गुरुवार, 7 जनवरी 2010

अब मैं अनुपस्थित इच्छाओं की एक चमकीली राख हूँ


आधुनिक पोलिश कविता के बड़े नामों -विस्वावा शिम्बोर्स्का और हालीना पोस्वियातोव्सका की कवितायें आप पहले पढ़ चुके हैं। ये वे नाम हैं जिनके कारण पोलैंड के साहित्य के जरिए एक नई दुनिया से परिचित होते हैं और अपनी दुनिया को एक नई निगाह से देखने के लिए कोशिश की एक धूप , रोशनी और हवा को भरपूर जगह देने वाली एक खिड़की खुलती - सी दीखती है। इसी क्रम में आज ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की दो कवितायें प्रस्तुत हैं।ग्राज़्यना का जन्म २१ अक्टूबर १९२१ को लुबलिन में हुआ था और नाज़ी जर्मनी के काल में वह भूमिगत संगठन के० ओ० पी० की सक्रिय सदस्य थीं। उन्हें और उनकी बहन को ८ मई १९४१ को गेस्टापो ने गिरफ़्तार कर लिया गया और कुछ महीनों के बाद खास तौर पर महिला बंदियों के लिए बनाए गए रावेन्सब्रुक ( जर्मनी ) के यातना शिविर में डाल दिया गया था और वहीं १८ अप्रेल १९४२ को उनकी दु:खद मृत्यु भी हुई। मात्र इक्कीस बरस का लघु जीवन जीने वाली इस कवयित्री की कविताओं से गुजरते हुए साफ लगता है कि वह तो अभी ठीक तरीके से इस दुनिया के सुख - दु:ख और छल -प्रपंच को समझ भी नहीं पाई थी कि अवसान की घड़ी आ गई। इस युवा कवि की कविताओं में सपनों के बिखराव से व्याप्त उदासी और तन्हाई से उपजी की तड़प के साथ एक सुन्दर संसार के निर्माण की आकांक्षा को साफ देखा जा सकता है। तो लीजिए प्रस्तुत हैं ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की दो कविताओं के हिन्दी अनुवाद :





ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की दो कवितायें

( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

०१- पत्थर

अच्छा लगता है मुझे पत्थरों को निहारना
वे होते हैं नग्न और सच की तरह साधारण
वे होते हैं रूखे चुप्पा अस्तित्व।
उनके पास आँसू नहीं होते
न ही प्यार
और कोई शिकायत भी नहीं
इस वृहदाकार और चौरस पृथ्वी पर
वे होते हैं यूँ ही धरी हुई कोई चीज।

वे होते हैं चाहनाओं से परे
आशाओं से आजाद
निश्चेष्ट
रिश्तों से विलग
- हालांकि उनमें भी दु:ख शेष होता है अभी
कठोर वास्तविकता से भरे होने का -
वे होते हैं भ्रम से विमुक्त
और अपनी निरर्थकता में अकेले।

और मैं किसी चीज के मारे
दु:ख से भरी हुई हूँ मूर्खता की हद तक
जो मूक पत्थरों के मध्य किए जा रही हूँ विलाप
और सोच रही हूँ कि हवायें उन्हें चूर - चूर कर देंगीं।

तूफान गुजर जाते हैं चुपचाप
और कुछ नहीं बिगड़ता पत्थरों का
वे वैसे ही बने रहते हैं
और उन पर नही चलता किसी का जोर
क्योंकि उनमें जीवंत हो गया है जीवन
और वे परिवर्तित होकर बन गए हैं मनुष्यों का हृदय।

( रावेन्सब्रुक ,१९४१)
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०२- अग्निमयी*

बहुत पहले ही
दु:ख ने मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया था
मैंने स्वयं को झुलसा लिया था बहुत पहले ही
अब मैं अनुपस्थित इच्छाओं की एक चमकीली राख हूँ।

अब तो सन्नाटा और सूनापन ही
करता है मुझे सहन व लुटाता है मुझ पर प्यार।
न जाने कब से
मैं अब भी
मैं अब तक
खड़ी हूँ आग के बीचोंबीच स्थिर - अडोल।

( रावेन्सब्रुक ,१३ अप्रेल,१९४२)
* कविता शीर्षकहीन। यह शीर्षक अनुवादक द्वारा दिया गया है।

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*** ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की एक अन्य कविता 'कबाड़खाना' पर देखें।
*** ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की कुछ और कविताओं के अनुवाद शीघ्र ही।

11 टिप्‍पणियां:

एस. बी. सिंह ने कहा…

और उन पर नही चलता किसी का जोर
क्योंकि उनमें जीवंत हो गया है जीवन
और वे परिवर्तित होकर बन गए हैं मनुष्यों का हृदय।

पत्थरों के ह्रदय में और हृदयों के पत्थरों में परिवर्तित हो जाने की कथा हैं ये कवितायें और कवियत्री का जीवन। सुन्दर कविताएं -पढ़वाने का शुक्रिया।

Udan Tashtari ने कहा…

दोनों रचनाएँ दिल को छू गई...

अनुवादक द्वारा दिया गया शीर्षक कितना सटीक है: अग्निमयी- बहुत बढ़िया.

vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…

सुंदर अनुवाद और एक महत्वपूर्ण कवि से मिलवाने का आभार।

वन्दना ने कहा…

dono hi rachnayein gazab ki...........shukriya padhwane ka.

रश्मि प्रभा... ने कहा…

वे होते हैं चाहनाओं से परे
आशाओं से आजाद
निश्चेष्ट
रिश्तों से विलग
- हालांकि उनमें भी दु:ख शेष होता है अभी
कठोर वास्तविकता से भरे होने का -
वे होते हैं भ्रम से विमुक्त
और अपनी निरर्थकता में अकेले।
...........
waah

डॉ .अनुराग ने कहा…

अग्निमयी* ने प्रभावित किया......

विनीता यशस्वी ने कहा…

Behtreen kavitaye aur utne hi behtreen anuwaad...

सागर ने कहा…

दोनों ही कवितायेँ बेहतरीन हैं... पहली तो अद्भुत है... आपसे अनुरोध है की आगे भी इनकी रचनाएँ पढवाएं...

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया रचना लिखा है आपने!

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

पढ़कर पत्थर,
याद आ गई प्रसिद्ध कविता -
"वह तोड़ती पत्थर!"

इस कविता में भी कवि ने
महिला मजदूर के हृदय को
पत्थर के रूप में प्रस्तुत किया है!

पत्थर के रूप में
वह अपने दुखी हृदय को ही
बार-बार तोड़ती है!

ओंठों पर मधु-मुस्कान खिलाती, रंग-रँगीली शुभकामनाएँ!
नए वर्ष की नई सुबह में, महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ", उर्दू कौन सी भाषा का शब्द है?
संपादक : "सरस पायस"

varsha ने कहा…

दोनों ही कवितायेँ बेहतरीन हैं..