सोमवार, 21 सितंबर 2009

फिर - फिर यह कविताई !

चलो अब सो जाओ रे भाई !

असरा - पसरा है सन्नाटा देखो रात अधियाई।
चिड़िया - चरगुन सोय रहे हैं सोयें कुकुर -बिलाई।

पर तुम जाग - जागकर भैया करते कौन कमाई ?
उजले कागज को काला कर लिखते कौन लिखाई ?
जिसको तुम कविता कहते हो वह तो तुकम - तुकाई।

जग है , स्याना मारे , ताना तुमको समझ न आई !
यह सब छोड़ो , माया जोड़ो , सीखो कुछ चतुराई ।

समय बीतने पर ना कहियो , हमने ना समझाई !
सिद्धू बाबू ना सुधरोगे , फिर - फिर यह कविताई !

आधी रात उतार पै आई तुमको नींद न आई !
चलो अब सो जाओ रे भाई !

6 टिप्‍पणियां:

SUNIL DOGRA जालि‍म ने कहा…

बहुत खूब

शरद कोकास ने कहा…

सिद्धेश्वर जी यह सही है लेकिन कितने लोग इसे समझ पायेंगे ? हम कैसे सोयें यहाँ तो कबीर घुसा हुआ है भीतर ..जागे और रोवै .. सो जागते हैं बहर्हाल अभी जागकर तो आप ही को याद कर रहा था ,आपकी एक तस्वीर लगाई है ब्लॉग पर पाबला जी के जन्मदिन के अवसर पर ,देखियेगा -शरद कोकास

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत अच्‍छी रचना .. पर दुनिया उल्‍टी ही समझें .. जिसे जगना है वो सोता है .. जिसे सोना चाहिए वो जगता है !!

वाणी गीत ने कहा…

जो सोवत है सो खोवत है ...जागत है सो पावत है..!!

एस. बी. सिंह ने कहा…

हम भी भईया ना सुधरेंगे, सीखी ना चतुराई ।

पारूल ने कहा…

खूब..कविताई