कवि साथी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कवि साथी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 30 नवंबर 2014

नीली नदी एक बहती है : अपर्णा अनेकवर्णा की कवितायें

सबसे पहले तो 'कर्मनाशा' के पाठकों और प्रेमियों से इस बात के लिए क्षमा कि अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के काम  में इस बीच लंबा व्यवधान व विराम हो गया है। यह आगे जारी न रहे ऐसी पूरी कोशिश रहेगी। इस ठिकाने पर  साझेदारी के क्रम को गति देते हुए आज प्रस्तुत हैं अपर्णा अनेकवर्णा की तीन कवितायें। कुछ ब्लॉग्स तथा फेसबुक पर  उनकी सृजनात्मक उपस्थिति से रू-ब-रू होते  मेरी इच्छा थी कि गहन संवेदना की  सहज अभिव्यक्ति करने वाले इस रचनाकार से  कविता प्रेमियों को मिलवाया जाय। इस काम में देर हुई है उसके लिए पुन: क्षमा चाहते हुए  प्रस्तुत हैं अपर्णा अनेकवर्णा की तीन ये कवितायें...... और हाँ , उनकी एक कविता  पर आधारित सुंदर पोस्ट भाई पंकज  दीक्षित ने  तैयार किया है। तो  आइए , पढ़ते हैं ये कवितायें.....


अपर्णा अनेकवर्णा की तीन कवितायें

* प्रेत-ग्राम 

वो डूबता दिन.. कैसा लाल होता था..
ठीक मेरी बांयी ओर..
दूर उस गाँव के पीठ पीछे जा छुपता था
सूरज.. तनिक सा झाँक रहता..
किसी शर्मीले बच्चे की तरह

दिन भर अपने खेतों पर बिता..
'समय माई' को बताशा-कपूर चढ़ा..
जब लौटते थे हम शहर की ओर
यही दृश्य होता हर बार..
ठीक मेरी बांयी ओर..

मुझे क्यों लगता..
जैसे कोई प्रेत-ग्राम हो
मायावी सा.. जन-शून्य..
घर ही घर दीखते.. आस पास..
कृषि-हीन.. बंजर ज़मीन..

शायद भोर से ही झींगुर
ही बोला करते वहां...
सिहरा देता वो उजड़ा सौंदर्य..
डरती.. और मंत्रमुग्ध ताका भी करती..
लपकती थीं कई कथाएं.. मुंह बाये..

कुछ भी कल्पित कहाँ था..
वो सच ही तो था.. हर गाँव का
कुकुरमुत्ते सा उग आया था..
कौन बचा था जवान.. किसान..
सब मजूरा बन बिदेस सिधारे

बची थीं चंद बूढी हड्डियां..
उनको संभालती जवान बहुएं..
जवान बहुओं की निगरानी में..
वही.. चंद बूढी हड्डियां...
और घर वापसी के स्मृति चिन्ह..
धूल-धुसरित कुछ बच्चे..

महानगर.. सउदिया...
लील गए सारे किसान.. जवान..
रह गए पीछे.. बस ये कुछ प्रेत-ग्राम..

** डर

आज रात में भी डर नहीं लगता..
आज जंगल झींगुर का शोर..
सियार की पुकार नहीं..
आज जंगल माँ की गोद है..
माँ कहाँ गयी होगी..
कांपता है मन और
निचला होंठ मन की तरह ही
कांपने लगता है..
बाकी के दो चेहरे धुंधलाने लगते हैं..

बस वो शोर गूंजता रहता है
बकरियां जिबह हो रही हैं शायद..
उन्हें भूख लगी हो शायद..
शायद वो इसलिए नाराज़ हैं
बकरियां रोती भी हैं क्या?
बड़ी सी लाल पीली रौशनी..
रंग रही है रात

भुनी महक से पहले कभी कै नहीं हुयी..
आज सालों बाद मुनीर ने निकर गीली की..
क्यों.. कौन... कुछ नहीं समझ आ रहा..

सब बहुत नज़दीक है..
बहुत..
मेरे 'कम्फर्ट-जोन' में दखल करता..
आँखें खुल जाती हैं..
अभी पढ़कर रखा अख़बार उठाकर
रद्दी के ढेर में पटक आती हूँ..
शब्द वहां से भी मुझे ललकार रहे हैं
जिनके अर्थ से कतरा रही हूँ..
मुझे दिन भी तो शुरू करना है..

*** नदी चुपचाप बहती है 

नीली नदी एक बहती है
चुपचाप..
सरस्वती है वो.. दिखती नहीं..
बस दुखती रहती है..

सब यूँ याद करते हैं जैसे बीत गयी हो...
नहीं खबर.. न परवाह किसी को भी कि..
धकियाई गयी है सिमट जाने को
अब हर ओर से खुद को बटोर..
अकेली ही बहती रहती है..

नित नए.. रंग बदलते जहां में..
अपना पुरातन मन लिए एक गठरी में..
बदहवास भागी थी..
कहीं जगह मिले...

हर उस हाथ को चूम लिया
जिसने अपना हाथ भिगोया..
फिर ठगी देखती रही..
राही उठ चल दिया था..

पानी पी कर उठे मुसाफिर..
कब रुके हैं नदियों के पास?
उन्हें सफर की चिंता और मंज़िलों की तलाश है
नदियां बस प्यास बुझाती हैं
यात्रा की क्लांति सोख कर
पुनर्नवा कर देती हैं...

और जाने वाले को..
स्नेह से ताकती रहती हैं
जानती हैं.. वो लौटेंगे..
फिर से चले जाने के लिए..

पर सरस्वती सूख गयी..
पृथु-पुत्रों का रूखपन सहन नहीं कर सकी
माँ की कोख में लौट गयी..
अब विगत से बहुत दूर..
चुप चाप बहती रहती है...

दिखती नहीं.. सिर्फ दुखती रहती है..
________________

अपर्णा अनेकवर्णा मूल रूप से गोरखपुर की हैं। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य से एम०ए० किया है और लगभग सात वर्षों तक 'पर्पल आर्क फिल्म्स' में प्रोडक्शन असिस्टेंट तथा 'डेल्ही मिडडे'  में एक पत्रकार के रूप में कार्यरत रहीं। विवाहोपरांत गृहणी का जीवन, अपनी बेटी रेवा और पति निलेश भगत के साथ नयी दिल्ली में व्यतीत कर रही हैं। साहित्य पढने में रूचि शुरू से रही है। लगभग ढेढ़ वर्ष पूर्व लेखन प्रारंभ किया। हिन्दी व अंग्रेजी में समान अधिकार के साथ  कवितायें लिखने वाली अपर्णा एक कुशल अनुवादक भी हैं। इससे पूर्व इनकी कवितायेँ 'गुलमोहर' काव्य संकलन, 'कथादेश' (मई, २०१४) तथा 'गाथांतर' (अप्रैल-जून, २०१४) में प्रकाशित हो चुकी हैं. उनका रचनाकर्म 'गाथांतर', 'स्त्रीकाल', 'पहली बार' जैसे महत्वपूर्ण ब्लॉग्स पर  साझा हुआ है। उनके  दो संकलन जल्द ही  प्रकाशित होने जा रहे हैं।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2013

इन सर्वनामों के मध्य : सरोज सिंह की कवितायें

अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस ठिकाने पर एक लंबे अंतराल के बाद आज प्रस्तुत हैं  सरोज सिंह की पाँच कवितायें। कवि का परिचय नीचे दिया गया है। इन  पाँच कविताओं को और  उनकी कुछ और कविताओं को पढ़ते हुए आश्वस्ति होती है कि  कवि अपने समय  व समाज को लेकर सजग है और कवितायें उम्मीद का दामन न छोड़ने की जिद साथ - साथ  सतत सक्रिय हस्तक्षेप करती दिखाई देती हैं। आइए , इन्हें , पढ़ते हैं :


पाँच कवितायें : सरोज सिंह

१-उनके माथे का अरक़,ढलता है टकसालों में

बोया गया अनाज
दल्ले उगे
खेत सींचा गया
ख़ुदकुशी उगी
चूल्हे पे रोटी नहीं
अक्सर,उठता रहा धुंआ।

मुफलिसी की बारिश में
सील जाता था ईधन
बच्चों के चेहरों पर
भूख करती थी नर्तन
उनके माथे का अरक़
ढलता रहा टकसालों में
सिक्के तवायफ़ से
नाचते रहे अमीरों के पंडालों में।

वक़्त अब बदल रहा है
उनकी जमीं पर
अब अनाज नहीं
इमारते उगती हैं
उनके हाथों में बीज और खाद नहीं
रेता बजरी के तसले होते हैं।

नहीं बदला कुछ तो वो ये कि
अब भी उनके माथे का अरक़,
ढलता है टकसालों में !

२-हे शब्द शिल्पी !

तुम !

शब्दों के धनी - मनी
शब्द शिल्पी हो !
गढ़ लेते हो
प्रेम की अनुपम कविता
किन्तु भावों के मेघ
मेरे मन में भी
कम नहीं घुमड़ते।

मेरा आतुर उद्दांत हृदय
कसमसाता है
छटपटाता है
प्रेम के उदगार को
किन्तु मेरे निर्धन शब्द
श्रृंगारित नहीं कर पाते
मन के अगाध भावों को
यदा कदा....
दरिद्रता झलक ही जाती है।

हे शब्द शिल्पी !
क्या ही अच्छा होता
शब्दों के साथ साथ
भावों के भाव भी
तुम समझ पाते !

३-झुर्रियों वाले हाथ जब धरोगे मेरे झुर्री वाले हाथ पर

कहते हैं ........

सपने तो सपने ही होते हैं
क्या पता पूरे हो न हों
पर मेरा एक सपना है
जो सच और शीशे की तरह साफ़ है
और वो है तुम्हारा
हर सुबह चाय की प्याली ख़त्म करने के बाद
और रात को सोने से पहले
अपने झुर्रियों वाले हाथ का
मेरे झुर्रियों वाले हाथ पर धरना
और ऐसा करते तुम्हारी नजरें
मेरी नजरों पर नहीं हाथों पर होती हैं
जैसे उस हाथ के स्पर्श से कुछ महसूस करना चाहते हो
या कुछ कहना चाहते हो पर कह नहीं पाते
या वो साथ देना चाहते हो
जो वाजिब वक़्त न देकर बेजा किया।

अक्सर वो आधी रात तक बैठक से ठहाकों का उठना
और मेरा बिस्तर पर खिड़की से आती चांदनी में घुलते रहना
मेरी नींद भी तो तुम्हारी सगी थी
मुझे छोड़ तुम्हारी महफ़िल में कहकहे लगाती
और रात के तीसरे पहर कभी भूले से नींद भी आ जाती
तब तुम्हारा प्यार से उठाकर कहना
यार.जरा दोस्तों के लिए कॉफ़ी बना दो
और उनके सामने छाती चौड़ी कर
उन्हें कॉफ़ी पिलवाना !!

ऊपर वाले की फज़ल से तुम्हारी नौकरी भी एसी कि
आधे से ज्यादा वक़्त बाहर ही रहते
माँ बनने की पहली ख़ुशी
तुम्हारे संग साझा करना चाहती थी
अफ़सोस नहीं कर पाई !
वो हमारी पहली होली
तुम्हे याद है?
कहकर गए अभी सब से मिलकर आता हूँ
और जब आये तब तक खेल ख़त्म हो चुका था।

खैर ....भूलना चाहती हूँ सब कुछ
और अब तुम्हारे हाथों का स्पर्श पाती हूँ तो
कुछ याद भी नहीं रहता...
और धर देतीं हूँ अपना दूसरा हाथ तुम्हारे हाथों पर
तुम भी समझ जाते हो
और अपनी प्रेम से लबरेज़ नजरें
ऊपर कर लेते हो
शायद परिपक्व प्रेम
सिफ मौन समझता है ...
मेरा सब कुछ भूलना
लाज़मी भी है ......क्योंकि ,
तुम्हारा वो प्रेम अंगुलिमाल था
और ये प्रेम वाल्मीकि .....!!!

४-पारा
( आज थर्मामीटर के टूटने पर 'पारे' को छितराते देख कर )

पारा प्रेम का
हाई हो न हो
प्रेम पारे सा होना चाहिए
जो गिरकर टूटता है कई टुकड़ों में
जुड़ने में पल नहीं गंवाता
कोई गांठ भी नहीं होती उस जुडाव में
और ..
उस पारे को
कोई रंगे हाथों
पकड़ भी तो नहीं पाता
तभी कहती हूँ
पारा प्रेम का हाई हो न हो
प्रेम पारे सा होना चाहिए|

५- व्याकरण

मैं
और
तुम

इन सर्वनामों के मध्य
व्याप्त है हमारे अपने विशेषण
जिन्हें हम बदलना नहीं चाहते
और ढूंढ़ते रहते हैं
जीवन की उपयुक्त संज्ञा।
---------

~s-roz~
सरोज सिंह - जन्म :बलिया (उ .प्र .) 28-01-70 निवास : जयपुर!
डी.एस.बी. परिसर कुमाऊँ विश्वविद्यालय , नैनीताल  से भूगोल विषय में स्नातकोत्तर एवं बीएड । जयपुर (सीआईएसऍफ़) के परिवार कल्याण केंद्र की संचालिका के तौर पर कार्यरत। संकलन  'स्त्री होकर सवाल करती है' और विभिन्न पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। उनका ब्लॉग है  'आगत का स्वागत' 

(चित्र  परिचय: शर्ले शेल्टन की पेंटिंग डिवोशन - अ कपल इन लव , गूगल छवि से साभार)

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

जैसे गुरुत्वाकर्षण को मुंह चिढाते हैं हीलियम से भरे गुब्बारे : अंजू शर्मा

अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस वेब ठिकाने पर 'कवि साथी' क्रम में आज प्रस्तुत हैं युवा कवि अंजू शर्मा की दो कवितायें। अपनी सहज सोच और विशिष्ट कहन की त्वरा से उन्होंने  इधर बीच हिन्दी के कविता संसार में ऐसी उपस्थिति दर्ज की है जिसे लगातार रेखांकित किया जा रहा है। एक कार्यकर्ता के रूप में वह 'डायलाग' , लिखावट’ आदि कई संस्थाओं से जुड़कर दिल्ली की साहित्यिक सक्रियता में शामिल हैं जिसकी अनुगूँज अक्सर दूर तक सुनाई दे जाती है। इसके साथ ही वह एक  ब्लॉगर के रूप में .’कुछ दिल ने कहा’, ‘दिल की बात’ और 'उड़ान अंतर्मन की' जैसे ब्लॉग्स का सफल संचालन करती हैं। हाल ही में अंजू जी को   'इला त्रिवेणी सम्मान २०१२' से सम्मानित किया गया है। आइए , आज पढ़ते हैं उनकी दो कवितायें....


०१- हम नहीं हैं तुम्हारे वंशज 

सोचती हूँ मुक्ति पा ही लूँ
अपने नाम के पीछे लगे इन दो अक्षरों से
जिनका अक्सर स्वागत किया जाता है
माथे पर पड़ी कुछ आड़ी रेखाओं से

जड़ों से उखड़ कर
अलग अलग दिशाओं में
गए मेरे पूर्वज
तिनके तिनके जमा कर
घोंसला ज़माने की जुगत में
कभी नहीं ढो पाए मनु की समझदारी

मेरी रगों में दौड़ता उनका लहू
नहीं बना मेरे लिए
पश्चाताप का कारण
जन्मना तिलक के वाहक
त्रिशंकु से लटकते रहे वर्णों के मध्य
समय समय पर
तराजू और तलवार को थामते
वे अक्सर बदलते रहे
ब्रह्मा के अस्पर्श्य पाँव में

सदा मनु की विरासत नकारते हुए
वे नहीं तय कर पाए
जन्म और कर्म के बीच की दूरी का
अवांछित सफ़र
कर्म से कबीर और रैदास बने
मेरे परिजनों के लिए
क्षीण होती तिलक की लालिमा या
फीके पड़ते जनेऊ का रंग
नहीं छू पाए चिंता के वाजिब स्तर को

हाशिये पर गए जनेऊ और शिखा
नहीं कर पाए कभी
दो जून की रोजी का प्रबंध,
क्योंकि वर्णों की चक्की से
नहीं निकलता है
जून भर अनाज
निकलती है तो
केवल लानतें
शर्म से झुके सर
बेवजह हताशा और
अवसाद

बोझ बनते प्रतीक चिन्हों को
नकारते और
अनकिये कृत्यों का परिणाम भोगते
केवल और केवल कर्मों पर आधारित
उनके कल और आज ने
सदा ही प्रतिध्वनित किया
हमें बक्श दो मनु, हम नहीं हैं तुम्हारे वंशज ....

**
०२- कामना

हमारे रिश्ते के बीच
ऊब की धुंध में डूबते तमाम पुल
टूट जाने से पहले
खो जाना चाहती हूँ मंझधार में
शायद
कभी कभी डूबना
पार लगने से कहीं ज्यादा
पुरसुकून होता है

बेपरवाह गुजरने की ख्वाहिश
ऊँगली थामे है
उन सभी पुरखतर रास्तों पर
जहाँ लगे होते हैं साईनबोर्ड निषेध के
जंग खाए परों को तौलकर
भर लेना चाहती हूँ एक दुस्साहसी उड़ान
आसमान के अंतिम छोर तक
हंसकर, झटकते हुए सर को,
ठीक वैसे ही
जैसे गुरुत्वाकर्षण को मुंह चिढाते हैं
हीलियम से भरे गुब्बारे

यूँ जानती हूँ कि
हर भटकते कदम के इर्द गिर्द
लम्बवत पड़ी होती हैं आचार-सहितायें
ये भी कि
हर मनभावन रास्ता नहीं जाता है
तयशुदा मंजिल को
ये भी कि हर तयशुदा रास्ते के
इर्द-गिर्द नहीं उगते हैं
जंगली कामनाओं के पेड

किन्तु टूटकर प्यार करने
और दीवानावार हो
मजनू हो जाने वाली
तमाम आदिम इच्छाओं के बोझिल पाँव
कभी कभी झटकना चाहते हैं
संकोच और जन्मजात संस्कार की बेड़ियाँ,

ता-उम्र नाक की सीध में चलते
हर सतर राजपथ से ऊबकर
उम्र की इस दोपहर में
बो देना चाहती हूँ हम दोनों के बीच
सालों पहले जिए अजनबीपन और रोमांच के बीज
कुछ देर फिर से उसी हाथ को थामकर
भूल जाना चाहती हूँ हर रास्ता
हटा लेना चाहती हूँ नज़रें तयशुदा मंजिल से,
दौड़ना चाहती हूँ बेसाख्ता पथरीले रास्तों पर
शाम के धुंधलके में खोने से ठीक पहले
आज मैं प्यार में पागल होना चाहती हूँ....

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

साधारण की असाधारणता और कवि छवि

हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि बल्ली सिंह चीमा के साठ वर्ष पूरे पर उनके मित्रों  ने ०८ सितम्बर २०१२ को  नई दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान में एक बहुत ही आत्मीय , सादा और गरिमापूर्ण  आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम की रपट 'कबाड़ख़ाना' पर पढ़ी जा सकती है। इस अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन भी किया गया जिसका संपादन डा० प्रकाश चौधरी ने किया है। इसी स्मारिका के लिए मैंने 'साधारण की असाधारणता और बल्ली सिंह चीमा की कवि छवि' शीर्षक एक आलेख लिखा था जो किंचित संशोधित शीर्षक  के साथ वहाँ प्रकाशित  हुआ है। आज वही आलेख यहाँ सबके साथ साझा है....


साधारण की असाधारणता और कवि छवि
                                                           
* सिद्धेश्वर सिंह

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता में दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी और बल्ली सिंह चीमा की एक ऐसी त्रयी है जिसने अपनी ग़ज़लो के जरिए  हिन्दी पट्टी की पूरी पीढ़ी को अपने तरीके से प्रभावित किया है और निरन्तर कर रही है। देखा जाय तो जिसे हिन्दी कविता की मुख्यधारा कहा जाता है उसमें ये कवि  बहुत उल्लेखनीय नहीं माने जाते हैं और न ही  हिन्दी कविता की चर्चा - परिचर्चा और पढ़ाई - लिखाई के  परिदृश्य पर उनकी उपस्थिति को रेखांकित किया गया है। इन तीनो कवियों में  सबसे पहली समानता यह है कि इन्होंने  अपनी अभिव्यक्ति के लिए जिस काव्यरूप को चुना है वह  हिन्दी ग़ज़ल के नाम से जानी जाती है । निश्चित रूप से ग़ज़ल हिन्दी का पारम्परिक काव्यरूप नहीं है लेकिन  वह हिन्दी के लिए नितान्त  नई भी नहीं है। कबीर से  लेकर भारतेन्दु , निराला , शमशेर और अन्यान्य कवियों  ने इसे अपनाया है और शब्दों की मितव्ययिता तथा अभिव्यक्ति की अपार संभावना से युक्त इस विधा को सचमुच हिन्दी का अपना बना दिया है। दुष्यंत कुमार  ने इसे कवित्व और कथ्य के स्तर पर नव्यता दी  तथा  काव्यभाषा  को जनभाषा बनाकर  जन की बात कही तो दूसरी ओर  अदम गोंडवी ने एक कदम और आगे बढ़कर बिल्कुल खुले रूप में सामान्यजन के सुख - दुख को वाणी दी। इसी क्रम में बल्ली सिंह चीमा की ग़ज़लें भी भाव व भाषा की दृष्टि से अपना एक एक विशिष्ट स्थान रखती हैं और निरन्तर चर्चा में बनी हुई हैं।

बल्ली सिंह चीमा कवि हैं यह कहने - सुनने के बजाय यह अधिक कहने - सुनने को मिलता है कि  वह एक 'किसान कवि' हैं, एक ऐसा किसान जो खेतों में फसल तो बोता है कविता की खेती भी करता है। हिन्दी कविता की  परम्परा में  बल्ली सिंह चीमा का एक  विशिष्ट स्थान  है और उनके प्रशंसकों की एक  बहुत बड़ी कतार है तो इसके पीछे  क्या वजह हो सकती है? क्या इसके पीछे स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज की विसंगतियाँ , असमानतायें और वे विद्रूपतायें है जो उनके कथ्य का  अविभाज्य हिस्सा बनती हैं? क्या यह वह भाषा है जो जन की भाषा है जिसमें कवित्व कोई दूसरी दुनिया और दूसरी भाषा  नहीं है? क्या यह विचारों के उथल - पुथल  से भरे हमारे समकाल में  व्याप्त वह जनपक्षधरता है जो  तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद अब भी उम्मीद से भरी हुई है? क्या यह धूमिल की काव्य परंपरा है जिसमें कविता  एक वायवीय कर्म न होकर  भाषा में आदमी होने की तमीज है? बहुत सारे सवाल हो सकते हैं और उनके बहुत सारे जवाब भी तलाशे जा सकते हैं। काफी लंबे समय से  बल्ली सिंह चीमा  की कविताओं को पढ़ते - सुनते - गुनते हुए   बार - बार लगता  है उनके कवि का विकास निरन्तर हुआ है और कविता को लेकर  उनकी जो भी सार्वजनिक छवि हिन्दी में निर्मित हुई है वह बहुत कुछ उन कारणों से भी है  जो प्राय: कविता से बाहर की चीजें हैं ; दूसरे शब्दों में कहें तो ये वे चीजे हैं जो जो उनके काव्य के कथ्य में तो हैं ही, कथ्य के बाहर के संदर्भों में भी विद्यमान हैं। इसलिए जब भी उनकी कविताओं की बात होती है तो प्राय: भाव - विचार और कथ्य का उल्लेख ही प्रधान हो जाता है। यहाँ पर यह भी प्रश्न उठता है कि यदि हम कविता में कथ्य पर उंगली न रक्खें , उसके महत्व को स्वीकार अपने आसपास प्रसंगों और पारिस्थितिकी से न जोड़ें तो क्या उसे  मात्र एक कलारूप मानकर जीवन - जगत के संदर्भॊं से विलग कर  'काव्य विनोद'  तक सीमित कर दें?  इसी के साथ जुड़ा हुआ एक प्रश्न यह भी है कि  बल्ली सिंह  चीमा की कविता क्या केवल अपने कथ्य  एवं  समकालीन संदर्भॊं की प्रस्तुति के कारण बड़ी  है या उसमें  सामयिक - संदर्भ निरपेक्ष होकर कालजयी होने की  सचमुच ताकत निहित है जो देश- काल के परे भी कुछ कहने और कहलवाने में सहज सक्षम है?

कविता  में सामयिक , समकालीन व तात्कलिक संदर्भों का होना कोई नया  प्रसंग नहीं है। यह एक प्रकार से  ऐसी ताकत होती है जो  कवि को जन से  सीधे - सीधे जोड़ देती है और जनता को लगता है कि कवि भी  उसकी ही तरह एक सामान्य इंसान है और कविता कोई ऐसा विशिष्ट सांस्कृतिक कर्म नहीं है जिसका अपने समय व समाज से कोई लेना देना नहीं है। इस संदर्भ में  हम अपने आसपास नागार्जुन की बहुत सी  कविताओं  को सहज ही याद कर सकते हैं लेकिन  क्या यही सत्य है कि नागार्जुन की  कविता की समग्र पहचान क्या ऐसी ही कविताओं से निर्मित होती है? दूसरी बात यह भी है कि  एक लंबे समय  के गुजर जाने के बाद  परवर्ती पीढ़ी यदि किसी कविता को पढ़ती है तो  क्या उसे  अनिवार्यत: ऐतिहासिक संदर्भों को तलाशना ही होगा?  आइए , इस संदर्भ में  बल्ली सिंह चीमा की कविता से एक छोटा - सा  उदाहरण चुनते है :

मार्क्स कहे कुछ और, कमरेड कुछ और
इसीलिए चर्चित हुआ 'कामरेड का कोट'।

मान लीजिए कि ये दो पंक्तियाँ आज के उस पाठक के सामने प्रस्तुत हैं जो हिन्दी कविता का अपेक्षाकृत  नया पाठक तो है ही  आज की बदली हुई दुनिया में  देशकाल  को देखने समझने  का उसका  नजरिया भी वह नही है जो कविता की उत्सभूमि है तब यह पंक्ति क्या कहती व संप्रेषित करती  हुई  जान पड़ेगी है?  क्या इसे स्पष्ट करने के किए किताबों  - पत्रिकाओं के नए संस्करण में यह लिखा जाना चाहिए कि इस पंक्ति का संदर्भ प्रेमचंद द्वारा स्थापित पत्रिका 'हंस'  के राजेन्द्र यादव द्वरा संपादित  नए नए रूप के अमुक अंक में प्रकशित  कहानीकार सृंजय की लंबी  कहानी 'कामरेड का कोट' से  जुड़ता है जो मार्क्सवाद के व्यावहारिक द्वंद्व को एक साधारण कार्यकर्ता के  माध्यम से प्रस्तुत बेधक तरीके से  करती है अथवा यह कहा जाय कि मार्क्सवाद के संदर्भ में विचार व क्रिया की द्वंद्वात्मकता यहाँ  इन  पंक्तियों में प्रस्तुत हुई है?  निश्चित रूप से  इस काव्य पंक्ति में 'कामरेड का कोट'  से कहीं  अधिक व स्पष्ट संदेश कामरेड का कृत्य है। दूसरे शब्दों में यह कहने व करने का  वह विभेद है जो  हमारे समय को लगातार जटिल , जनविमुख और जर्जर बनाता जा रहा है। आइए यहीं पर  बल्ली सिंह चीमा की एक और पंक्ति को देखते हुए आगे बढ़ते हैं: :

अब भी लू में जल रहे हैं जिस्म अपने साथियो,
आइए,  मिलजुल के कुछ ठंडी हवा पैदा करें।

यह पंक्ति भी एक साधारण पंक्ति है जिसमें  मिलजुल कर लू में जलते हुए जिस्मों के लिए ठंडी हवा पैदा करने की बात की गई है। यह तो  इस पंक्ति का सामान्य अर्थ है जो काव्यार्थ में ढलकर दलित शोषित जनता की एकता और जहाँ कहीं भी अन्याय , अनीति व असमानता है उसके विरुद्ध निरन्तर संघर्ष की बात को प्रकट करती है। इस पंक्ति में साधारणता व सार्वदेशिकता तथा सार्वकालिकता है जो इसे एक काव्य पंक्ति के रूप  में प्रतिष्ठित करता है क्योंकि यह कहीं भी कभी लागू होने वाला सत्य बन जाता है । एक अच्छी कविता की यही पहचान है कि वह जिस  बात को कहना चाहती है वह सदैव एक जैसी रहती है क्योंकि उसकी बात मनुष्यता के पक्ष में होती है ; देशकाल व सामयिकता से निरपेक्ष सार्वजनीन व सार्वकालिक। यह अलग बात है कि उसमें सामयिक संदर्भ खोजे जा सकते हैं किन्तु वे संदर्भ बात को विस्तार देने वाले हों , उसे सीमित करने वाले नहीं। ऐसा कहने के पीछे आशय यह नहीं है कि बल्ली सिंह चीमा की कविताओं में कालजयिता के तत्व बहुत कम हैं और उनकी कविता मुख्यत:  सामयिकता से पूर्ण है। बात यह है कि हमारे आज के काव्य परिदृश्य पर बल्ली सिंह चीमा की जो कवि छवि निर्मित होती रही है वह मुख्यत: उन ग़ज़लों पर आधारित है जो कथ्य के स्तर पर अत्यधिक मुखर और वाचाल दिखाई देती हैं। वैसे यह कोई नई बात भी नहीं है हिन्दी की जनवादी कविता या हिन्दी में जो कवि जनकवि माने जाते हैं उनकी कविता के साथ इस तरह की बात बहुत पहले से होती रही है। यह प्रसंग पर तो निर्भर करता ही  है , पाठ भी इसमें कम महत्वपूर्ण नहीं है।

बल्ली सिंह चीमा के अब तक चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी चर्चा- प्रशंसा भी खूब हुई है। उन्हें कई  पुरस्कार व सम्मान भी मिल चुके हैं। वे हिन्दी के सचमुच लोकप्रिय और लोककवि हैं। आज के ऐसे समय में जब पूरे साहित्यिक परिदृश्य से गाँव जैसी चीज  लगभग  तिरोहित होती जा रही है तब वह निश्चित्त रूप से हमारे उन कवियों में से हैं  जो  सहज भाषा में आमजन की बात कहने में सक्षम हैं। यह सच है उनकी शुरुआती कविताओं में  एक खास किस्म की अनगढ़ता विद्यमान थी जो उन्हें एक तरह से भीड़ में अलग से पहचाने जाने का कारण भी बनी और कम से कम कवित्व में अधिक - अधिक सहज संप्रेषणीयता उनकी ताकत बनी ; वह दौर अब जा चुका है। जनता की लड़ाई भी अब उतनी सीधी व सपाट दिखाई देने वाली नहीं है तब कवि बल्ली सिंह चीमा को पढ़ना और हिन्दी कविता के बड़े परिदृश्य पर उनकी  उपस्थिति की छाप को ऐतिहासिकता के आईने में देखने की कोशिश करने पर  यह साफ दिखाई देता है कि  एक कवि के रूप में बल्ली सिंह चीमा  विकसित हुए हैं और  निरन्तर विकासमान हैं। यह विकास उनकी अपनी टेक से विचलन या विपर्यय नहीं है। हिन्दी में हुआ यह है  कि कुछ  चुनिंदा जिन ग़ज़लों के आधार  पर  बल्ली सिंह चीमा की कवि छवि निर्मित हुई है वह  उनके एक विपुल काव्य संसार को छोड़कर  निर्मित हुई है जिसमें प्रकृति है , प्रेम है और जीवन के  कठिन जीवन क्रियाकलापों से निकला जीवन दर्शन है। इधर की लिखी गज़लों में  बल्ली सिंह चीमा अपनी  पुरानी टेक के आसपास ही हैं क्योंकि वही उनकी केन्द्रीयता भी है फिर भी  न केवल कथ्य के स्तर पर बल्कि शिल्प के स्तर भी वह अपनी कवि छवि को तोड़ने में सतत संलग्न , सक्रिय व सन्नध दिखाई देते हैं। यह एक बड़ी और अच्छी बात है क्योंकि  एक पाठक की हैसियत से मैं इसे सामयिकता से कालजयिता की ओर  अग्रसर एक यात्रा के रूप में देखकर  प्रसन्न हूँ और आश्वस्त भी। और अंत में बल्ली सिंह चीमा की यह नई गज़ल जो सचमुच नई है और परंपरा का निर्वाह करते हुए नव्यता की नई राहें भी अन्वेषित करती जान पड़ती है : 

यूँ मिला आज वो मुझसे कि खफ़ा हो जैसे 
मैंने महसूस किया मेरी खता हो जैसे। 

तुम मिले हो तो ये दर -दर पे भटकना छूटा 
एक बेकार को कुछ काम मिला हो जैसे। 

जिंदगी छोड़ के जायेगी न जीने देगी 
मैंने इसका कोई नुकसान किया हो जैसे। 

वो तो आदेश पे आदेश दिये  जाता है 
सिर्फ़ मेरा नहीं दुनिया का का खुदा हो जैसे।   

तेरे होठों पे मेरा नाम खुदा खैर करे 
एक मस्जिद पे श्रीराम लिखा हो जैसे। 

मेरे कानों में बजी प्यार भरी धुन 'बल्ली' 
उसने हौले से मेरा नाम लिया हो जैसे। 
---------
( *  ऊपर स्मारिका की  विमोचन  छवि में दिखाई दे रहे हैं : बायें से वीरेन डंगवाल, से० रा० यात्री, बल्ली सिंह चीमा, मंगलेश डबराल, पंकज बिष्ट,रामकुमार कृषक और जसवीर चावला। स्मारिका अब पीडीएफ में भी उपलब्ध है यदि कोई मित्र इसे देखना - बाँचना - पढ़ना चाहते हैं तो अपना ई मेल पता दे सकते हैं। उनके साथ पूरी स्मारिका साझा कर हमें खुशी होगी )

शनिवार, 5 मई 2012

कविता के भीतर जो बारिश है : मोनिका कुमार की कवितायें

रेशम के कीड़े शाल में छुपे रहते हैं
धैर्य से टूटते रहते हैं
गेहूं के अंदर ही है घुन
मटर की आज्ञा है कि उसे सुंडिया खा जाएँ

आज प्रस्तुत हैं मोनिका कुमार की चार कवितायें। मोनिका जी चंडीगढ़ में   रहती हैं। सेक्टर 11 अवस्थित राजकीय कालेज  के अंग्रेजी विभाग में सहायक प्रोफेसर  के रूप में कार्यरत हैं। वह विश्व साहित्य की गंभीर अध्येता व अध्यापक  हैं , कविता प्रेमी हैं , अनुवादक  हैं , कवि हैं। उनकी कविताओं ने इधर कई जगहों पर  अपने टटकेपन , अंतर्वस्तु की वैविध्यता, अपनी - सी कहन और अपने देश - काल की खालिस भाषिक रंगत की सहज प्रस्तुति के कारण  ध्यान आकृष्ट किया है । आइए, हम भी इन कविताओं के साथ - साथ एक यात्रा  करते हैं...


मोनिका कुमार की कवितायें

01.  
             
विराट का मेरा प्रथम अनुभव है
तरबूज़  देखना
मैं अंदाजन कह पाती हूँ
कितना है प्यार तुमसे
हाथ भर
समन्दर जैसे
ज़रा भी नहीं
अंदाज़ा नहीं रहता
तरबूज़ देखते हुए
कितना होगा गुदगुदा
लाल
और कैसे सजी होंगी ढेरों आँखें समाधि में

तुम जिद्द पर अड़े रहे
धरती है संतरे सी गोल
नहीं माना तुमने
यह हो सकती है तरबूज सी

खैर !
मैंने झूठ कहा तुमसे
अंदाजन कह पाती हूँ
कितना है प्यार तुमसे

सारे अनुमान मेरी भाषा की नाकामी हैं
मुझे चाहिए कुछ विस्मयादिबोधक
उन्माद वाहक
जो करते हैं नाकामियों का
विनम्र अनुवाद

02. 

दिन का चढ़ा आधी रात तक उतरता है
अहिस्ता उतरती है रात दिन की सीढ़ियों से
और गुज़रा हुआ दिन टूटे हुए फूल की तरह
बिछ जाता है
इसी पहर उस फूल को किताब में रख के
आईने की तरह पढ़ती हूँ
रात दिन को विस्मृत करती है
दिन रात को रहने नहीं देता
दोपहर की अलसाई नींद
खुलते ही अवसाद करती है
जैसे नींद रात की धरोहर हो
जिसे दिन में लूट लिया जाये
दिन जैसा कुछ भी करना रात के एकांत को कष्ट देता है
रात में लिखी चिठ्ठी पढ़तुम को रात ही में पढ़नी चाहिए
लेकिन फिर भी चिठ्ठी खुलती है सिखर दोपहर
और पढ़तुम को ठीक समझ आती है
कवियों को लिखने चाहिए अपने राग के समय
कविता के भीतर जो बारिश है
उस में भीगने के लिए कब हाथ उठाने चाहिए
फिर भी कभी आप दिन में झुलस रहे हों
तो किसी बारिश सी कविता को याद किया कीजे
दिन और रात की संसृति में
मनचाहा मौसम है
जिन्हें आती है यह जादुगरियां
वह दिन में भी अपनी हर सांस सुनते हैं
और रात में दोपहर-खिड़ी से खिलते हैं

03. 

वृत का अर्धव्यास तय कर रहा है
वृत के फैलने की सीमा
केंद्र से हर बिंदु उतना ही दूर सुदूर
तुम्हारा एक पांव कम्पास की सुई है
जो दुसरे पांव के गिर्द घेरे बुनता है
सुई गोंद्ती रहती है हर वक़्त ज़मीन को
तुम फिसलते हो इस गोलाई से बाहर जाने के लिए
और तुरंत उठ खड़े हो जाते हो फैसला बदलकर

तुम्हारी बाजुएँ आकाश नापती है
और पांव धरती
तुम्हारे और अनगिनित दायरे हैं
इसीलिए मैं सबसे पहले तुम्हारे पांव चूमती हूँ
तुम्हारी बाजुएँ अब तक कितना नाप चुकी ?
तुम्हारे नाखून थक गये हैं
इनकी सख्ती बेवजह तो नहीं
इनका टूट जाना दुःख है
तुम्हारे पोरों की छतरी हैं यह नाखून
मुझे इनसे बेहद प्यार है

तुम्हे जो शब्द भाता है
उसे नाखून में छुपा लेते हो
लिखते हो तो वोह शब्द बहने लगते हैं
दिल से साहस रिसता है संग संग

नाखून टूटना दुःख है
तुम्हारे नाखून तुम्हारी यात्रा के स्तम्भ है
इनकी सख्ती तुम्हारे सबसे करीब शब्दों का कवच है
तुम्हारे नाखून तुम्हारे दिल से भी कोमल हैं

अपने पांव से कह दो के धरती अहिस्ता नापे
और बाजुएँ ध्यान से आकाश घेरें
मुझे तुम्हारे नाखूनों से बेहद प्यार है

04. 
 
तुम विराट के प्रेमी
मैं डिबिया की दीवानी
तुम नौका विहारी
मैं अपने लम्बे केशों से परेशान
तुम बनों के देवता
मैं आंगन की बेल
तुम ऋतूओं के सैलानी
मैं अक्षय कार्तिक की प्रभात
तुम इन्दधनुष धनी
मुझे पायल की दरकार

तुम ख्वाब का सौन्दर्य हो
मैं नियति की हरारत
मुझे देखा तुमने
और देखे नाचते हुए मोर
मैंने देखा तुम्हे
और प्रेम बिच्छुआ
----
* (चित्र कृति : पेट मैग्युकिन की पेंटिंग, साभार)

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

सन्नाटों की तहों के पार : गीता गैरोला की कवितायें

तुम्हारे खेत में आडू का पेड़
लक-दक भर जाये बैजनी फूलों से
और गाँव के ऊपर वाला जंगल
बुरांस के फूलों से जलने लगे
तुम मुझे याद करना...

खेतों की मुडेरों पर
खिलने लगे फ्योली के नन्हें फूल
जिंदगी के हर रंग में
तुम मुझे याद करना...

आज प्रस्तुत हैं गीता गैरोला की कवितायें। गीता जी देहरादून में रहती हैं। स्त्रियों के बीच , उनके साथ रहकर काम करती हैं। स्त्री अधिकारों और उनकी बेहतरी के लिए सतत कार्यरत राष्ट्रीय संस्था 'महिला समाख्या' के उत्तराखंड युनिट की  वह राज्य निदेशक हैं। ..और इससे अलग व महत्वपूर्ण यह है कि  वह उन लोगों में से एक हैं , जो खूब पढ़ते है , कम लिखते हैं तथा  जिनके पास साहित्य तथा समाज को देखने समझने की साफ दृष्टि  मौजूद होती है। आइए, इन कविताओं के संग - साथ चलते हैं हम भी ...


गीता गैरोला की कवितायें

०१- संयोगिता

संयोगिता
ये तेरे गालों के नीले निशान
बाहों पे खूनी लकीरें
किसने बनाई?

ये कल की बात है
धूम से गूँजी थी शहनाई
फलसई रंग के लहगें पर
ओढ़ी थी तूने सुनहरे गोटे वाली ओढ़नी
तेरे गदबदे हाथों पर
महकी थी मेंहदी मह -मह
प्रीत की लहक से
भर गई थी कोख
गर्वीली आँखों से सहलाती थी
जिन्दगी का ओर छोर।

कुछ तो दरक गया है कहीं
ये किस माया की छाया है संयोगिता
जो तू डोल रही है
बसेरे की खोज में
लिए तपता तन -मन
पीत की लहक मेंहदी की महक
कहाँ हिरा गई ?

तू इतना जान से संयोगिता
ठस्से से जीने को
जरूरी है एक दुश्मन।

०२- बुरी औरत

बोलती है
पूरा मांगती है आधा मिलने पर
उसकी आँखों से
झांकता है विरोध
अन्याय का अर्थ समझती है,
मार खाती रोती
जुबान चलाती है।

इच्छाओं आकाक्षाओं से भरी
घर की चाहर दीवारी की
शिकायत कर
बाहर झांकती है बुरी औरत।

०३- ढ़लते निश्चय

रोज होते हैं निश्चय
सुबह से ही शुरू हो जायेंगे छूटे काम
सुबह से दिन
दिन से शाम
शाम रात में ढ़लती है।

रात होते ही, घबराता है मन,
आज भी नहीं हुआ काम पूरा
कल जरूर होंगे शुरू

हमेशा होते हैं
ऐसे ही निश्चय।

०४- छोटे से घर में

जमीन पर बिछे बिस्तर में
बिखरी किताबों के बीच
कभी हंसते कभी नाराज होते
भोर के धुँधलके में
चहल कदमी करते
ताजे अखबार को
पहले पढ़ने के लिए झपटते।

तुम अपनी सैर के किस्से सुनाते
मैं जिद करती
कविताओं को सुनाने की
तुम्हारा ऊब कर जम्हाना
और मेरा चिढ़ जाना
दिन भर की नोक झोंक के साथ
सांझ का अकेलापन बांटते
सहलाते
स्पर्शो की छुअन से
मन की गहराई तक भीगते
हम दोनों।

०५- कहां छिपा है बसंत

नंगे दरख्तों की रगों में
कांच की परतों से ढ़के
नम पत्तों के नीचे
कहां छिपा है बंसत

सन्नाटों की तहों के पार
भूरे तिलस्मी जाल में
कहां छिपा है बसंत

घुघुती की नशीली टेर में
जो चीर देती है हवा का सीना
कहां छिपा है बसंत

सांसों की बूंदें कुरेदती हैं
मिट्टी का ओर-छोर
कहां छिपा है बंसत

धरती के दन्द-फन्दों के बीच
वक्त की नोक पर
कहां छिपा है बंसत

शब्दों के नाद में
नजरों के पंखों पर
कहां छिपा है बंसत ।
---
* पेंटिंग : स्वप्ना सुरेश काले / साभार गूगल।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

पेड़ की किसी शाख पर कौंधती बिजली की तरह जिंदगी


कल्पना पंत की कविताओं ने इधर बीच हिन्दी कविता के पाठकों व प्रेमियों का ध्यान खींचा है। पत्र - पत्रिकाओं में उनकी कवितायें आई है और 'फेसबुक' पर वह अपनी कविताओं व कविता पर गंभीर बातचीत में सक्रिय - सजग उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं उनकी तीन  कवितायें 'कर्मनाशा' की 'कवि साथी' सीरीज में आज प्रस्तुत की जा रही हैं।आप इन्हें देखें - पढ़ें - पढ़ायें।

कल्पना पंत  की  कवितायें

01- नदी बोलती है

नदी बोलती है
रुई के फाहों से
प्रवासी पक्षी
... उतरते हैं
शिवालिक पर
उँचे शिखरों पर
उदास
हैं वनस्पतियाँ
घिर आया है ठन्डे कोहरे का समुद्र
उड रहा है एकाकी पक्षी
अलकनंदा के
किनारे से
मैंने उठाई है मुट्ठी भर रेत
और बिखर गयी हूँ
शायद,
मैं ही क्रौंच हूँ
मैं ही व्याध
और मैं ही
आदिकवि

02 कोई अजनबी नहीं है

इन पगडंडियों से गुजरे हैं कई बार
कई रूप कई नाम
अपनी पहचान के साथ
कई बार सड्कों से गुजरते हुए
हर शहर बाशिंदों की पहचान  से जुड जाता है
और बाशिंदे जुड जाते हैं शहर की आत्मा के साथ
सुबह.  शाम,  रात.
गली.  सडक . चौराहे  पगडंडी
नुक्कड वाली पान की दुकान
से गुजरते हुए एक अबूझ पर्त में लिपटे हुए
जाने पहचाने चेहरे दिखते हैं.
अपने अंतस में समेटे हुए शहर की खुशबू को
मैं जहाँ से गुजरती हूँ
आँखें बंद कर मह्सूस करती हूँ
अपने भीतर के शहर को
वहाँ कोई आवरण नहीं है
शहर पूरा दॄश्य है
बचपन है, बचपन के साथी हैं
घर है
सब तो वही है
पर  आज उसी शहर में
सब कुछ अबूझ लगता है
मैं रुक रुककर लोगों को देखती हूँ
और उनमें अपनी पह्चान खोजती हूँ
पर सब में अजनबी चेहरे दिखते हैं
मैं  आँख मूँद लेती हूँ
और फिर भीतर के शहर को
महसूस करती हूँ
जहाँ मैं हूँ
मेरा बचपन
ठंडी हवा है
बाँज के पेडों से छनकर आती हुई
धूप पानी में झिलमिलाती हुई
मेरे साथ चलने लगती है हवा
पहाड बाहों में ले लेते हैं मुझे
अचानक गुजर गई मेरी मित्र लौट आती है
 कोई मुस्कुराता है
अपना ही परिचित चेहरा मुझे मिल  जाता है
और मैं जहाँ हूँ वहाँ से एकाकार हो जाती हूँ
हर शहर
मेरा शहर है
वहाँ की मिट्टी की
गन्ध समायी है मुझमें
और कोई अजनबी नहीं है.

03- अक्स

पेड़ की किसी शाख पर
कौंधती बिजली की तरह जिंदगी
आँधी के किसी झोंके में
डोलती फुनगी
जैसे काँप रही है।
कविता की ऊँचाई से
समुद्र की गहराई तक
जिसका अक्स था
उसने उस फुनगी को
झकझोर कर
कोमल पत्तों को
तोड़ दिया।
अब दर्पण में सिर्फ
नग्न शाख है
जिसमें अपना अक्स
दिखाई देता है।
यथार्थ, विकृत
बिम्बों के परे जिन्दगी
सच कितनी
मुश्किल है।
----------
* पेंटिंग : मारिया किटानो , साभार गूगल।


**  कल्पना पंत की कुछ और कवितायें हिन्दी ब्लॉग ठिकाने 'अनुनाद' व 'उदाहरण' पर पढ़ी जा सकती हैं। उनका अपना ब्लॉग है  दृष्टि'।'उत्तरा' महिला पत्रिका के नए अंक में  उनकी तीन कवितायें पढ़ने को मिली हैं।)

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

नदी अपने आईने में अक्स देखेगी

...the river has water enough
to be poetic !


अभी एकाध दिन पहले अपने एक पसंदीदा ब्लॉग '...चाँद पुखराज का..' पर एक कविता पढ़ते हुए मशहूर भारतीय अंग्रेजी कवि ए.के.रामानुजन की कविता 'A River' की याद हो आई , उसे पढ़ लिया  तो इसी क्रम में केदार जी (केदारनाथ अग्रवाल) की कविता 'नदी आज उदास थी' की भी याद आई, उसे भी पढ़ा और ममांग दाई की 'River Poems' की कविताओं से भी खूब गुजरना  हो गया। यह सब तब हुआ जब अपने आसपास न तो कोई नदी थी और न ही उसमें प्रवाहित होने वाला जल। रात के एकांत में अपने घोंसले में  दुबककर बैठे एक पाखी की मानिंद संवाद व एलालाप करते एक कविता के बहाने कई - कई कविताओं की नदी बह चली। नवारुण भट्टाचार्य कहते हैं - 'आखिर एक अकेली कविता / मचा सकती है कितना कोलाहल' ,खैर कोलाहल मचा और 'तुमुल कोलाहल कलह में हृदय की बात' सुनते हुए उसी प्रवाह में  अपनी (भी)  यह कविता लिखी गई। आइए इसे  देखें...साझा करें..



नदी : राग विराग
                   ( सिद्धेश्वर सिंह )
नदी की
उदासी का हाल
बतायेंगी मछलियाँ
मछलियों की उदासी
प्रतिबिंबित होगी जल में - जाल में।

जाल की उदासी से
उदास हो जायेंगे मछुआरे
मछुआरों की उदासी
बाजार में भर देगी सन्नाटा।

जैसे - तैसे बीत जाएगा
एक अकेला दिन
शाम होगी उनींदी
रात उतरेगी चुप्पी से लबरेज
और आकाश के काले कैनवस पर
उभरने लगेगी उदास चाँद की पेंटिंग।

नदी अपने आईने में
अक्स देखेगी
अजनबी - सी लगेगी उसे अपनी पहचान।
खिन्न करेगा
मन:स्थिति का मारक विस्तार।

नदी उठेगी
निहारेगी अपने इर्दगिर्द
दुरुस्त करेगी अपने वाद्ययंत्र
अंजुरी भर जल पीकर
खँखारकर ठीक करेगी अपना रुँधा गला
और समय के रंगमंच पर
छेड़ देगी कोई नया राग।

शनिवार, 4 सितंबर 2010

जैसे कि कोई सजल सरिता समुद्र की विशालता में हो जाती है विलीन


रानी जयचंद्रन मलयालम और अंग्रेजी की युवा कवि हैं जो केरल के एक छोटे से कस्बे वर्कला  में रहती हैं। पिछले बरस उनकी अंग्रेजी कविताओं से परिचय हुआ था और इसके माध्यम बने थे बड़े भाई शिवाजी कुशवाहा जो  आजकल रायपुर में अंग्रेजी पढ़ाते हैं। रानी जी ने बड़ी उदारता से अपनी किताब 'ईकोज आफ़ साईलेंस' भिजवाई और उसमे संकलित कविताओं को पढ़कर लगा कि समकालीन भारतीय अंग्रेजी कविता, मैं जितनी भी, जैसी भी  पढ़ पाता हूँ, उसमें यह एक नया और अलग - सा स्वर है जिसे हिन्दी कविता के पाठकों और प्रेमियों से अवश्य परिचित कराया जाना चाहिए। रानी जयचंद्रन की इस कविता - पुस्तक में कुल 22 कवितायें संकलित हैं जो कवितायें समकालीन भारतीय अंग्रेजी कविता के उस रूप - स्वरूप से परिचित कराती हैं जो अपनी जड़ों से गहराई तक संबद्ध है. ये कवितायें अपने निकट की प्रकृति तथा परिवेश से मात्र रागात्मकता और रुमानियत ही ग्रहण नही करतीं बल्कि जीवन - जगत की चुनौतियों व संघर्षों से टकराने के लिए भरपूर ऊर्जा और उत्साह भी हासिल करती दिखाई देती हैं और ऐसा करते हुए वे न तो सपाटबयानी पर उतरती नजर आती हैं और न ही कोई वक्तव्य या सूत्रवाक्य बन कर रह जाती हैं. लयात्मकता , सीधी सरल भाषा , आत्मपरक कहन शैली और लाउड हो जाने से बचने का सचेत आत्म - अनुशासन इस संग्रह की कविताओं की कुछ अन्य खूबियां हैं जो इसे रेखांकित करने योग्य बनाती हैं.  तो इस तरह शुरू हुआ रानी जी की कविताओं के चयन और अनुवाद का क्रम जो अब भी छिटपुट तरीके से चल ही रहा है। इस सिलसिले की शुरूआत में जब एकाध जगह अटकना हुआ तो स्वयं कवि ने आगे बढ़कर मदद की। इस मोड़ पर पता चला कि कवि को कामचलाऊ हिन्दी ठीक से नहीं आती, हालाँकि सामान्य हिन्दी वार्तालाप वे समझ - बूझ लेती हैं  और अनुवादक को मलयालम की बिल्कुल जानकारी नहीं। हमारे संवाद के माध्यम के रूप में अंग्रेजी भाषा का एक पुल है जिस पर कविता के पाँवों के चमकीले निशान हैं जिन्हें देखते - पहचानते- परखते भाषा के अवरोध को परे करने का उपाय किया गया  है।

इस बात की बहुत खुशी है रानी जयचंद्रन  जी ने मेरे द्वारा किए गए अनुवादों को मलयालम - अंग्रेजी के जरिए अपने संस्थान के एक हिन्दी जानने वाले साथी के माध्यम से समझा है और सराहना की है । उनकी कविताओं के   अनुवाद 'कबाड़ख़ाना' पर आए हैं  , पसंद किए गए थे  और एक दिन पता चला कि इंदौर वासी हमारे मित्र मशहूर युवा चित्रकार रवीन्द्र व्यास ने 'जादुई प्यार' शीर्षक कविता से प्रेरित होकर एक पेंटिंग बनाई है और इस कविता में / कविता के जरिए प्रेम के झीने - गझिन, दृश्य - अदृश्य तंतुओं की तलाश करते हुए एक बहुत ही सुन्दर आलेख 'वेब दुनिया' के पन्नों पर लिखा है। यह सब मेरे लिए बहुत अद्भुत और अनोखा -सा अनुभव है क्योंकि मैं तो बस हिन्दी की साहित्यिक दुनिया की हलचलों - गतिविधियों- उठापटक से बहुत दूर चुपचाप हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे - से गाँव के अपने घोंसले में रहकर एक साधारण - सा जीवन जीते हुए, नून - तेल - लकड़ी की चिन्ताओं व जीवन के राग - विराग - खटराग के बीच समय निकाल कर  अपनी पसंद की कुछ चीजों से बतियाते हुए इक्का - दुक्का कागज काले करता रहता हूँ। बीती शाम आज की पीढी़ के बहुत ही समर्थ व संभावनाशील कवि मित्र केशव तिवारी का फोन आया और उन्होंने रानी जी कविताओं के मेरे अनुवादों की तारीफ की । लगभग दो सप्ताह पहले इन्हीं अनुवादों का जिक्र इस साल के प्रतिष्ठित 'सूत्र सम्मान' से सम्मानित किए गए कवि - मित्र महेश पुनेठा ने भी किया था। यह जानकर अच्छा लगा कि दो अच्छे लोग मेरे काम को अच्छा जैसा कुछ  कह रहे हैं नहीं तो अपनी हिन्दी की साहित्यिक दुनिया में तो अनुवादक नामक जीव तो प्राय: नेपथ्य में ही रह जाता है और अक्सर उसका उल्लेख आधे - अधूरा शब्द 'अनु०' लिखकर निपटा जैसा दिया जाता है।

आज की डाक में 'पांडुलिपि' पत्रिका का प्रवेशांक आया है जिसमें मेरे द्वारा अनूदित रानी जयचंद्रन की तीन कवितायें प्रकाशित हुई हैं। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान , रायपुर ,छतीसगढ़ द्वारा प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्रिका ( प्रमुख संपादक ; अशोक सिंघई / कार्यकारी संपादक ; जयप्रकाश मानस / पता : 'सिंघई विला' , ७-बी, सड़क : २०, सेक्टर : ५, भिलाईनगर , छतीसगढ़ , पिन : ४९०००६, भरत/ ई मेल : pandulipipatrika@gmail.com) का प्रवेशांक वृहदाकार है पौने चार सौ पृष्ठों का और मूल्य है २५ रुपये मात्र। क्या ही अजीब बात है कि पच्चीस रुपये की यह किताब ३५ रुपये के डाकखर्च पर मेरे ठिकाने तक पहुँची है! इस अंक को अभी तो बस उलट - पुलट कर देख पाया हूँ । धीरे- धीरे इसे पढ़ा जाएगा और इस पर कुछ लिखा भी जाएगा। इसका आवरण आकर्षक है - गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की पेंटिंग से सुसज्जित। 'पांडुलिपि' का उल्लेख अभी केवल इसलिए कि इसमें रानी जयचंद्रन की कविताओं के मेरे तीन अनुवाद प्रकाशित हुए है जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है। हिन्दी कविता के पाठकों और प्रेमियों के लिए एक सूचना और हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में अपने लिखे - पढ़े को साझा करने के उपक्रम में आज और अभी रानी जयचंद्रन की तीन कवितायें प्रस्तुत कर रहा हूँ :













रानी जयचंद्रन की तीन कवितायें                       
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )
             
०१-अनंत जीवन 
                                                
घाटी की ढलानों पर                                                 
ऐश्वर्य के मुकुट की तरह       
फिर खिला है कुरिन्जी*
बारह बरस के बाद.
नर्म - नाजुक फुहार और
मंद - मंथर हवा के सानिध्य में
डोल रही हैं
जामुनी- नीले रंग के फूल की चपल आँखें.

खूब गहरे तक धँसकर
पंखुड़ियों को चूमती हैं सूरज की किरणें
और उनमें भर देती हैं सुर्ख रंगत की सजावट .
चंद्रमा की रोशनी से नहाई हुई रात में
फैलता ही जा रहा है
ढलानों पर धीर धरी धरती का खिंचाव.

प्रेम की ऊष्मा से छलछलाती हवा
फुसफुसाहटों में करती आ रही है कोई बात
ठगी ठिठकी गंभीर हो ठहर जाती है
देर तक इस जगह.
और शान्त तैरता हुआ बादल
गाने लगता है
एक अकेले दिवस का
कभी न खत्म होने वाला गौरवगान .

बारह बरस के बाद.
फिर खिला है कुरिन्जी
मंद - मंथर हवा के सानिध्य में
डोल रही हैं
जामुनी - नीले रंग के फूल की चपल आँखें.

०२- जादुई प्यार

अस्ताचल के आलिंगन में आबद्ध
डूबता सूरज
समुद्र से कर रहा है प्यार
इस सौन्दर्य के वशीकरण में बँधकर
देर तक खड़ी रह जाती हूँ मैं
और करती हूँ इस अद्भुत मिलन का साक्षात्कार.

प्यार की प्रतिज्ञाओं और उम्मीदों से भरी
भीनी हवा के जादुई स्पर्श से
अभिभूत और आनंदित मैं
व्यतीत करती हूँ अपना ज्यादातर वक्त
यहीं इसी जगह
और मुक्त हो देखती हूँ
जल में काँपते चाँद को बारम्बार.

इस अद्भुत मिलन के दृश्य से
भीगकर भारी हुई पृथ्वी
खड़ी रह गई है तृप्त -विभोर.
और चाँदनी की रश्मियों से चित्रित
बनी - अधबनी छायायें
फैलती ही जाती हैं वसुन्धरा के चित्रपट पर
यहाँ वहाँ हर ओर.

०३- एक दिव्य जलयात्रा

जब प्रसन्नता से परिपूर्ण मैं
अग्रसर हूँ खेती हुई एक नाव
तो सुनाई दे रही है एक लयबद्ध ताल
क्या यह प्रवाह से भरे जल की ध्वनि है ?
अथवा आवाज है मेरे भीतर हिलोरें मारते आह्लाद की ?
क्या यह स्पंदन है मेरे हृदय का ?
या फिर
कोई आलाप है हाँफते हुए मन - मस्तिष्क का ?

मन्द शीतल हवा
जो संदेशवाहि्का है
पुष्पित होते चंपक की भीनी सुवास की
वही इस क्षण उर्ध्वमान किए जा रही है अंतरात्मा को
स्वर्गिक ऊँचाइयों की ओर
और जिसने मेरे मस्तक पर सजा दिया है
सुबह - सुबह की धुन्ध का दिपदिपाता मुकुट।

घास चरते मृग , चह - चह करते विहग
गीत गाती कोकिल , प्रस्फुटित होते पुष्प
नर्म - नाजुक तृण , छाया बाँटने वाले वॄक्ष
कुमुद की पंखुड़ियों पर जमे हुए तुहिन कण..
समूचे दृश्य को बना रहे हैं देवताओं का उपवन - देवोद्यान
जिसमें अवतरित हो रहा है
स्वर्गिक आभा का सहज सतत समुच्चय।

कोहरे में स्नात सघन वन प्रान्तर से
झाँक रहे हैं सुनहले किरणों के पुंज
रुपहली ढलानों पर फिसल रहा है रश्मित आलोक
जिसकी छुवन से पिघल रही है जमी हुई ओस
और छितरा रही है छोटी- छोटी बूँदें
जो समीरण के वेग में प्रशान्ति भर कर
इस सुन्दर दृश्य को बनाए जा रही हैं एक रहस्यपूर्ण संसार।

मैं सुन रही हूँ...सुन रही हूँ
मन्द हवा की आहट - सरसराहट
बहुत स्पष्ट है
अपनी ही लहरों से भरी यह लोरी
जो मेरे अशक्त अंतस में आह्लाद कर
उसे हिरन की तरह
चौकड़ियाँ भरने को प्रेरित कर रही है लगातार।

क्या मैं लम्बे समय तक खेती रह सकूँगी यह नाव ?
क्या मैं अकेले ही देखती रहूँगी
प्रकृति का यह अनुपम उपहार
यह दृश्य
जिसमें समाहित हुआ है दिव्यता का दिव्य भाव ?

अब जबकि बिन माँझी की मेरी नौका
सौन्दर्य से भरे तट तक पहुँचने से है बस थोड़ी ही दूर
देखती हूँ कि नाविक तो बैठा है बिल्कुल पास
अपनी थपकियों से मेरी व्याकुलता का शमन करता
धीरे - धीरे पतवार चलाता
जैसे रची जा रही हो कोई शोभाकृति चुपचाप.
मेरे ह्रूदयस्थल में अंकुरित होने लग गई हैं
कोमल भावनायें अकस्मात
और पंखों को फैलाकर गंतव्य की ओर भरने लगी हैं उड़ान
मैं स्वयं को समर्पित कर देती हूँ
जैसे कि कोई सजल सरिता
समुद्र की विशालता में हो जाती है विलीन।

प्रेम की वाणी से पूरित चुप्पी और एकान्त ने
प्रार्थनाओं से भर दिया हैं मेरे अंतर्मन को
इस उदात्त ऊष:काल में बह जाने दो मुझे
हो जाने दो मग्न मुग्ध मुदित बेपरवाह।

कोई विघ्न न डाले
वरदान से आप्लावित इस मन:लोक में
कोई नष्ट न कर दे
इस स्वर्गिक संसार को
प्रेम के शाश्वत प्रतीक
कृष्ण की तरह और राधा की तरह
अनश्वरता से सहेज लेने दो इस अद्भुत जलयात्रा को
जो मुझे बनाए जा रही है
तुम्हारा एक सच्चा साथी और एक प्रसन्नचित्त दोस्त।

*



* कुरिन्जी : दक्षिण भारत की नीलगिरि पर्वतमाला और केरल के कुछ इलाकों में पाया जाने वाला फूल है जो बारह वर्ष में एक बार खिलता है और विस्तृत पहाड़ी ढ़लानों को स्वर्गिक आभा से भर देता है. 'नीलगिरि' नामकरण वस्तुत: इस जामुनी - नीले रंग के फूल की ही महिमा का ही मूर्त रूप है. कुरिन्जी दक्षिण भारत के साहित्य , चित्रकला , संगीत, सिनेमा और लोक जीवन से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है.

शनिवार, 21 अगस्त 2010

कविता में केलंग और केलंग की कविता



* टिप्पणी ( २३ अगस्त २०१० / ३.५८ बजे  / दोपहर बाद )  : यह पोस्ट परसों रात को लगाई थी। सुबह - सुबह मयंक जी के मेल / फोन से पता चला कि इस पूरी पोस्ट का पाडकास्ट अर्चना चावजी ने तैयार किया है। उसे सुना तो अच्छा लगा कि मेरे जैसा आलसी व्यक्ति 'कर्मनाशा' पर कुछ यूँ  - सा लिखता है तो उसे पढ़ा व पसंद भी किया जाताहै। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में साझेदारी बहुत जरूरी है। मुझे खुशी है कि यह पोस्ट साझेदारी का एक अच्छा उदाहरण कही जा सकती है क्योंकि कवितायें अजेय जी की हैं, पाडकास्ट अर्चना चावजी ने तैयार किया है और इसके निमित्त मयंक जी बने हैं। मैं तो बस प्रस्तुतकर्ता भर हूँ। पिछले एक दिन से मेरे टेलीफोन और इंटरनेट का हाल बेहाल था बस अभी कुछ देर पहले ही उसकी तबीयत दुरुस्त हुई है सो अजेय जी, मयंक जी और अर्चना चावजी के साथ धन्यवाद बी. एस. एन.एल. की डाटावन सेवा को भी। अब इस पोस्ट को पढ़ते हुए अर्चना चावजी के सधे और सुस्पष्ट स्वर में सुना भी जा सकता है। उन्हें बहुत - बहुत धन्यवाद ! तो आइए सुनते हुए पढ़ें या पढ़ते हुए सुनें। 


 

*
वह आता है
जैसे तितलियों का झुण्ड

विराजता है
जैसे सम्राट

और खिसक जाता है
जैसे चोर .

ऊपर लिखी पंक्तियाँ अजेय की है;वही अजेय जो हिन्दी का सुपरिचित कवि है। अजय केलंग में रहते है। केलंग हिमाचल प्रदेश के लाहुल - स्पीति जिले का मुख्यालय है। हमारे लिए रोहतांग जोत के पार का वह इलाका जो 'दुर्गम' कहा जाता है। अभी कुछ महीने पहले तक यह मेरे लिए 'दूसरी दुनिया' थी और यहाँ के बारे में जो भी जानकारी थी वह किताबो ,किस्सों ,पत्र- पत्रिकाओं और इंटरनेट के आधार पर निर्मित थी। इसी साल मई के आखीर में कुछ ऐसा संयोग बना कि केलंग तक हो आया और ऊपर लिखी पंक्तियों के 'वह' को देख - मिल आया। 'वह' बोले तो कौन? 'वह' यानि बर्फ़ / बर्फ़बारी / हिम / ह्यूँद..। हमारे कविमित्र विजय गौड़ ने लिखा है कि उनके लिए केलंग का मतलब अजेय है अर्थात केलंग = अजेय या अजेय = केलंग। हिन्दी साहित्य की दुनिया के चलते - फिरते इनसाइक्लोपीडिया बड़े भाई वाचस्पति ने भी फोन पर चेताया कि केलंग जा रहे हो तो अजेय से जरूर मिलना। अब मैं उनसे क्या कहता कि केलंग के मेरे आकर्षणों में अजेय का नाम सबसे ऊपर है क्योंकि कविताओं में मैं जिस इंसान को मैं देखता आया हूँ वह कुछ अलग - सा लगता है। इसलिए नही कि कि वह एक 'अलग -सी दुनिया' में रहता है जो आमतौर पर 'दुर्गम' है, 'भीषण सुन्दर' है बल्कि वह उस परिवेश की बात करता है जो हिन्दी साहित्य के जरिए बहुधा रुमानी बनाकर पेश किया जाता रहा है मानो धुर हिमालयी दुनिया एक अलग द्वीप है सौन्दर्य ,रहस्य और अध्यात्म की धुंध लिपटी - सिमटी ;गोया वहाँ मनुष्य रहते ही न हों। अजेय अपनी कविताओं में वहाँ की माटी, मनुष्य और मौसम की बात सीधे , सहज सरल शब्दों में करते हैं ।यह एक ऐसी सहजता है जो संवेदना और शब्द के प्रति सच्ची ईमानदारी से उपजती है।


यह ठीक है कि केलंग की दुनिया एक अलग - सी दुनिया है; एक ऐसी दुनिया जो जाड़े महीनों के लिए शेष दुनिया से विलग हो जाती है किन्तु वह दूसरी तरह के मनुष्यों की दुनिया नहीं है। वह इसी दुनिया के मनुष्यों का एक संसार है सुख - दु:ख की साझी साधारणता में सीझता हुआ। केलंग की ढेर सारी तस्वीरें मेरे कैमरे में कैद है और स्मृतियों में वहाँ बिताए चार - पाँच दिन - रात के सिलसिले। कविताओं से परे कवि अजेय से मिलना और एक अच्छे इंसान से मिलने का सुख पाना। केलंग तस्वीरों में बहुत सुंदर दिखाई देता है । तस्वीरों से बाहर और परे भी वह कम सुंदर नहीं है। सुख - सुविधाओं के साजो सामान से परिपूर्ण होटल चन्द्रभागा की खिड़की से भी वह बहुत सुन्दर दिखाई देता है।जनजाति संग्रहालय में भी उसकी खूबसूरती के नमूनों का संग्रह है। बर्फ़बारी में भी वह सौन्दर्य से भरपूर नजर आता है। आरामदेह गाड़ी की फ्रंट सीट पर बैठकर कैमरा क्लिकाते हुए भी वह बेहद भला - सा लगता है लेकिन क्या वह इतना भर ही है? क्या इतने भर में ही हम केलंग को पकड़ पाते हैं? आइए देखते है कि केलंग के वासी अजेय की कविताओं में कैसी दिखती है केलंग की दुनिया :



अजेय की चार कवितायें

केलंग-१ / हरी सब्जियाँ

'फ्लाईट´ में सब्ज़ी आई है
तीन टमाटर
दो नींबू
आठ हरी मिरचें
मुट्ठी भर धनिया

सजा कर रखी जाएँगी सिब्ज़याँ
`ट्राईबेल फेयर´ की स्मारिका के साथ
महीना भर

जब तक कि सभी पड़ोसी सारे कुलीग
जान न लें
फ्लाईट में हरी सब्ज़ियाँ आई है।
----

केलंग-२ / पानी

बुरे वक़्त में जम जाती है कविता भीतर
मानो पानी का नल जम गया हो

चुभते हैं बरफ के महीन क्रिस्टल
छाती में

कुछ अलग ही तरह का होता है, दर्द
कविता के भीतर जम जाने का

पहचान में नहीं आता मर्ज़
न मिलती है कोई `चाबी´

`स्विच ऑफ´ ही रहता है अकसर
सेलफोन फिटर का।
-----

केलंग-३ / बिजली

`सिल्ट´ भर गया होगा
फोरवे´ में
`चैनल´ तो शुरू साल ही टूट गए थे

छत्तीस करोड़ का प्रोजेक्ट
मनाली से `सप्लाई´ फेल है
सावधान
`पावर कट´ लगने वाला है

दो दिन बाद ही आएगी बारी
फोन कर लो सब को
सभी खबरें देख लो
टी० वी० पर
सभी सीरियल

नहा लो जी भर रोशनियों में खूब मल-मल
बिजली न हो तो
ज़िन्दगी अन्धेरी हो जाती है।
----

केलंग-४ / सड़कें

अगली उड़ान में `शिफ्ट` कर दिया जाएगा
`पथ परिवहन निगम´ का स्टाफ

केवल नीला टैंकर एक `बॊर्डर रोड्स´ का
रेंगता रहेगा छक-छक-छक
सुबह शाम
और कुछ टैक्सियाँ
तान्दी पुल-पचास रूपये
स्तींगरी-पचास रूपये

भला हो `बोर्डर रोड्स´ का
पहले तो इतना भी न था
सोई रहती थी सड़कें, चुपचाप
बरफ के नीचें
मौसम खुलने की प्रतीक्षा में
और पब्लिक भी

कोई कुछ नहीं बोलता ।
------
( अजेय और केलंग की तस्वीरें पोस्ट लेखक की मई २०१० यात्रा की हैं। कुछ और तस्वीरें जल्द ही )