शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

इससे आगे कोई तुक मिलती नहीं

हिन्दी में तरह - तरह के शब्दकोश हैं किन्तु मेरे देखे - सुने में कोई तुक कोश या rhyming dictionary नहीं है। हो सकता है  ऐसा कोई कोश हो भी। छोटे बच्चे जब अपनी किताबों में rhyming words पढ़ते हैं और अपनी नोट्बुक्स में शब्दों की तुक मिलाते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है। लगता है  कि इस असार संसार में कोई चीज निपट अकेली नहीं है। एक चीज के जैसी कोई न कोई चीज दूसरी चीज कहीं न कहीं है जरूर। कविता और तुक का बड़ा ही पुराना रिश्ता रहा है। हो सकता है यह बोलने, सुनने और याद करने की सुन्दरता , माधुर्य और सरलता के कारण  हुआ हो। हिन्दी में आजकल कविता और तुकबंदी  को एक दूसरे का प्राय: विरोधी माना जाता है लेकिन तुक  की अपनी प्रतिष्ठा है, अपनी जगह है  और उसकी खूबसूरती भी  बहुत मायने रखती है; बस इतना जरूर हो कि  यह सहज हो ,सायास नहीं, जबरदस्ती नहीं । कल रात  सोने से पहले कुछ कवितायें, कुछ गीत पढ़े और यूँ ही कुछ लिख - सा लिया। आज सुबह जब उन्हें देखा - पढ़ा तो लगा कि यह  अभिव्यक्ति तुक में हैं। आज के इस बेतुके वक्त में यदि  कहीं कुछ तुक में दिख जाए तो भला - सा लगता है। उम्मीद है कि 'कर्मनाशा' के पाठकों और प्रेमियों को यह ठीकठाक लगे...आइए देखते - पढ़ते हैं ये तीन शीर्षकहीन तुकबंदियाँ... 


बेतुके वक्त में तीन तुकबंदियाँ


01-

खुद की
खुद से कहो

सहो
चुप रहो
भावुकता में बहो

उठो
लहर सी
रेत की दीवार सी ढहो

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
इसलिए
चुप रहो।

02-

हर ओर
शोर

घूम रहे करघे
टूट रही डोर

बे- मौसम
नाच रहे मोर

जो कमजोर
उसी पर
सबका जोर

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
चुरा ले गए
शब्द सारे चोर।

03-

मछली
जल की रानी

जीवन उसका
पानी

तड़प रही बेपानी
जल की रानी

बिक रहा
बोतल में
पानी ही पानी

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
खत्म करो
यह कथा - कहानी।
----
चित्र : शेली ब्याट की पेंटिंग 'डोंट हुक द फिश' / गूगल से साभार।

7 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

तीनों तुकबन्दियाँ गहन भाव को संजोये हैं ..सहन करना ही है तो चुप रह कर ही किया जाये ..और यह भी सच है कि कमज़ोर पर ही सबका जोर चलता है ....पानी भी आज खरीद कर पीना पड़ता है ...अच्छी प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

डॉ. साहिब!
ना तो बेतुका वक्त है
और न ही बेतुकी तुकबन्दिया!
--
यह तो बेजोड़ रचनाएँ है!

बाबुषा ने कहा…

ये तुकबन्दियाँ तो खूब भायीं. ख़ास तौर पर -वो हर बार आखिर में आपका कहना कि अब नहीं मिल रही तुक ! सहज और मन के सच्चे भाव !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

तुक नहीं मिलता है तो चुप रहो, वाह।

अनुनाद सिंह ने कहा…

हिन्दी का तुकान्त शब्दकोश यहाँ है-

http://hi.wiktionary.org/wiki/Hindi_Tukaant_Shabdakosh

Arvind Mishra ने कहा…

आज के इस बेतुके वक्त में यदि कहीं कुछ तुक में दिख जाए तो भला - सा लगता है।

शरद कोकास ने कहा…

तुक को लेकर हिन्दी में बहस बहुत पुरानी है । वस्तुत: यह बहस तुक को लेकर नहीं थी यह लय को लेकर थी जो कालान्तर में पन्क्तियों के तुकांत की आवश्यकता और अनवश्यकता की बहस में परिवर्तित हो गई । छन्द और मुक्त छन्द की बहस के बीच यह कहीं स्थापित हो गई। जो कविता जानते हैं वे यह भी जानते हैं कि यह बहस बेमानी है । तुक का प्रयोग सायास कहीं भी नहीं होना चाहिये ।
निश्चित है कि इन कविताओं में ऐसा प्रयोग सायास नहीं है |