गुरुवार, 10 जून 2010

यात्रा और उसके बाद


'कर्मनाशा' पर लगभग महीने भर बाद वापसी हो रही है. कल सत्रह दिनों की यात्रा के बाद विराम पाया और खूब जी भरकर सोया. २३ मई की सुबह घर से निकलना हुआ था और ९ जून को वापसी हुई.इस बीच लिखत - पढ़त के साथ खूब घुमक्कड़ी भी हुई. जहाँ एक ओर धूप और घाम के साथ लू के थपेड़े झेले वहीं बारिश और बर्फ़ के बीच भीगने का आनंद भी पाया.बैग में बरते हुए कपड़े हैं तो कई किताबें भी जिन पर कुछ लिखना है. काम बहुत है.धीरे - धीरे सहेजना है सब कुछ.आज और अभी तो बस कुछ छवियाँ जो अपने मोबाइल से खींची गई हैं :

                        

छुक -छुक चलती जाती रेल

शिखरों पर सूरज की आभा

एकान्त में डूबा केलंग

बुद्ध पूर्णिमा की झाँकी

बर्फ़बारी के बाद केलंग


फिर सुबह , फिर सूरज का जादू
--------------------------------------------

( यात्रा की कुछ छवियाँ यहाँ भी)

10 टिप्‍पणियां:

माधव ने कहा…

ये केलोंग स्पीती वाला है ना !

sidheshwer ने कहा…

जी हाँ

Jandunia ने कहा…

इस पोस्ट के लिेए साधुवाद

शरद कोकास ने कहा…

अच्छा तो आप घूम भी आये ..अच्छा लगा यह तस्वीरें देख कर ।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

भ्रमण के बाद वापसी पर स्‍वागत है भईया, आगामी पोस्‍टों का इंतजार है.

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया तस्वीरें.

Indli ने कहा…

Your blog is cool. To gain more visitors to your blog submit your posts at hi.indli.com

hem pandey ने कहा…

पहाड़ों की सुन्दर तस्वीरें हैं. आशा है इन पहाड़ों का विवरण भी पढ़ने को मिलेगा.

अजेय ने कहा…

बढ़िया है. लेकिन केलंग स्पिति में नहीं, लाहुल में है.

niranjan dev sharma ने कहा…

दोस्तों से अर्ज़ है केलंग फोटोग्राफस में जो दिखता है वही नहीं है जो कविता में उभरता है वह भी है। सैलानी के नजरिए के साथ साथ पाठकीय प्रतिक्रिया का भी इंतजार है।