सोमवार, 29 मार्च 2010

चलो अब घर चलें दिन ढल रहा है



* * *'कर्मनाशा' पर इधर कुछ समय से अपनी और अनूदित कविताओं की आमद अपेक्षाकृत अधिक रही है और यह भी कि अपनी कई तरह की व्यस्तताओं और यात्राओं के कारण बहुत कम पोस्ट्स लिख पाया हूँ। वैसे भी ब्लागिंग के वास्ते इतना ( ही / भी ) समय निकल पा रहा है यह कोई कम अच्छी बात नहीं है ! आज बहुत दिनों बाद कुछ संगीत साझा करते हैं आपके साथ । तो आइए सुनते हैं नासिर काजमी साहब की एक ग़ज़ल आबिदा परवीन के जादुई स्वर में ...





तेरे आने का धोका - सा रहा है।
दिया सा रात भर जलता रहा है।

अजब है रात से आँखों का आलम,
ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है।

सुना है रात भर बरसा है बादल,
मगर वह शहर जो प्यासा रहा है।

वो कोई दोस्त था अच्छे दिनों का,
जो पिछली रात से याद आ रहा है।

किसे ढूँढोगे इन गलियों में 'नासिर',
चलो अब घर चलें दिन ढल रहा है।

6 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

अह्हहा!! आनन्द आ गया!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सुना है रात भर बरसा है बादल,
मगर वह शहर जो प्यासा रहा है।
us pyaas ko jo samajh le,
wah shaks kuch alag sa raha hai

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

नासिर काजमी साहब की ग़ज़ल आबिदा परवीन के जादुई स्वर में सुनकर आनन्द आ गया!

Kishore Choudhary ने कहा…

सिद्धेश्वर जी आज की दोपहर हसीन हुई. मखमली आवाज़ और कमाल का कलाम. सुना पहले भी कई बार है मगर जब कोई दोस्त राह चलाते मिले तो ख़ुशी ज्यादा होती है.

pratibha ने कहा…

सुना है रात भर बरसा है बादल,
मगर वह शहर जो प्यासा रहा है।
wah!

पारूल ने कहा…

अजब है रात से आँखों का आलम,
ये दरिया रात भर चढ़ता रहा है।

डूबे समय ,उजले समय
सब समय
सुनी जाती हैं आबिदा
सुनी जाती रहेंगी
कहाँ अघाता है ये
मन .......