गुरुवार, 24 मार्च 2011

और शेष समय मैं एक स्त्री : वेरा पावलोवा

वेरा पावलोवा ( जन्म : १९६३ ) की कुछ कवितायें आप कुछ समय पहले 'कर्मनाशा' व 'कबाड़ख़ाना' के पन्नों पर पढ़ चुके हैं । उनकी कविताओं के मेरे द्वारा किए गए कुछ अनुवाद पत्र - पत्रिकाओं में भी आ रहे हैं। समकालीन रूसी कविता की इस सशक्त हस्ताक्षर ने छोटी - छोटी बातों और नितान्त मामूली समझे जाने वाले जीवन प्रसंगों को बहुत ही लघु  काव्य - कलेवर में उठाने - सहेजने व संप्रेषित करने की जो महारत हासिल की है वह  आकर्षित करती है।  वेरा का एक संक्षिप्त परिचय यहाँ है। आइए , आज बार फिर पढ़ते - देखते हैं उनकी पाँच कवितायें :


वेरा पावलोवा की पाँच कवितायें
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

०१- पीड़ा

मैं गाती हूँ, और दुखते हैं मेरे पाँव
मैं लिखती हूँ, और दुखते हैं मेरे जबड़े
करती हूँ प्यार, और दुखते हैं मेरे कंधे
जब मैं सोचती हूँ दुखने लगती मेरी ग्रीवा।

०२- प्रश्न

मैं चबाती और छींकती हूँ बिना आवाज
बंद कर लेती हूँ अपना मुँह जब आती है जँभाई
मैं काटती नहीं हूँ होंठ और हाथों के नख
न ही मैं अवरुद्ध कर पाती हूँ वायु का बहाव
ऐसा क्यों/
क्या मैं नहीं रह गई हूँ मनुष्य?

०३- जिज्ञासा

तुम्हारे बाहुपाश में
जब होती हूँ मैं
तुम सोचते हो : " यह मेरी है , सचमुच"
लेकिन मैं विदेह कर देती हूँ अपनी देह को
छिपकली की पूँछ की भाँति।
और तारकखचित नभ में
तुम्हें खोजना होता है मेरा होना
तब कौन सी काँक्षा होती है तुम्हारी
मेरी जंघाद्वय के मध्य।

०४ - अनुवाद

काश ! मैं जान पाती
कि किस भाषा में तुम
करते हो अपने प्रेम का अनुवाद।

काश !मैं बूझ पाती मूल
समझ पाती स्रोत
तो पलटती शब्दकोश।

सच मानो
प्रस्तुति है जस की तस
और अनुवादक का नहीं है कोई दोष।

०५ - पहचान

शिशिर में एक वन्या
वसंत में एक वनस्पति
ग्रीष्म में एक पतंगा
शरद में एक पखेरू
और शेष समय मैं एक स्त्री।

8 टिप्‍पणियां:

baabusha ने कहा…

Beautiful! I m touched. (Prashn,Zigyasa,Anuwaad,Pahchaan)
Sir, I could not understand the first one. Will u please interpret it. I don't want to miss a chance to know this lady.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बेहतरीन कवितायें।

मनोज पटेल ने कहा…

वाह, कमाल की कवितायेँ हैं. आपके बेहतरीन अनुवाद पढता रहता हूँ, और उनसे प्रेरणा भी मिलती है. संयोगवश इनमें से कुछ कविताओं का अनुवाद मैंने भी किया था, जो चन्दन पाण्डेय के ब्लॉग पर प्रकाशित है. कृपया उन्हें भी देखिए.

http://nayibaat.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बढ़िया विदेशी रचनाओं का सुन्दर अनुवाद!

अजेय ने कहा…

खूबसूरत , स्थूल कविताएं. आभार भाई.

अंतिम तो बस तबाही है.

Patali-The-Village ने कहा…

बेहतरीन कवितायें।

baabusha ने कहा…

आश्चर्य है.बड़े बड़े दिग्गज आये, टिपण्णी की और चले गए. इस शिशु के प्रश्न का समाधान किसी ने न किया?

गुणीजनों, पहली कविता समझा दीजिये. ये अवसर कैसे गँवा दिया जाए इस 'आज़ाद पखेरू' को जानने का !

आभारी रहूंगी.

baabusha ने कहा…

आभार !