बुधवार, 17 मार्च 2010

हिन्दी , भूमंडलीकरण ,अनुवाद , कविता ,ब्लागिंग और मेरठ विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय सेमीनार की याद

पिछले माह की १२ - १४ तारीख को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा 'भूमंडलीकरण और हिन्दी' विषयपर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमीनार सफलता पूर्वक संपन्न हो गया जिसकी विस्तृत रपटें समाचार पत्रों , पत्रिकाओं , वेबसाइट्स और ब्लाग्स पर प्रकाशित हुई हैं / हो रही हैं। हिन्दी भाषा के हृदय - स्थल मेरठ में संपन्न इस महत्वपूर्ण आयोजन में शामिल होकर लौटने के एक महीने से अधिक समय के बाद जब कुछ लिखने बैठा हूँ तो यह अच्छी तरह पता है कि मुझे रपट नहीं लिखनी है अर्थात किस सत्र में किसने क्या कहा आदि - इत्यादि का उल्लेख भी नहीं करना है, नाम भी नहीं गिनाना है। रिपोर्टिंग की भाषा और उसके शिल्प में ये सारी सूचनायें मंथन, हिन्दी भारत , अशोक विचार हिन्द युग्म पर प्रमुखता से छप चुकी हैं। मुझे तो वह कहना है जो एक प्रतिभागी के रूप में अनुभव हुआ। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में इस उम्मीद के साथ अपने अनुभव को साझा कर रहा हूँ कि किसी / किन्हीं समानधर्मा / समानधर्मियों को मेरी बात कुछ अपनी - सी लगे शायद ...

* हिन्दी लगातार 'नई चाल' में ढ़ल रही है और उस नए को रेखांकित / लिपिबद्ध भी किया जा रहा है। तकनीक का दामन थाम कर उसने अपनी गति को तीव्र किया है। राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी अवश्यकता व स्वीकार्यता बढ़ी है किन्तु यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि बदलते / निरन्तर बदल रहे समय व समाज में हम हिन्दी वालों ने स्वयं उस अनुपात में और उस तेजी से खुद को नहीं बदला है जैसे कि संसार की बहुत - सी भाषाओं ने कर दिखाया है। हिन्दी का प्रश्न आते ही अंग्रेजी का प्रश्न उठ खड़ा होता है। भारत की भाषा समस्या पर बात होने लगती है। राजभाषा और राष्ट्रभाषा के सवाल को उठाया जाता है। उर्दू को अपना ही दूसरा भाषायी चेहरा मानने में एक हिचक - सी दीखती है और तो और तकनीक का सवाल आते ही कुछ यों लगता है यह सब तामझाम हमारे लिए नहीं हैं।आशंका व्यक्त की जाती है इससे 'निज भाषा' की पवित्रता नष्ट हो रही है और कहीं वह अपनी पहचान खो न दे, 'हिंगलिश' न बन जाय।। दूसरी ओर एक ऐसी दुनिया है जो रोज बन रही है। देशों , भाषायी समाजों के बीच की दूरियाँ घट रही हैं और विश्वग्राम की बात जोरों पर है तब किसी कोटर में बैठ कर अपने ही आईने में अपनी शक्ल देखकर मुग्ध - मुदित होने की बजाय संसार के साथ कदम से कदम मिलाना ही समझदारी की बात होगी । हाँ , इस समझदारी में यह सावधानी जरूर होनी चाहिए कि हमें क्या , कैसा , कितना और किस तरह क काम करना है। मेरठ के सेमीनार में यह बात खुलकर सामने आई कि हिन्दी बोलने - बरतने वालों की संख्या क्या है , संसार के किन - किन देशों में हिन्दी पढ़ाई जाती है , किन - किन देशों में कौन - कौन से साहित्यकार रचना कर रहे हैं और भारतीय विश्वविद्यलयों के हिन्दी पाठ्यक्रम में प्रवासी साहित्य कि शामिल करने में अब देरी नहीं करनी चाहिए। यह सब तो ठीक है लेकिन यह भी ध्यान देने की बात है कि हिन्दी के उन्न्यन के लिए हम लोग अपने स्तर पर क्या कर रहे हैं? हम लोग हिन्दी की गढ़ी हुई छवि से बाहर निकल कर तकनीक के क्षेत्र कौन - सा काम कर रहे हैं? इस काम की वर्तमान दशा क्या है? इसकी दिशा क्या होनी और हमारा लक्ष्य क्या है ? ये सारी बातें सेमीनार के विभिन्न सत्रों में आईं। देश - विदेश के विद्वानों ने व्याख्यान दिए।मल्टीमीडिया प्रस्तुतियाँ हुईं और कुल मिलाकर यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह सेमीनार सिर्फ़ एक हिन्दी मेला या हिन्दी वालो का जमावड़ा भर न होकर उससे आगे की चीज था, एक गंभीर विचार - विमर्श का उत्कृष्ट नमूना जो भारत के अन्य विश्विद्यालयों , कलेजों व संस्थाओं को सेमीनार आयोजित करने के लिए दिशा देने का काम भी करेगा। इस काम के लिए हिन्दी विभाग , चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के अध्यक्ष प्रो० नवीन चंद्र लोहनी और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है।

* इस सेमीनार में मुझे 'अनुवाद और हिन्दी' वाले सत्र में बोलना था। मैंने अपना विषय चुन रखा था 'कविता के अनुवाद की समस्यायें'। इस पर कुछ लिखा भी था किन्तु उसे यथावत / अक्षरश: न पढ़कर यह सही लगा कि हिन्दी की दुनिया में अनुवाद , अनुवादक और अनूदित सहित्य की परम्परा तथा अनुवाद व अनुवादक की छवि पर कुछ कहने के साथ ही भूमंडलीकरण और अनुवाद की भूमिका पर कुछ शेयर किया जाय। यह एक व्यापक विषय है निर्धारित / नियत/ आवंटित संक्षित समय सीमा में सूत्र व संकेत स्वरूप ही कुछ कहा जा सकने का ही अवकाश था और उसका लाभ लेते हुए कुछ कहा भी । क्या अपको नहीं लगता कि भूमंडलीकरण के इस दौर में भाषा ज्ञान - सूचना - जानकारी और उत्पादन - उपभोग - वितरण के तंत्र की ( यह अलग बात है कि इस तंत्र के पक्ष और विपक्ष में बहुत कुछ कह जा सकता है !) की एक अनिवार्य व सक्रिय कड़ी है। अगर सब कुछ बाज़ार में है , बाज़ार के लिए है , एक तरह से बाज़ार द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है तो तमाम अच्छाइयों और बुराइयों के साथ हिन्दी के संदर्भ में बकौल अकबर इलाहाबादी 'बाज़ार से गुजरा हूँ खरीदार नहीं हूँ' कह कर तटस्थ नहीं रहा जा सकता। इस बदलते हुए भूगोल में हमें हिन्दी की भूमिका को परखते , पहचानते हुए अनुवाद को एक द्विभाषी कवायद या शौकिया औज़ार से आगे बढ़ कर एक सृजनात्मक सांस्कृतिक कर्म के साथ ही ट्रांसलेशन इंडस्ट्री जैसी किसी चीज को मूर्तिमान व गतिमान करने के बाबत गंभीर होना पड़ेगा और अपनी कीमत तय करते हुए इस परिवर्तन के लाभ के एवज में कुछ कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी।
* इस अंतरराष्ट्रीय सेमीनार में कविता पाठ का एक सत्र भी था। मुझे उम्मीद नहीं थी अपनी कविताओं के जिक्र से बचने वाले मेरे जैसे व्यक्ति को कवि मान लिया जाएगा और उसे एक अंतरराष्ट्रीय कवि गोष्ठी में अपनी कवितायें सुनानी पड़ेंगीं। खैर, कविता केन्द्रित यह आयोजन बहुत ही बढ़िया रहा। इसमें वे कवि भी थे जो विदेश रहकर हिन्दी मॆं अच्छी कवितायें लिख रहे हैं और वे भी जो हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। इसमें वे कवि भी थे जो अपनी सुमधुर अदायगी और कंठ के जादू से मुशायरा लूट लेते हैं और वे भी जो कविता और उसका शास्त्र पढ़ते - पढ़ाते हैं।हाँ , उन श्रोताओं , पाठको को कैसे भुलाया जा सकता है कविता से प्रेम करते हैं।उसे सुनते हैं, पढ़ते हैं , सराहते हैं। यह कविता उत्सव बहुत देर तक और बहुत ही सुन्दर माहौल में संपन्न हुआ।

* हिन्दी में पढ़ने - लिखने - पढ़ाने वालों की दुनिया से जुड़े लोगों के लिए ब्लागिंग अब कोई नई और चौंकने या अनदेखा किए जाने वाली चीज नहीं रह गई है। हिन्दी पत्रकारिता ने सबसे पहले इसके को स्वीकार किया और मान / स्थान दिया और अब अकादेमिक दुनिया में भी इसकी महत्ता को स्वीकार किया जाने लगा है। हिन्दी लिखने - पढ़ने वालों के बीच ब्लागर्स के कार्य को स्वीकर किए जाने व उसे पर्याप्त सम्मान दिए जाने का स्पष्ट उदाहरण मेरठ के इस सेमीनार में दिखाई दिया। यहाँ कई सत्रों में इस पर / इसके बाबत बात हुई और वक्ताओं के परिचय में बहुत ही सम्मान के साथ कविता वाचक्नवी जी तथा इन पंक्तियों के लेखक का एक परिचय ब्लागर के रूप में दिया गया। इच्छा तो यह थी कि इसी बहाने ब्लागिंग पर कुछ बातचीत हो जाय किन्तु शिड्यूल इतना बिज़ी था कि इसके लिए औपचारिक रूप से समय निकालना संभव नहीं था। उम्मीद है कि मेरठ विश्वविद्यालय या कोई अन्य विश्वविद्यालय /संस्था/ संस्थान भविष्य में हिन्दी ब्लागिंग पर अलग से किसी कार्यशाला/ संगोष्ठी का आयोजन करेगा ( जो निश्चित रूप से 'ब्लागर मीट' से कुछ अलग हटकर होगी ! ) तब इस नए बनते हुए माध्यम पर गंभीर विमर्श संभव हो पाएगा।

* और अंत में यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि 'भूमंडलीकरण और हिन्दी' विषय पर आयोजित यह अंतरराष्ट्रीय सेमीनार इस एक कुशल प्रबंधन / संचालन का एक अच्छा उदाहरण रहा क्योंकि इसके प्रबंधन / संचालन में किसी तरह की कोई अफरातफरी नहीं थी और कामचलाऊ जैसी चीज नहीं दिखी। सब कुछ अपनी गति से सुचारु रूप से चलता रहा। उद्घाटन - समापन और तकनीकी सत्रों के साथ विभिन्न सत्र समय से सम्पादित होते रहे । बाहर से आए अतिथियों को आवास व भोजन संबंधी कोई परेशानी नहीं हुई और वे अपने साथ तमाम खूबसूरत यादें लेकर अपने - अपने घर को लौटे । यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ। इस यकीन के साथ कि इसी तरह की बात दूसरों से भी सुनने को मिली / मिल रही है। एक बार फिर डा० नवीन चन्द्र लोहनी और उनकी पूरी टीम को बहुत - बहुत बधाई !

9 टिप्‍पणियां:

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee ने कहा…

वास्तव में वह एक अच्छा अनुभव था और लोहानी जी तथा विभाग ने इस पर बहुत सार्थक श्रम किया था।
कई लोगों से भेंट होना इसका और भी सुखद पहलू था।
संस्मरण पुन: ताज़े हो उठे।
हमारे पास तो कोई चित्रादि भी नहीं, आपके शब्दचित्रों से मन प्रसन्न हुआ।

गिरीश बिल्लोरे ''पॉडकास्टर'' ने कहा…

Congrets

गिरीश बिल्लोरे ''पॉडकास्टर'' ने कहा…

ब्लागिंग की कोशिशों को चर्चा में शामिल करने के लिए आभार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मेरठ विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय सेमीनार की विस्तृत झाँकी प्रस्तुत करने के लिए धन्यवाद!

Suman ने कहा…

nice

Pro. Navin Chandra Lohani ने कहा…

Hamare vibhag ki or se is sundar sansmratmak report ke liye hardik aabhar

navin lohani

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

बहुत श्रम करके तैयार की गई रपट,
जिसने जानकारी के नए द्वार खोल दिए!

शरद कोकास ने कहा…

बढ़िया रपत है भाई । बहुत अच्छी चर्चा हुई यह अच्छी बात है । " मेरे जैसे आदमी को कवि मान लिया जायेगा " ????? यह बात कुछ हज़म नहीं हुई । इसमे न माने वाली क्या बात है भई?

Apanatva ने कहा…

aapkee tipannee ne aapke blog ka rasta dikhaya............
ise blog jagat ko to mai khajana hee maantee hoo.......
bahut accha laga aapke blog par aakar.......