शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

अपनी दैनंदिन साधारणता में भुरभुराता हुआ यह जीवन


कल तीज है - हरितालिका तीज। कल ईद है- मीठी ईद। आज शाम घिरते ही पश्चिम के क्षितिज पर उदित होगा द्वितीया का चाँद। अगर बादलों की मेहरबानी रही तो वह दिखेगा भी कुछ देर तक। आज छुट्टी है - कल भी छुट्टी रहेगी । परसों ईतवार है - छुट्टी का घोषित दिन। छुट्टी माने - यदि फुरसत मिले तो खुद से बोलने - बतियाने , खुद से रूठने - मनाते का दिन। आज जब खुद से संवाद - सा किया तो पता चला कि कितने - कितने दिन हो गए कोई कविता नहीं लिखी। ऐसा नहीं है कि इस बीच लिखना - पढ़ना नहीं हुआ लेकिन आत्म- संवाद के रूप में कविता जैसा कुछ बाहर नहीं आया। जीवन वैसा ही अपनी साधारणता में व्यतीत , विगत होता हुआ। दिन - रात के आवागमन में कोई बाधा नहीं है, फिर भी...। अभी यूँ ही बैठे - बैठे मन हुआ कि पिछले कुछ महीनों - वर्षों में लिखी कविताओं को टटोल कर देखा जाय और उनके भीतर की आर्द्रता का तनिक  अनुभव किया जाय। इसी क्रम में पिछले साल की हरितालिका तीज के दिन लिखी गई एक कविता को इस ठिकाने पर आने वाले कविता प्रेमियों के संग साझा करने का मन है।  यह एक तरह से निज का संवाद है चार दीवारों और एक छत नीचे रहने वाले छोटे से घोंसले के बाशिंदों का। आइए , आप इसे देखें पढ़ें...यह कविता जिसका शीर्षक है : आओ चलें...



आओ चलें
( कविता जैसा एक संवाद) 


तुम -
सितारों की ज्यामितीय कला से प्रेरित
अनंत व्योम की उज्जवलता में
व्यवस्थित - गुंथित
बेहिसाब - बेशुमार - बेशकीमती रेशम.

मैं -
इस पृथिवी के चारों ओर
उपजी - बिलाती वनस्पतियों की साँस से संचालित
हवा में उड़ता - भटकता हुआ
एक अदना - सा गोला भर कपास.

यह एक दूरी है
जो खींच लाई है कुछ निकट - तनिक पास
अपनी दैनंदिन साधारणता में
भुरभुराता हुआ यह जीवन
लगने लगा है कुछ विशिष्ट - तनिक खास.

इसी में छिपी है निकटता
इसी में है एक दबी - दबी सी आग
इसी में है सात समुद्रों का जल
इसी में हैं वाष्प - ऊष्मा - ऊर्जा के सतत स्रोत
इसी में हैं सात आसमानों की प्रश्नाकुल इच्छायें
इसी में रमी है पंचतत्वों से बनी यह देह
जिसमें विराजती हैं कामनाओं की असंख्य अदृश्य नदियाँ
अपने ही बहाव में मुग्ध -अवरुद्ध
एक तट पर विहँसता है राग
और दूसरे पर शान्त मंथर विराग.

फिर भी भला लगता है
अगर रोजाना बरती जा रही भाषा में
तुम्हें कहा जाय रेशम
और स्वयं को कपास.

अपने करघे से एक धागा तुम उठाओ
मैं अपनी तकली से अलग करूँ जरा -सा सूत
बुनें दो - चार बित्ता कपड़ा
और तुरपाई कर बना डालें
दो फुदकती गिलहरियों के लिए नर्म- नाजुक मोजे.

मौसम के आईने में
कोई छवि नहीं है स्थिर - स्थायी
आँख खोल देखो तो
सर्दियाँ सिर पर सवार होने को हैं
पेड़ों से गिरने लगे हैं चमकीले -चीकने पात
आओ चलें
थामे एक दूजे का हाथ
चलते रहें साथ - साथ .

9 टिप्‍पणियां:

'उदय' ने कहा…

... बेहतरीन !!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कविता जैसा संवाद
--
या
--
संवाद जैसी कविता
--
प्रत्येक शब्द गवाही दे रहा है कि यह
कविता ही तो है!

राजेश उत्‍साही ने कहा…

सुंदर।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़े सुन्दर व मधुर भाव पिरो लायी यह कविता।

pratibha ने कहा…

wah!

दीपक 'मशाल' ने कहा…

आपके ब्लॉग को आज चर्चामंच पर संकलित किया है.. एक बार देखिएगा जरूर..
http://charchamanch.blogspot.com/

अजेय ने कहा…

फिर भी भला लगता है
अगर रोजाना बरती जा रही भाषा में
तुम्हें कहा जाय रेशम
और स्वयं को कपास.

यहाँ कई कविताएं मिली मुझे. थेंक्स सिद्धेश्वर भाई, बहुत प्रेरक पोस्ट. बार बार पढूँगा.

पारूल ने कहा…

थामे एक दूजे का हाथ
चलते रहें साथ - साथ .
sundar hai ye BAAT

परमेन्द्र सिंह ने कहा…

बहुत बढ़िया कविता !
अपने करघे से एक धागा तुम उठाओ
मैं अपनी तकली से अलग करूँ जरा -सा सूत
बुनें दो - चार बित्ता कपड़ा
और तुरपाई कर बना डालें
दो फुदकती गिलहरियों के लिए नर्म- नाजुक मोजे.

वाह ! आत्मीयता का ऐसा अद्‌भुत योग !