सोमवार, 25 जनवरी 2010

बाहर लगातार बढ़ रहा है सूर्य का ताप


कल दिन भर घर से बाहर रहा। दोपहर में आनेवाला अखबार भी नहीं देख सका। अगर शाम को एक सहकर्मी का एस.एम.एस. न आता तो ध्यान भी न आता कि आज (२४ जनवरी को ) 'नेशनल गर्ल चाइल्ड डे' है। इसके बाद बिटिया ने अखबार सामने धर दिया कि बाँचो। देखा तो अखबार के कुल तीन पृष्ठ इसके बारे में हैं । सुबह आने वाले हिन्दी के अखबार में तो ऐसा कुछ था नहीं ! खैर, यह हिन्दी की दुनिया है ! इसी बीच बिजली चली गई और कंप्यूटर वाले डाक्टर आ गए। अपना पुराना कबाड़ तलाशा गया और पाया गया कि आज से कई बरस पहले 'लड़कियाँ' शीर्षक से कुछ कवितायें लिखी थीं जो 'वैचारिकी संकलन' के नवम्बर - दिसम्बर के अंक में १९९६ 'लड़कियाँ : छह कवितायें' शीर्षक से प्रकाशित हुई थीं। रात में सोचा कि ब्लाग पर कुछ लिखूँ किन्तु आलस्य ने धर दबोचा और अभी सुबह कुछ खटर- पटर चल रही है। 'लड़कियाँ' सीरीज की कुछ अन्य कवितायें भी हैं जो डायरी और फाइलों में बन्द हैं। वे ज्यादातर लम्बी कवितायें हैं उन्हें ब्लाग पर लगाने से बचते हुए आज एक दिन बाद ही सही उन्हीं में चुनिन्दा तीन कवितायें आपके साथ साझा करने का मन हो रहा है:




01- यह मैं हूँ !

यह घर मेरी माँ का है
बाहर की दुनिया
पापा की है
मोटर बाइक भैया की है
और खिलौने छोटू के हैं।

लड़कियाँ घबराकर
दिन में कई - कई बार शीशा देखती हैं
और सोचती हैं
- यह मैं हूँ
- यह मेरा चेहरा है।

02- साक्ष्य

वे सड़क पर हैं
मोबाइल पर बतियातीं
या कि सबके होने को
अस्वीकार करतीं
अपने भीतर ही गड्ड - मड्ड।

वे हैं
हर जगह
हर कहीं
अपने होने को साबित करतीं
उनके होने से ही है इस दुनिया का होना।


03- बेटी

घास पर
ठहरी हुई ओस की एक बूँद
इसी बूँद से बचा है
जंगल का हरापन
और समुद्र की समूची आर्द्रता।

सूर्य चाहता है इसका वाष्पीकरण
चंद्रमा इसे रूपायित कर देना चाहता है हिम में
मधुमक्खियाँ अपने छत्ते में स्थापित कर
सहेज लेना चाहती हैं इसकी मिठास
कवि चाहते हैं
इस पर कविता लिखकर अमरत्व हासिल कर लेना।

मैं एक साधारण मनुष्य
एक पिता
क्या करूँ?
चुपचाप अपनी छतरी देता हूँ तान
गो कि उसमें भी हो चुके हैं कई - कई छिद्र।

बाहर लगातार
बढ़ रहा है सूर्य का ताप
क्या करूँ मैं ?
क्या कर रहे हैं आप ?


8 टिप्‍पणियां:

श्रीश पाठक 'प्रखर' ने कहा…

आज कल थोड़ा दूरी हो गयी है ब्लॉग जगत से..पर आपकी इन रचनाओं को देख रोक ना सका खुद को...! बेहद ही अच्छी रचनाएं..!

कोई टिप्पणी ना कर पाऊं सार्थक ये और बात है पर इतना कहूँगा कि इन रचनाओं ने मुझे बेहद खुशी और संतुष्टि दी है. आभारी हूँ..!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

teeno kavitayen rishton aur unse judi ek ek jazbaat ko batati hain

पारूल ने कहा…

बेटियों के बारे में जो हैं...सो तीनो ही अच्छी लगीं

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

वसंत आता है –

जब घर में जन्म लेती है बिटिया!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

शब्द तित्र बहुत सुन्दर हैं।

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

गणतन्त्र-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

लड़कियाँ घबराकर
दिन में कई - कई बार शीशा देखती हैं
और सोचती हैं
- यह मैं हूँ
- यह मेरा चेहरा है।
सभी क्षणिकायें यथार्थ-बोध कराती हुई हैं.लडकियों के हालात तो आज भी वही हैं जो पहले थे. वे खुद अपने लिये लडें तो ठीक वरना वास्तव में उनके लिये कौन लडता है?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

शब्द चित्र बहुत सुन्दर हैं।

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

गणतन्त्र-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

कभी कभी तो उभ-चुभ हो जाता हूँ कुछ कहने के लिये ।
निगोड़ी जीभ दगा दे जाती है ।
खिसियाता हूँ तो फीड शेयर करता हूँ आपकी कि दूसरा (सामर्थ्यवान ) पढ़े और कुछ कहे, मैं खुश हो जाऊँ !

कल फीड देखी तो आपकी पोस्ट अपडेट ही नहीं हो रही थी । फिर अचानक आपकी कविताओं के मुझ-से बीमार ’श्रीश’ शेयर कर गये थे इन्हें । वहाँ दिखी यह कविता । फिर से फीड जाँची, अब चार प्रविष्टियाँ अनरीड दिख रहीं हैं आपकी । मन से पढ़ूंगा ।

फिलहाल तो सूचना देने चला आया ।