शनिवार, 19 जून 2010

के पतिआ लए जाएत रे मोरा प्रियतम पास

के पतिआ लए जाएत रे
मोरा प्रियतम पास
हिय नहिं सहए असह दुख रे
भेल साओन मास।
हिन्दी साहित्य की परिधि में आने वाली / पढ़ी - पढ़ाई जाने वाली विभिन्न बोलियों / उपभाषाओं और भाषाओं के क्लासिक साहित्य को पढ़ना हमेशा नया - सा पढ़ने जैसा लगता है। हर बार उसमें से कुछ नया - सा निकलता दीखता है और हर बार ऐसा लगता है कि कुछ तो है इन्हें कालजयी बनाए हुए है। मैथिल कोकिल और अभिनव जयदेव कहे जाने वाले विद्यापति की पदावली हमेशा से कविता के प्रेमियों के लिए आकर्षण का विषय रही है।इस बीच जब भी नया साहित्य पढ़ते - पढ़ते मन उचाट होने लगता है तो विद्यापति की साहित्य सरिता में स्नान करना बहुत भला लगता है। कई बार मन हुआ है कि विद्यापति को अपने तरीके से , अपने द्वारा बरती जाने वाली बोली बानी में री-राइट किया जाय। यह काम हाल ही शुरू किया है। यह अनुवाद नहीं है। पुनर्रचना है , एक तरह से पुनर्सृजन। एक कालजयी रचनाकार के प्रति अपने आदर और सम्मान का काव्यात्मक प्रकटीकरण जैसा एक छोटा - सा काम या ऐसा ही कुछ। आज अपनी प्रिय पुस्तक 'विद्यापति' ( डा० शिवप्रसाद सिंह ) में संकलित पद संख्या : ७९ पुनर्रचना की शक्ल में प्रस्तुत है :

के पतिआ लए जाएत रे मोरा प्रियतम पास
( महाकवि विद्यापति के पद की पुनर्रचना )

कोई है !
जो ले जाए यह पाती
प्रियतम के पास
मेरा हृदय सह नहीं पा रहा है
यह असह्य दु:ख
जबसे आया है सावन मास।

कठिन है
प्रिय विहीन इस भवन में
एकाकी वास
दूसरे का कष्ट किसे लगता है दारुण
संसार क्योंकर करे
मेरी बात का विश्वास।

मेरे मन का
हरण कर ले गए हरि
और अपना मन भी ले गए साथ
त्याग दिया गोकुल
हो गए मधुपुर वासी
हम बैठे ही रहे धरे हाथ पर हाथ।

कवि विद्यापति ने गाया यह गीत
और कहा -
धन्ये ! मत छोड़ो प्रियतम की आस
बस आने ही वाले हैं मनमीत
अब दूर नहीं है मिलन
देखो तो दौड़ता चला आ रहा है कार्तिक मास।
---------
( चित्र : राजा रवि वर्मा की कलाकृति - राधा माधव)

4 टिप्‍पणियां:

pratibha ने कहा…

bahut sundar hai ye punarrachna...

अमिताभ मीत ने कहा…

सर !! कविता के बारे में कोई क्या कहे ...

आप का यह प्रयास ... (इसे प्रयास कहूं ?) .......... इस का ह्रदय से स्वागत है ..

हालांकि मुझ मंदबुद्धि को हिंदी साहित्य की परिधि में आने वाली कुछ बोलियाँ समझ में आती हैं ...... लेकिन ... अब ये चाहे किन्हीं कारणों से हो .... मुझे विद्यापति जैसे महान कवियों को पढने - समझने के ज़्यादा मौक़े नहीं मिले ... ईमान की कहूं तो ये कि ज़्यादा मौक़े मैं ने तलाशे नहीं ...

बहरहाल...... आप का .... आप की इस पोस्ट का ... शुक्रिया !!

पारूल ने कहा…

silsila jari rakhiye aap to...

शरद कोकास ने कहा…

रचना भी और पुनररचना भी खूबसूरत