बुधवार, 23 मार्च 2011

नदी चली जाएगी वह कभी न ठहरेगी

बचपन में शायद हम सभी ने एक चित्र जरूर बनाया होगा  जिसमें होता था - पहाड़ों के पार्श्व से उदित होता सूर्य, बहती  हुई नदी, नदी में नाव और तट पर बना हुआ एक छोटा - सा  सुंदर घर - एक ड्रीम हाउस। नदी यानि जल। ठहरा हुआ जल नहीं; गतिशील, वेगवान। कबीर के शब्दों में कहें तो 'बहता नीर' या 'बहता पानी निर्मला'। नदी यानि धरती का अपना खुद  का बहाव तंत्र  - निजी ड्रेनेज सिस्टम और उस पर बना हुआ पुल या उसे पार करने के निमित्त निर्मित नाव व उसे खेने की तरकीब  - मानो मनुष्य के अर्जित ज्ञान का मूर्त बखान - विचार का जीवंत स्थापत्य।  मनुष्य की सामाजिकता व 'स्व ' तथा 'पर' के दो पाटों के बीच की दूरी को पाट कर सहचर, सहगामी, साथी, संगी, संघाती जैसे शब्दों  की व्युत्पत्ति व उनके अर्थों की विध छवियाँ गढ़ने के क्रम व कर्म को नदी से  अधिक भला और कौन जानता  होगा !

नदी  का ठहराव बार - बार बाँधता है और उसकी अहर्निश  गति बार - बार मुक्त करती है। दुनिया भर की  भाषाओं  में नदियों की विरुद  को लेकर लिखी गईं  अनेकानेक कवितायें हैं और लिखी - रची जाती रहेंगी। नदी  निरंतर मेरे आकर्षण व आश्चर्य का विषय रही है। अक्सर उस पर कुछ -न कुछ लिखता - पढ़ता हूँ और हमेशा कोई नई राह  खुलती है,कोई नया प्रवाह  नए रास्ते पर ले चल पड़ता है। आइए आज साझा साझा करते हैं अपनी  यह एक नई कविता  :


नदी चली जाएगी

ढेर सारे पर्याय हैं नदी के
एक है - वेगवती
दूसरे शब्दों में कहें तो
वह जिसने धारण की है गति।
इसी तरह
नदी का एक और पर्याय है
 - सदानीरा
तरल-सजल रहना है
जिसकी आदत - प्रकृति।

जिस ठौर
जिस ओर से चलती है नदी
उस ओर वापसी
नहीं  होता है उसका नसीब।
चलना , चलते रहना
अनजान - अदेखी राहों पर
कैसा लगता होगा
शायद कौतूहल से पूर्ण?
शायद अजीब?

चलना है
नदी चली जाएगी
चलना ही है उसका प्रारब्ध
वह कभी न ठहरेगी।
लेकिन अक्सर
मुड़ जाते हैं संगी सहचर
बात यही कुछ अखरेगी।

5 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

चलना ही है उसका प्रारब्ध
वह कभी न ठहरेगी।
लेकिन अक्सर
मुड़ जाते हैं संगी सहचर
बात यही कुछ अखरेगी।...

लाजवाब !

दीपक बाबा ने कहा…

@चलना ही है उसका प्रारब्ध


satya kathan

baabusha ने कहा…

सुन्दर सृजन ! कोमल भाव !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

नदी का निर्विकार बहते रहना बहुत ही प्रेरित करता है मुझे भी।

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

हम्म्म..नदी की बात भी सही है और मैं हूं कि हमेशा तटों की हौ सोचती रहती हूँ कि कितना मजबूर है, वो जो लहर आई उसे सहारा देना और फिर उसे जाते हुए देखना और फिर नई लहर.. और फिर.... जिन तटों को एकनिष्ठ स्वभाव मिला हो उन्हे भी....


अपने अपने दर्द...