शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

वसन्त का कोई शीर्षक नहीं

सुन रहा हूँ कि वसन्त आ गया है! आज कुछ यूँ ही लिख दिया है कविता की तरह..इस यकीन के साथ कि यदि निज व निकट के जीवन प्रसंगों में कहीं नहीं दिखता है वसन्त तो कविता में , और सिर्फ कविता में वह तो है मात्र एक स्वप्न ..एक क्षतिपूर्ति..शीत से सिहरे दिनों में उष्णता का स्पर्श भरने वाला एक अग्निहीन अलाव ..शायद..खैर

वसन्त : दो छोटी शीर्षकहीन कवितायें

०१-

तुम्हें निहारता रहा
बस यूँ ही
देर तक।

सहसा
सुनाई दी
वसन्त की धमक।

०२-

फोन पर
लरजता है वही एक स्वर
जिसे सुनता हूँ
दिन भर - रात भर।

छँट रहा है कुहासा
लुप्त हो रही है धुन्ध
इधर - उधर
उड़ - उड़ कर।

मैं कोई मौसमविज्ञानी तो नहीं
पर सुन लो -
आज के दिन
कल से ज्यादा गुनगुना होगा
धूप का असर।

13 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

दोनों बहुत बेहतरीन!

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

ok

अनिल कान्त : ने कहा…

khoobsurat !

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना शुभकामनायें

पारूल ने कहा…

देर तक
धमक
रात भर,
दिन भर
धूप का असर
उड़ कर
LO AA HI GAYA VASANT..SUNDAR VASANT

pratibha ने कहा…

छँट रहा है कुहासा
लुप्त हो रही है धुन्ध...

badhiya!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

मैं कविता पर टिप्पणी करना चाहता हूँ...
आकर बन्द हो जाता है मुँह !
कविताई पर बोलना चाहता हूँ ...बोल ही नहीं पाता !
बस आता हूँ..बकबका कर चला जाता हूँ ।
माफ करें !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वसन्त आ गया है!
इसका आभास भी होने लगा है!

सागर ने कहा…

सही है !

वन्दना ने कहा…

vasant aagman ka ahsaas hi kafi hota hai.

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

!?
--
मुझको बता दो -
"नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा! "
--
संपादक : सरस पायस

शरद कोकास ने कहा…

इन कविताओं का असर गुनगुनी धूप की तरह हो रहा है ।बधाई ।

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

"!"

बहुत ख़ुशी हुई थी -
पहली कविता पढ़कर!
खिल उठे थे कई फूल -
मन में!

"?"

फिर विस्मय के साथ
तैरने लगा था मस्तिष्क में एक प्रश्न -
आप इतनी मनभावन कविता
कैसे रच लेते हैं?