रविवार, 19 सितंबर 2010

यह भी हो सकता है कि यह कहा जाय कि बारिश तो हुई ही नहीं थी !


कई दिन हुए बारिश है कि रुकने का नाम नही ले रही है। लगातार पानी , पानी और पानी। इधर - उधर, हर तरफ - चारो तरफ जल ही जल । इतनी बरसात भी अच्छी नहीं। अब मन खिन्न - सा होने लगा लगा है। काम पर निकलो तो इतनी तैयारी करनी पड़ती है कि ऐसा लगता है मानो लाम पर जा रहे हों। बाहर से लौटो तो सब कुछ गीला, सीला। सड़कों पर पानी के बीच अवाजाही करते - करते, लगभग सूने - से बाजार में खरीदारी करते अब बहुत अजीब - सा लगने लगा है। यह कोई एक दिन की बात हो तो इसे देख - समझ - झेल लिया जाय लेकिन पिछले कई दिनों से ( अब तो महीना भर होने जा रहा है ) बारिश - बादल का राग सुहा नहीं रहा है। किताबें खोलो या फिर उनके रखने की जगह की ओर देखो तो लगता है बारिश को लेकर / बारिश पर इतना कुछ जो लिखा गया है वह कितना सच है या कितना झूठ यह तो अलग ही किस्म का मसला है लेकिन यह जरूर ध्यान में आता है कि इनके लिखने वाले क्या सचमुच इसी दुनिया में रहते थे या कि इसी दुनिया में रहते हैं?

इस मौसम में यह भी एक अजीब - सी बात कि पिछले तीन दिन से डाकिया लगातार आ रहा है। कोई चिठ्ठी नहीं , कोई पत्री नही ..बस पत्रिकायें और अखबार लेकर। और बारिश है रुकने का नाम नहीं ले रही है....

आज इस गीले - सीले मौसम में कुछ यूँ ही कवितानुमा लिखा है। आइए देखते - पढ़ते हैं:
०१- पत्र

आज बहुत दिनों बाद डाकिया दिखाई दिया।
उसके कपड़े बदल गए थे। मैंने सोचा कि उसे रोककर कुछ सवाल पूछूँ । मसलन :

१- तुम्हारी खाकी वर्दी कहीं फट तो नहीं गई?
२- तुम्हारे घर में चोर तो नहीं घुस आए थे?
३- डाकखाने वालों ने कटौती तो नहीं शुरू कर दी।
४-कपड़ा मिल की हड़ताल अभी चल रही है क्या?
५- तुम्हारी नौकरी तो नहीं चली गई?

( यह सब सोचा लेकिन पूछा कुछ और ही )

- मेरी कोई डाक है क्या?
'आज इतवार है!' डाकिए ने कहा और उसकी साईकिल हवा से बातें करने लगी।

मुझे याद आया यूँ टहलना बहुत हुआ।
अब घर चलना चाहिए। कुछ जरूरी फोन करने हैं।

****

०२- बारिश
बारिश के बाद सब कुछ धुल गया था।
धूल , धुआँ , गर्द ..सब कुछ...।
कहीं और चला गया था वह सब जिसकी अब कोई दरकार नहीं थी।

क्या पता यह सब अपने आप हुआ था या कि इसके लिए किसी ने कोई कोशिश की थी। यह भी हो सकता है कि यह कोशिश, अगर सचमुच हुई थी तो; किसी अकेले की नहीं बल्कि एक से अधिक लोगों की रही हो। 'वे' दो भी हो सकते हैं और दो सौ या दो हजार भी। दुनिया की किसी भी भाषा में एक से अधिक जितनी भी संख्यायें हो सकती हैं उन सबका यहाँ पर अनुमान किया जा सकता है। यह भी हो सकता है कि उन 'एक से अधिक' लोगों की तस्वीर बनाई जा सकती है। उन पर कोई किताब लिखी जा सकती है या कोई स्मारक बनाकर उन सबको अमरत्व प्रदान किया जा सकता है। उन सबका कोई 'दिवस' तय किया जा सकता है। होने को कुछ भी हो सकता है। संभावनाओं की कोई कमी नहीं नहीं।

यह भी हो सकता है कि यह कहा जाय कि बारिश तो हुई ही नहीं थी।

क्या आपको गिनती आती है?
यदि हाँ , तो गिनते रहिए।

संभावनायें कभी खत्म नहीं होतीं।

7 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

दोनों पाती बाँचकर,मन को हुआ सुकून।
शीत, धूप, वर्षा सहे, धीरज धर प्रसून।।
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बहुत सुन्दर पोस्ट लगायी है डॉक्टर साहिब!
पढ़कर आनन्द आ गया!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

खत उनका जब तक न आये,
बरसे पानी, बेमानी है।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

क्‍या कहूं आनंद तो नहीं आया बल्कि एक बचपन की एक ऐसी रात याद आ गई जब सीले बिस्‍तर के कारण मैं रात भर बैठा ही रहा था। सोचता हूं जहां आप हैं या जहां के बारे में यह सब लिखा है वहां क्‍या हाल होगा।
बहरहाल बारिश को इस नजर से सच कहूं तो एक बच्‍चे की नजर से देखने का तरीका बहुत अच्‍छा लगा।

'उदय' ने कहा…

... bahut badhiyaa !!!

डॉ .अनुराग ने कहा…

वाह -वाह तो नहीं करूँगा पर यही कहूँगा " संभावनायें कभी खत्म नहीं होतीं"

वन्दना ने कहा…

आपकी पोस्ट आज के चर्चामंच का आकर्षण बनी है । चर्चामंच पर आकर अपने विचारों से अवगत करायें।
http://charchamanch.blogspot.com

गौतम राजरिशी ने कहा…

उत्तराखंड की इस बारिश के प्रकोप ने कई समस्यायें खड़ी कर दी हैं और इनमें से एक है मेरी युनिट के कई सिपाहियों का अपने गांव में फंसे होना और ड्युटी पर वापस न आ पाना... :-)

उस दिन आपके फोन ने चौंका दिया था। आपका फैन हूं ना तो इस अप्रत्याशित काल की अपेक्षा न थी। वैसे आपने हंस वाली मेरी ग़ज़लों की तारीफ़ की थी क्या फोन पर...?