सोमवार, 28 मार्च 2011

नास्टैल्जिया = ना लागे जिया

 ...I was thinking about the moments of the past,
letting my memory rush over them like water
rushing over the stones on the bottom of a stream.
                                                                - Billy Collins 

नास्टैल्जिया अंग्रेजी के उन शब्दों में से है जिसका हिन्दी में, खासकर  साहित्यिक आलोचना - समीक्षा के क्षेत्र में खूब प्रयोग होता है ; यथावत, बिना अनुवाद, बिना किसी हिन्दी प्रतिशब्द के। एक दिन यूँ  ही किसी  कविता  प्रेमी ने पूछा कि नास्टैल्जिया को हिन्दी में क्या कहते हैं  या क्या कह सकते हैं? मैं उस वक्त भाषा विषयक किसी गंभीर  विमर्श के मूड में नहीं था सो कह दिया कि नास्टैल्जिया  = ना लागे जिया। सुनने वाले को  यह भला लगा और मैंने भी सोचा कि  यह कोई बुरी व्याख्या अथवा बुरा अनुवाद  तो नहीं ही है। एक दिन अंग्रेजी के एक अख़बार में मौज - मस्ती वाले पन्ने पर पर लिखा  मिला था - Nostalgia is memory with the pain removed ! इसे हिन्दी में कहा जा सकता है - पीड़ा़ विमुक्त स्मृति ! एक और  दिन कुछ पढ़ते - पढ़ते नास्टैल्जिया के लिए एक शब्द मिला - स्मृति राग, अच्छा लगा यह शब्द। अब जो भी हो....

आज  ढलती दोपहर में फेसबुक  ( इसे मैं प्यार से 'मुख पोथी' कहता हूँ ) पर नैनीताल के अपने  कालेज / कैंपस हॉस्टल के दिनों के मित्रमंडल के समूह चर्चा पटल पर एक पुरानी फिल्म  के गीत  के वीडियो का लिंक अपलोड किया तो यादों की जुगाली करते - करते  यूँ ही कुछ लिख  - सा दिया, बाद में  देखा तो लगा कि अरे यह  तो कविता - सी हो गई! अब हिन्दी  की दुनिया में  , नेट के आभासी संसार में सोशल नेटवर्किंग साइट्स व ब्लॉग्स आदि ने इतना तो कर ही दिया है 'कोई भी कवि बन जाए सहज संभाव्य है!'  तो ,आइए , देखते - पढ़ते हैं अपनी आज  ही लिखी यह कविता :

नास्टैल्जिया

सिनेमा - टीवी के पर्दे पर देखकर
जब भी  दीख जाता है शहर नैनीताल
याद आ जाते हैं वे गुजरे दिन
वे बीते साल।
जब उम्र के आकाश पर
छाया रहता था इन्द्रधनुष
और तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद
दुनिया दिखाई देती थी
सुन्दर - संतुष्ट - सुखी - खुशहाल।

हवा महसूस होती थी सुगंध से परिपूर्ण
उड़ते बादल देते थे प्रेरणा उड़ान की
और पहाड़ कहते थे कि देखो सदा ऊँचे स्वप्न।
अब भी मौका मिलते ही
उन्हीं वादियों में
विचरण करने को मचलता है बावरा मन।

अब इतने बरस बाद भी
भले ही ठहरा हो झील का जल
लेकिन नदियों में बह गया बहुत पानी
दुनिया बदलती जा रही है पल - प्रतिपल।
तमाम जतन और जुगत के बावजूद
हर ओर सतत जारी है कुरूपताओं का कारोबार
बढ़ता ही  जा रहा है कूड़ा कबाड़
फिर भी मन  का कोई कोई कोना
खोजता रहता है एकान्त
चाहता है  ऐसी जगह
जो बची हो कोमल - स्वच्छ- निर्मल।

क्या सचमुच
बचा है कोई ऐसा स्थान ?
या कि केवल कविता में ही
किया जा सकता है उसका अनुमान ?
--- 
( चित्र : मिरजाना गोटोवाक की पेंटिंग , साभार )

7 टिप्‍पणियां:

प्रशान्त ने कहा…

"जब उम्र के आकाश पर
छाया रहता था इन्द्रधनुष
और तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद
दुनिया दिखाई देती थी
सुन्दर - संतुष्ट - सुखी - खुशहाल।"

जो आज ’उस’ उम्र में हैं, उन्हें आज भी दुनिया उतनी ही ’सुन्दर - संतुष्ट - सुखी - खुशहाल’ दिखाई देती होगी.

सराहनीय ’स्मृति राग’!

स्वप्नदर्शी ने कहा…

तमाम जतन और जुगत के बावजूद
हर ओर सतत जारी है कुरूपताओं का कारोबार
बढ़ता ही जा रहा है कूड़ा कबाड़
फिर भी मन का कोई कोई कोना
खोजता रहता है एकान्त
चाहता है ऐसी जगह
जो बची हो कोमल - स्वच्छ- निर्मल।


bahut sundar!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता।

सहज समभाव्य है।

पारुल "पुखराज" ने कहा…

"हर ओर सतत जारी है कुरूपताओं का कारोबार"


स्मृति राग, शब्द पसंद आया

Vimlesh Tripathi ने कहा…

बहुत बढिया भाई...बहुत अच्छा लगा... आभार..

baabusha ने कहा…

Nostalgic !

अजेय ने कहा…

है तो सही एक जगह ..... पर कविता भी कहाँ अब उस जगह पर रहना चाहती है? वह भी भटक रही है .

स्मृति राग !
यह एक्स्प्रेशन बहुत क़रीब है . अब इस का इतना ही सशक्त लोक वर्जन भी खोजिएगा.