाषा , साहित्य और ब्लॉग - चर्चा से भरे - पूरे इस एक दिन में मैं अपने पूरे परिवार के साथ शामिल रहा। दिल्ली, धर्मशाला ( हिमाचल प्रदेश) , लखनऊ, बेतिया ( बिहार) जैसे दूरस्थ स्थानों से आए ब्लॉगर मित्रों से मिलना एक नया अनुभव था। आभासी दुनिया के बाहर की वास्तविक दुनिया  में एक दूसरे के लिखे - कहे शब्दों से कहीं अधिक उन शब्दों ने प्रभावित किया जिनका उच्चारण हुआ ही नहीं और दुनिया की किसी भी भाषा में उनका अनुवाद संभव नहीं हैं , न ही वे कैमरे व मोबाइल की आँख में कैद ही किए जा सकते हैं क्योंकि उनका होना केवल अनुभव किया जा सकता था  ठीक वैसे ही जैसे कि आजकल की कुहरीली सुबह में सूरज के होने व उसकी उसकी ऊष्मा को महसूस किया जा रहा है। ' इस ठंड के आगे'  शीर्षक कविता के साथ आज की सुबह हुई थी और अब जबकि शाम घिर रही थी और मुझे बच्चों के स्कूल के गेट पर  जाकर पता करना था कि उनकी जाड़े की छुट्टियाँ कही अत्यधिक शीत के कारण बढ़ तो नहीं गईं तो महसूस हुआ कि जिस तरह 'इस ठंड के आगे' वसंत की  अगवानी की राह खुलती है ठीक वैसे ही शब्द की सत्त्ता कायम है , कविता है और रहेगी तथा आभासी दुनिया केवल अपने होने का आभास ही नहीं कराती बल्कि व जब वह अपने आवरण से बाहर आती है इसी दुनिया में मानवीय स्पर्श और पारस्परिक सौहार्द्र के 'सुख का सूरज' उदित होता है तथा जिन्दगी के ऊबड़ - खबड़ रास्तों पर 'नन्हें सुमन' खिलते दिखाई देते हैं।   
  

और अंत में....

'हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में ब्लॉगिंग की भूमिका'  पर मुझे भी कुछ कहना था; कहा भी , उसकी चर्चा कभी अलग से। रात में कवि गोष्ठी देखते - सुनते और कंप्यूटरीय संसार से बाहर ब्लॉगर मीट का ट्रेलर  कंप्यूटर की काया  पर देखते हुए (अंग्रेजी में ) कविता जैसा कुछ लिख दिया था उसे साझा कर लेते हैं : 

Bloggers Meet

Oh this is the day
When new year greetings are still afresh.
Resolutions are not scattered in air
And we are hopefully ignoring the mess.

This is the day
This is January nine.
Here in a small town of ours
Weather is not at all fine.

Last night was frozen
And dawn was enveloped in fog
But at this moment
A galaxy of musings has come into view 
And we are sharing the thing called ‘blog’. 

A day with warmth of words and views
This is a real good sign
On this auspicious day
Online people are meeting offline.

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

नदी अपने आईने में अक्स देखेगी

...the river has water enough
to be poetic !


अभी एकाध दिन पहले अपने एक पसंदीदा ब्लॉग '...चाँद पुखराज का..' पर एक कविता पढ़ते हुए मशहूर भारतीय अंग्रेजी कवि ए.के.रामानुजन की कविता 'A River' की याद हो आई , उसे पढ़ लिया  तो इसी क्रम में केदार जी (केदारनाथ अग्रवाल) की कविता 'नदी आज उदास थी' की भी याद आई, उसे भी पढ़ा और ममांग दाई की 'River Poems' की कविताओं से भी खूब गुजरना  हो गया। यह सब तब हुआ जब अपने आसपास न तो कोई नदी थी और न ही उसमें प्रवाहित होने वाला जल। रात के एकांत में अपने घोंसले में  दुबककर बैठे एक पाखी की मानिंद संवाद व एलालाप करते एक कविता के बहाने कई - कई कविताओं की नदी बह चली। नवारुण भट्टाचार्य कहते हैं - 'आखिर एक अकेली कविता / मचा सकती है कितना कोलाहल' ,खैर कोलाहल मचा और 'तुमुल कोलाहल कलह में हृदय की बात' सुनते हुए उसी प्रवाह में  अपनी (भी)  यह कविता लिखी गई। आइए इसे  देखें...साझा करें..



नदी : राग विराग
                   ( सिद्धेश्वर सिंह )
नदी की
उदासी का हाल
बतायेंगी मछलियाँ
मछलियों की उदासी
प्रतिबिंबित होगी जल में - जाल में।

जाल की उदासी से
उदास हो जायेंगे मछुआरे
मछुआरों की उदासी
बाजार में भर देगी सन्नाटा।

जैसे - तैसे बीत जाएगा
एक अकेला दिन
शाम होगी उनींदी
रात उतरेगी चुप्पी से लबरेज
और आकाश के काले कैनवस पर
उभरने लगेगी उदास चाँद की पेंटिंग।

नदी अपने आईने में
अक्स देखेगी
अजनबी - सी लगेगी उसे अपनी पहचान।
खिन्न करेगा
मन:स्थिति का मारक विस्तार।

नदी उठेगी
निहारेगी अपने इर्दगिर्द
दुरुस्त करेगी अपने वाद्ययंत्र
अंजुरी भर जल पीकर
खँखारकर ठीक करेगी अपना रुँधा गला
और समय के रंगमंच पर
छेड़ देगी कोई नया राग।

बुधवार, 17 मार्च 2010

हिन्दी , भूमंडलीकरण ,अनुवाद , कविता ,ब्लागिंग और मेरठ विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय सेमीनार की याद

पिछले माह की १२ - १४ तारीख को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा 'भूमंडलीकरण और हिन्दी' विषयपर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमीनार सफलता पूर्वक संपन्न हो गया जिसकी विस्तृत रपटें समाचार पत्रों , पत्रिकाओं , वेबसाइट्स और ब्लाग्स पर प्रकाशित हुई हैं / हो रही हैं। हिन्दी भाषा के हृदय - स्थल मेरठ में संपन्न इस महत्वपूर्ण आयोजन में शामिल होकर लौटने के एक महीने से अधिक समय के बाद जब कुछ लिखने बैठा हूँ तो यह अच्छी तरह पता है कि मुझे रपट नहीं लिखनी है अर्थात किस सत्र में किसने क्या कहा आदि - इत्यादि का उल्लेख भी नहीं करना है, नाम भी नहीं गिनाना है। रिपोर्टिंग की भाषा और उसके शिल्प में ये सारी सूचनायें मंथन, हिन्दी भारत , अशोक विचार व हिन्द युग्म पर प्रमुखता से छप चुकी हैं। मुझे तो वह कहना है जो एक प्रतिभागी के रूप में अनुभव हुआ। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में इस उम्मीद के साथ अपने अनुभव को साझा कर रहा हूँ कि किसी / किन्हीं समानधर्मा / समानधर्मियों को मेरी बात कुछ अपनी - सी लगे शायद ...

* हिन्दी लगातार 'नई चाल' में ढ़ल रही है और उस नए को रेखांकित / लिपिबद्ध भी किया जा रहा है। तकनीक का दामन थाम कर उसने अपनी गति को तीव्र किया है। राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी अवश्यकता व स्वीकार्यता बढ़ी है किन्तु यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि बदलते / निरन्तर बदल रहे समय व समाज में हम हिन्दी वालों ने स्वयं उस अनुपात में और उस तेजी से खुद को नहीं बदला है जैसे कि संसार की बहुत - सी भाषाओं ने कर दिखाया है। हिन्दी का प्रश्न आते ही अंग्रेजी का प्रश्न उठ खड़ा होता है। भारत की भाषा समस्या पर बात होने लगती है। राजभाषा और राष्ट्रभाषा के सवाल को उठाया जाता है। उर्दू को अपना ही दूसरा भाषायी चेहरा मानने में एक हिचक - सी दीखती है और तो और तकनीक का सवाल आते ही कुछ यों लगता है यह सब तामझाम हमारे लिए नहीं हैं।आशंका व्यक्त की जाती है इससे 'निज भाषा' की पवित्रता नष्ट हो रही है और कहीं वह अपनी पहचान खो न दे, 'हिंगलिश' न बन जाय।। दूसरी ओर एक ऐसी दुनिया है जो रोज बन रही है। देशों , भाषायी समाजों के बीच की दूरियाँ घट रही हैं और विश्वग्राम की बात जोरों पर है तब किसी कोटर में बैठ कर अपने ही आईने में अपनी शक्ल देखकर मुग्ध - मुदित होने की बजाय संसार के साथ कदम से कदम मिलाना ही समझदारी की बात होगी । हाँ , इस समझदारी में यह सावधानी जरूर होनी चाहिए कि हमें क्या , कैसा , कितना और किस तरह क काम करना है। मेरठ के सेमीनार में यह बात खुलकर सामने आई कि हिन्दी बोलने - बरतने वालों की संख्या क्या है , संसार के किन - किन देशों में हिन्दी पढ़ाई जाती है , किन - किन देशों में कौन - कौन से साहित्यकार रचना कर रहे हैं और भारतीय विश्वविद्यलयों के हिन्दी पाठ्यक्रम में प्रवासी साहित्य कि शामिल करने में अब देरी नहीं करनी चाहिए। यह सब तो ठीक है लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि हिन्दी के उन्न्यन के लिए हम लोग अपने स्तर पर क्या कर रहे हैं? हम लोग हिन्दी की गढ़ी हुई छवि से बाहर निकल कर तकनीक के क्षेत्र कौन - सा काम कर रहे हैं? इस काम की वर्तमान दशा क्या है? इसकी दिशा क्या होनी और हमारा लक्ष्य क्या है ? ये सारी बातें सेमीनार के विभिन्न सत्रों में आईं। देश - विदेश के विद्वानों ने व्याख्यान दिए।मल्टीमीडिया प्रस्तुतियाँ हुईं और कुल मिलाकर यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह सेमीनार सिर्फ़ एक हिन्दी मेला या हिन्दी वालो का जमावड़ा भर न होकर उससे आगे की चीज था, एक गंभीर विचार - विमर्श का उत्कृष्ट नमूना जो भारत के अन्य विश्विद्यालयों , कलेजों व संस्थाओं को सेमीनार आयोजित करने के लिए दिशा देने का काम भी करेगा। इस काम के लिए हिन्दी विभाग , चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के अध्यक्ष प्रो० नवीन चंद्र लोहनी और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है।

* इस सेमीनार में मुझे 'अनुवाद और हिन्दी' वाले सत्र में बोलना था। मैंने अपना विषय चुन रखा था 'कविता के अनुवाद की समस्यायें'। इस पर कुछ लिखा भी था किन्तु उसे यथावत / अक्षरश: न पढ़कर यह सही लगा कि हिन्दी की दुनिया में अनुवाद , अनुवादक और अनूदित सहित्य की परम्परा तथा अनुवाद व अनुवादक की छवि पर कुछ कहने के साथ ही भूमंडलीकरण और अनुवाद की भूमिका पर कुछ शेयर किया जाय। यह एक व्यापक विषय है निर्धारित / नियत/ आवंटित संक्षित समय सीमा में सूत्र व संकेत स्वरूप ही कुछ कहा जा सकने का ही अवकाश था और उसका लाभ लेते हुए कुछ कहा भी । क्या अपको नहीं लगता कि भूमंडलीकरण के इस दौर में भाषा ज्ञान - सूचना - जानकारी और उत्पादन - उपभोग - वितरण के तंत्र की ( यह अलग बात है कि इस तंत्र के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कह जा सकता है !) की एक अनिवार्य व सक्रिय कड़ी है। अगर सब कुछ बाज़ार में है , बाज़ार के लिए है , एक तरह से बाज़ार द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है तो तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के साथ हिन्दी के संदर्भ में बकौल अकबर इलाहाबादी 'बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ' कह कर तटस्थ नहीं रहा जा सकता। इस बदलते हुए भूगोल में हमें हिन्दी की भूमिका को परखते , पहचानते हुए अनुवाद को एक द्विभाषी कवायद या शौकिया औज़ार से आगे बढ़ कर एक सृजनात्मक सांस्कृतिक कर्म के साथ ही ट्रांसलेशन इंडस्ट्री जैसी किसी चीज को मूर्तिमान व गतिमान करने के बाबत गंभीर होना पड़ेगा और अपनी कीमत तय करते हुए इस परिवर्तन के लाभ के एवज में कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।
* इस अंतरराष्ट्रीय सेमीनार में कविता पाठ का एक सत्र भी था। मुझे उम्मीद नहीं थी अपनी कविताओं के जिक्र से बचने वाले मेरे जैसे व्यक्ति को कवि मान लिया जाएगा और उसे एक अंतरराष्ट्रीय कवि गोष्ठी में अपनी कवितायें सुनानी पड़ेंगीं। खैर, कविता केन्द्रित यह आयोजन बहुत ही बढ़िया रहा। इसमें वे कवि भी थे जो विदेश रहकर हिन्दी मॆं अच्छी कवितायें लिख रहे हैं और वे भी जो हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसमें वे कवि भी थे जो अपनी सुमधुर अदायगी और कंठ के जादू से मुशायरा लूट लेते हैं और वे भी जो कविता और उसका शास्त्र पढ़ते - पढ़ाते हैं।हाँ , उन श्रोताओं , पाठको को कैसे भुलाया जा सकता है कविता से प्रेम करते हैं।उसे सुनते हैं, पढ़ते हैं , सराहते हैं। यह कविता उत्सव बहुत देर तक और बहुत ही सुन्दर माहौल में संपन्न हुआ।

* हिन्दी में पढ़ने - लिखने - पढ़ाने वालों की दुनिया से जुड़े लोगों के लिए ब्लागिंग अब कोई नई और चौंकने या अनदेखा किए जाने वाली चीज नहीं रह गई है। हिन्दी पत्रकारिता ने सबसे पहले इसके को स्वीकार किया और मान / स्थान दिया और अब अकादेमिक दुनिया में भी इसकी महत्ता को स्वीकार किया जाने लगा है। हिन्दी लिखने - पढ़ने वालों के बीच ब्लागर्स के कार्य को स्वीकर किए जाने व उसे पर्याप्त सम्मान दिए जाने का स्पष्ट उदाहरण मेरठ के इस सेमीनार में दिखाई दिया। यहाँ कई सत्रों में इस पर / इसके बाबत बात हुई और वक्ताओं के परिचय में बहुत ही सम्मान के साथ कविता वाचक्नवी जी तथा इन पंक्तियों के लेखक का एक परिचय ब्लागर के रूप में दिया गया। इच्छा तो यह थी कि इसी बहाने ब्लागिंग पर कुछ बातचीत हो जाय किन्तु शिड्यूल इतना बिज़ी था कि इसके लिए औपचारिक रूप से समय निकालना संभव नहीं था। उम्मीद है कि मेरठ विश्वविद्यालय या कोई अन्य विश्वविद्यालय /संस्था/ संस्थान भविष्य में हिन्दी ब्लागिंग पर अलग से किसी कार्यशाला/ संगोष्ठी का आयोजन करेगा ( जो निश्चित रूप से 'ब्लागर मीट' से कुछ अलग हटकर होगी ! ) तब इस नए बनते हुए माध्यम पर गंभीर विमर्श संभव हो पाएगा।

* और अंत में यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि 'भूमंडलीकरण और हिन्दी' विषय पर आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय सेमीनार इस एक कुशल प्रबंधन / संचालन का एक अच्छा उदाहरण रहा क्योंकि इसके प्रबंधन / संचालन में किसी तरह की कोई अफरातफरी नहीं थी और कामचलाऊ जैसी चीज नहीं दिखी। सब कुछ अपनी गति से सुचारु रूप से चलता रहा। उद्घाटन - समापन और तकनीकी सत्रों के साथ विभिन्न सत्र समय से सम्पादित होते रहे । बाहर से आए अतिथियों को आवास व भोजन संबंधी कोई परेशानी नहीं हुई और वे अपने साथ तमाम खूबसूरत यादें लेकर अपने - अपने घर को लौटे । यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। इस यकीन के साथ कि इसी तरह की बात दूसरों से भी सुनने को मिली / मिल रही है। एक बार फिर डा० नवीन चन्द्र लोहनी और उनकी पूरी टीम को बहुत - बहुत बधाई !

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

आँखे तर हैं और हॄदय तरल


आज शाम एक तितली से मुलाकात हुई. अब जबकि गर्मी का मौसम अपने चरम की ओर है और चारों ओर चुनाव की गर्मी का जोर है तब तितली से मिलना भला -सा लगा. बाज़ार से लौटकर देखा की अपने नन्हें - से बगीचे में धूल -धक्कड़ से सने मिर्च के पौधे पर दो तितलियाँ मौज कर रही हैं . उनके पास जाते ही बड़ी वाली तो पड़ोसी के बगीचे की ओर उड़ चली किन्तु छुटकी जस की तस बैठी अपने पंख समेटे मौज में मशगूल रही . उसका नाम पूछा तो कुछ नहीं बोली , न ही पलटकर देखा. एक नन्हें सुंदर जीवधारी के जीवन व्यापार में खलल डालना उचित नहीं था. मन नहीं माना तो इस अनूठे क्षण को कैमरे में कैद कर लिया.

थोड़ी देर बाद छत पर जाकर गमलों का मुयायना किया तो रहस्य उजागर हुआ कि पहले जहाँ रूप व सौंदर्य का बोलबाला हुआ करता था अब उस जगह सूखापन है. यह गर्मी के मौसम की मार है अथवा जीवन - जगत के नश्वर व्यापार का मूर्त वर्तमान ? यह भी देखने को मिला कि अगर भरपूर जिजीविषा और उद्दाम जीवट है तो मौसम के मारक मिजाज के विरुद्ध अपने भीतर कोमलता तथा हरापन बचाया जा सकता है. प्रकॄति हिन्दी - अंग्रेजी के भाषायी विवाद में पड़े बिना कितना कुछ कह जाती है , यह भी आज शाम बखूबी देखा . छत पर मुँगौड़ियों की कलात्मक डिजाइन देखी - मानों धूप में सीझता हुआ स्वाद !

एक ही शाम में कितना - कितना- कितना देख लिया. सूरज को डूबते और क्षितिज को लाल होकर क्रमश: कालिमा में विलीन होते तो रोज ही देखता हूँ. अँधेरे के खिलाफ़ इंसानी जानकारी के जीवंत कारनामे बिजली की जगमग में नहाई हुई यह रात अब गाढ़ी हो चली है. आज जो देखा वह क्या मेरा निजी मामला भर था ? शायद नहीं, कुदरत और कायनात का यह करिश्माई अंदाज भीतर दुबकी हुई संवेदनशीलता को सतह पर उभार कर अभी भी विद्यमान है- आँखे तर हैं और हॄदय तरल. कुछ इसी मन:स्थिति में आज अपने नन्हें - से बगीचे और छोटी - सी छत पर धूल - धक्कड़ , धूप - घाम झेल रहे गमलों में लगे फूल पत्तियों तथा खानपान के उपादानों से हुए साक्षात्कार को चित्रों व कवितानुमा अभिव्यक्तियों के साथ हाजिर हूँ . देखते हैं 'कर्मनाशा' के पाठकों को यह रंग भाता है कि नही !
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मिर्ची की कलियों पर फूलों की रानी ,
चाहिए यह तीतापन क्या है परेशानी ?
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मीठी इस नीम के हरे - हरे पात,
स्वाद और सुगंध दोनो इक साथ !
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धूप के खिलाफ़ यह छतरी छतनार ,
अड़े रहो दोस्त कुछ भी कहे संसार !
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सूख गए फूल उड़ गया रूप रीता सौंदर्य ,
फिर भी हो तने खड़े क्या गज़ब का धैर्य !
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छत पर हैं सूख रहीं ताजी मुँगौड़ियाँ ,
मिर्च रखवाली में खुशबू की लड़ियाँ.
अभी तो तपन है धूप का है राजपाट,
आएगी बारिश तो खायेंगे पकौड़ियाँ !
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सोमवार, 7 अप्रैल 2008

'फसल'-अन्न का आख्यान और बाबा का 'सोनिया समंदर'

फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!
(नागार्जुन की कविता 'फसल' का एक अंश)

पिछले दो-तीन बारिश हुई.तेज हवायें चलीं.सुना-पढ़ा कछ जगह हल्के ओले भी गिरे.अप्रेल का महीना.होली के बाद सर्दी सरक गई थी और गर्मी ने अपनी आमद दर्ज करानी शुरू कर दी थी,तभी यह बारिश!बे मौसम बरसात!गरम कपड़े एक बार फिर निकल आए.रजाई कंबल फिर भाए.कुछ लोगों को कहते सुना-शिमला,नैनीताल का मौसम हो रहा है;आनंद लो,मौज करो.किसानों के चेहरे उतरे हुए,मौसम की मार का असर-पकी फसल पर बारिश का कहर.कुछ लोगों को कहते सुना-गेहूं का भाव तो काफी ऊपर जायेगा,मंहगाई ने वसे ही कमर तोड़ रक्खी है.आम आदमी कैसे रोटी खायेगा?

मैंने कुछ नहीं कहा.लोगों की बातें सुनता रहा,मन ही मन कुछ उधेड़ता,बुनता रहा.बचपन गांव में बीता है.छोटी जोत के किसान पिता को प्रकृति के परिवर्तित तेवर से प्रसन्न और परेशान होते देखा है.अब भी गांव में ही रहता हूं.मेरे घर के चारों ओर खेत ही खेत हैं,गेहूं की पकी फसल से भरे- भरपूर,अपने भीतर क्षुधा और स्वाद समेटे.जहां तक दृष्टि जाती है वहां तक अन्न का अपरिमित आख्यान उत्कीर्ण दिखाई देता है..कुछ लोगों ने कहा- तुम तो कवि हो,कितना सुहाना मौसम है,कविता लिखो.अब क्या कहूं ऐसे उत्साही काव्य रसिकों को? देश-दुनिया की दूसरी भाषाओं के बारे में तो नहीं जानता लेकिन हिन्दी में यह जरूर लगता है कि 'ऐसे' ही उत्साही काव्य रसिकों,कविता प्रेमियों और सहृदयों ने कवियों की एक बड़ी फौज को तैयार करने के काम का बीड़ा उठा रखा है साथ ही लगे हाथ तारीफ की तत्परता में भी कोई कोर-कसर नहीं. यह कहते हुए क्षमा चाहूंगा कि हिन्दी ब्लाग की दुनिया को मैं जितना भी देख पाया हूं उसका एक बड़ा भाग 'ऐसे' ही सर्जकों और सहृदयों से संकुलित है.

खैर,सुहाने मौसम और सहृदयों के सुझावों से मेरे भीतर का कवि नहीं जागा और मैं ताल-तलैया,झील,पोखर ,नदी,झरने,जंगल की ओर कागज कलम लेकर नहीं भागा.शायद एक 'महान'कविता बनने से रह गई.मैं खुश हूं कि एक दुर्घटना टल गई.लेकिन कई-कई कवियों की कई-कई कवितायें याद आईं,प्रकृति के सुकुमार कवियों की कवितायें भी और प्रकृति से प्रतिरोध की प्रेरणा प्राप्त करने वाले कवियों की कवितायें भी.इस सिलसिले में अपने बाबा(वैद्यनाथ मिश्र/ यात्री/ नागार्जुन)की कई कवितायें याद आईं.उन्होंने प्रकृति पर नहीं ,प्रकृति के साथ मिलकर खूब-खूब लिखा है.'अमल धवल गिरि के शिखरों पर बादल' तो है ही,'बरफ पड़ी है','मेघ बजे','घन कुरंग','फूले कदंब','बहुत दिनों के बाद','मेरी भी आभा है इसमें','फसल''सिके हुए दो भुट्टे','डियर तोताराम','बादल भिगो गए रातोरात' आदि-इत्यादि.बादल,बारिश और पकी फसल से उपजी चर्चा के बीच राजकमल पेपरबैक्स से प्रकाशित 'प्रतिनिधि कवितायें' (सं० नामवर सिंह) से साभार प्रस्तुत है बाबा की एक कविता 'सोनिया समंदर'-


सोनिया समंदर /नागार्जुन

सोनिया समंदर
सामने
लहराता है
जहां तक नजर जाती है

बिछा है मैदान में
सोना ही सोना
सोना ही सोना
सोना ही सोना

गेहूं की पकी फसलें तैयार हैं
बुला रही हैं
खेतिहरों को
..."ले चलो हमें
खलिहान में-
घर की लक्ष्मी के
हवाले करो
ले चलो यहां से"

बुला रही हैं
गेहूं की तैयार फसलें
अपने-अपने कृषकों को...