
वेरा पावलोवा ( जन्म : १९६३ ) की कुछ कवितायें आप कुछ समय पहले 'कर्मनाशा' व 'कबाड़ख़ाना' के पन्नों पर पढ़ चुके हैं । समकालीन रूसी कविता की इस सशक्त हस्ताक्षर से अपना परिचय बहुत पुराना नहीं है किन्तु छोटी - छोटी बातों और नितान्त मामूली समझे जाने वाले प्रसंगों को उन्होंने बहुत ही छोटे काव्य - कलेवर में उठाने की जो महारत हासिल की है वह एक बड़ी बात है। वेरा का एक संक्षिप्त परिचय यहाँ है। आइए आज बार फिर पढ़ते - देखते हैं उनकी दो कवितायें :
वेरा पावलोवा की दो कवितायें
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )
०१- नींद
कुछ इस तरह
सो रही है एक लड़की
जैसे किसी के सपनों में
चलती चली जा रही हो दबे पाँव ।
एक औरत
कुछ इस तरह सो रही है
मानो आने वाले कल से
शुरू होने जा रहा हो कोई युद्ध।
एक बूढ़ी स्त्री
इस तरह सो रही है
जैसे कि बहाना कर रही हो मृत्यु का
इस उम्मीद में कि उसे बिसार देगी मौत
और चली जाएगी नींद के सीमान्त की ओर।
०२- सृजन
अनश्वर करो मुझे क्षण भर के लिए :
बर्फ़ के फाहे लो मुठ्ठी भर
और उसके भीतर मूर्त करो मेरा स्थापत्य।
अपनी गर्म और खुरदरी हथेलियों से
सँवारो मुझे तब तक
जब तक कि मेरे भीतर से
प्रकट न होने लग जाये प्रकाश।
4 टिप्पणियां:
कविता हो तो ऐसी हों !
अनुवाद तो लग ही नही रहा.
अतिसुन्दर वर्णन मनोदशाओं का।
जैसे कि बहाना कर रही हो मृत्यु का
इस उम्मीद में कि उसे बिसार देगी मौत
anuvaad aate rehne chahiye
बहुत बढ़िया अनुवाद है सिद्धेशवर भाई ।
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