बुधवार, 20 जनवरी 2010

वसंतागम और 'सब्जी है उपहार प्रकृति का'

शिशिर का हुआ नहीं अन्त
कह रही है तिथि कि आ गया वसन्त !

अभी कुछ देर पहले एक कार्यक्रम से लौटा हूँ। सरस्वती पूजा , वसन्त पंचमी और निराला जयन्ती को लेकर कस्बे में एक आयोजन था जिसमें बहुत कुछ सुनने को मिला। आज सुबह का अख़बार भी ' सखि वसन्त आया' की पंक्ति लेकर नमूदार हुआ था। सुना है , पढ़ा है कि वसन्त आ गया है लेकिन इतनी भयंकर शीत है यकीन नहीं हो रहा है उसके आगमन का। जाड़े की वार्षिक छुट्टियों का आज आखिरी दिन है। इस बीच लगभग दो सप्ताह तक घर में खूब मौज रही। कुछ लिखना पढ़ना भी हो ही गया लेकिन बाकी तो मौजा ही मौजा। अभी १६ जनवरी को बेटे अंचल जी का 'हैप्पी बर्थडे' था सो खूब मस्ती हुई और इसी में वह कविता जैसा कुछ बन गया जो इससे ठीक पहले की पोस्ट के रूप में आप सबके साथा साझा किया गया। बेटा और बेटी की शिकायत थी कि मम्मी के लिए तो कविता लिख दी लेकिन हमारे लिए कुछ नहीं लिखा। हमने कहा कि लो जी, अभी लिख देते हैं जब ठंड में सारी दुनिया सो राही है तो हमरे भीतर का 'कबी' जाग रहा है और कल शाम को एक तुकबन्दी - सी हो गई। आज दोपहर में उसे टाइप भी कर लिया और अब जबकि रात घिरने जा रही है ,सर्दी की रंगत रंग ला रही है और लोगबाग वसन्त की अगवानी में अपनी अभिव्यक्ति कर रहे हैं तब सारी चीजों को दरकिनार करते हुए बेटे अंचल जी के लिए लिखी एक कविता साझा कर रहा हूँ। अंचल जी ने इसी महीने की १६ तारीख को अपना जन्मदिवस मनाया है और वे क्लास थी -बी में पढ़ते हैं। सब्जी तो वे खाते हैं लेकिन कम - कम।उनसे कहा गया है कि अगर लम्बाई बढ़ानी है तो सब्जी खूब खाओ। तो आइए देखिए पढ़िए यह कविता:


सब्जी खाओ अंचल भाई !

सब्जी से बढ़ती लम्बाई।
सब्जी खाओ अंचल भाई।

देखो ये जाड़े के दिन हैं
सब्जी की है आमद भारी।
मंडी कितनी हरी - भरी है
सजी - धजी है तर- तरकारी।

तुम यह याद हमेशा रखना
सब्जी से मिलती गरमाई।

सब्जी में तो गुण अनेक हैं
पौष्टिकता है इनमें सारी ।
तन्दुरुस्त तन सब्जी रखती
दूर रहे इनसे बीमारी।

तुमको बहुत बड़ा है बनना
ऊँची रखनी है ऊँचाई।

तुम तो एक अच्छे बच्चे हो
खाते गोभी मूली शलजम।
पालक से परहेज नहीं है
मेथी बथुआ भाए हरदम।

सब्जी है उपहार प्रकृति का
खाओ इसे और करो पढ़ाई।

सब्जी से बढ़ती लम्बाई।
सब्जी खाओ अंचल भाई।
________

* इस सीरीज की एक किश्त बाकी है बिटिया के लिए कुछ लिखना है वह भी जल्द ही
* क्या लिखा जाय ?

4 टिप्‍पणियां:

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

सब्जी है उपहार प्रकृति का,
इसको खाकर खेलो-कूदो,
खेल-खेल में सीखो भाई!
सीख-सीख सबको सिखलाओ,
सब्जी खा मस्तिष्क बनाओ!

चंदन कुमार झा ने कहा…

सुन्दर कविता और सब्जी खाने का मजा तो इसी ठण्ड के महिने में आता है :)

Udan Tashtari ने कहा…

अच्छा संदेश!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सुन्दर यह सन्देश है और अच्छी है सीख!
मदिरा और शिकार की अब जग माँगे भीख!