मंगलवार, 22 सितंबर 2009

मुझे ही नहीं , सबको चाँद चाहिए !

( इब्ने इंशा साहब की मशहूर नज्म 'उस आँगन का चाँद' को बहुत प्यार के साथ याद करते हुए )

चाँद कहाँ सबको मिलता है ,चाहिये सबको मिलना चाँद ,
ऑखों में है चाँद का सपना, फिर भी है एक सपना चाँद ।

एक अकेला चाँद है प्यारे ,और करोड़ों चाहने वाले ,
फिर भी सबको खुशफहमी है मेरा ही है मेरा चाँद ।

रुत बदली दुनिया भी बदली ,बदला देश निजाम मगर ,
जैसे हो वैसे ही रहना , तुम तो नहीं बदलना चाँद ।

माना दुनिया बहुत बुरी है ,चारो ओर है मक्कारी ,
फिर भी अच्छाई क्यों छोड़े मेरा अच्छा-अच्छा चाँद।

माना देस बिराना है , और सबको एक दिन जाना है ,
लेकिन जब तक खुद में दम है ,तब तक रोज निकलना चाँद।

फर्ज हमारा बेहतर दुनिया , दुनिया जिसमें भेद न हो,
राजा-परजा रहे न कोई , ऐसी दुनिया गढ़ना चाँद ।

चाँद है हममें चाँद है तुममें ,सबमें अनगिन चाँद ही चाँद,
आओ सबको एक बना लें , तब होगी यह दुनिया चाँद ।
( चित्र : विन्सेंट वान गॊग का 'स्टारी नाइट्स )

12 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

saahi bat hai sabko hi chand chahiye ......chand hota hi itan sundar .....waise aapki rachana bhi sundar hai

Udan Tashtari ने कहा…

इब्ने इंशा साहब की यह नज्म पढ़वाने का तहे दिल से शुक्रिया.

sidheshwer ने कहा…

मित्रों ! गलती मेरी ही है. मुझे ठीक से स्पष्ट कर देना चाहिए था .
यह ग़ज़ल इस नाचीज की है जो इंशा जी की नज्म 'उस आँगन का चाँद' से प्रेरित है.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इब्ने इंशा साहब की मशहूर नज्म 'उस आँगन का चाँद' को पढ़वाने के लिए शुक्रिया!

pallav ने कहा…

बहुत उम्दा कविता.अरसे बाद ऐसी रचना पढ़ने को मिली.बधाई.

लता 'हया' ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
नीरज गोस्वामी ने कहा…

फर्ज हमारा बेहतर दुनिया , दुनिया जिसमें भेद न हो,
राजा-परजा रहे न कोई , ऐसी दुनिया गढ़ना चाँद ।

चाँद है हममें चाँद है तुममें ,सबमें अनगिन चाँद ही चाँद,
आओ सबको एक बना लें , तब होगी यह दुनिया चाँद ।

सिद्धेश्वर जी इन पंक्तियों के लिए सौ में सौ नंबर....वाह...बेमिसाल रचना लगी ये आपकी....लिखते रहें...
नीरज

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

्वाह

डॉ .अनुराग ने कहा…

परवीन शाकिर की चांद पर लिखी नज़्म याद आ गयी ....

एस. बी. सिंह ने कहा…

चाँद है हममें चाँद है तुममें ,सबमें अनगिन चाँद ही चाँद,
आओ सबको एक बना लें , तब होगी यह दुनिया चाँद ।

बहुत बढ़िया! भीतर का चाँद ही खोजने की जरूरत है वरना तो-

हर हसीँ मंज़र से यारों फासले कायम रखो,
चाँद ग़र धरती पे उतरेगा तो फ़िर डर जाओगे।

kanchan ने कहा…

har sher umda.. har baar waah waah nikali...poora dukh aur adha chand ki tarz par gunguna bhi liya..!

magar is par baar thahar gai
एक अकेला चाँद है प्यारे ,और करोड़ों चाहने वाले ,
फिर भी सबको खुशफहमी है मेरा ही है मेरा चाँद

प्रदीप सिंह ने कहा…

adbhut.........hain.