शनिवार, 19 मार्च 2011

चाँद और चुटकी भर गुलाल

आज सुबह से ही जिसका जिसका इंतजार था। वह आया तो लेकिन बादलों की ओट में छिपा हुआ। सुपरमून या बड़े चाँद को देखने की कोशिश की कई बार। बादलों के आवरण को परे करने की कोशिश भी कई बार।शाम को कस्बे में हुई कविता गोष्ठी से लौटते हुए बाजार की रौनक से चुँधियाते आसमान को ताका कई बार। चाँद दिखा,पर साफ नहीं..सुपरमून या बड़े चाँद के होने को देखा कम महसूस ज्यादा किया...।

आज छोटी होली है कल बड़ी होली रंग गुलाल वाली। सबको होली की बधाई मुबारकबाद। आइए आज साझा करते हैं आज अभी कुछ देर पहले लिखी गई यह कथा - कविता या कविता - कथा...


 चाँद और चुटकी भर गुलाल

आसमान में चाँद निकल आया था। वैसा नहीं जैसा कि वह चित्रों में दिखाई देता है। वैसा भी नहीं जैसा कि कि वह कविता - शायरी के कैनवस परचमकने लगता है। वैसा भी नहीं जैसा कि वह साहित्य - संगीत - कलाओं में नायिका के रूप - सौन्दर्य को रूपायित करता बताया जाता रहा है शताब्दियों से। वैसा भी नहीं जैसा कि वह किसी गोल - गोल रोटी की याद दिलाये।

तब कैसा चाँद?सचमुच का असली चाँद। गोल आसमानी। 

हम चाँद को देखने के लिए छत पर निकल आए थे। 

मैंने कहा - 'सुना है पृथ्वी के बहुत नजदीक आ गया है आज चाँद?

उसने कहा- 'वह दूर ही कब था?

सच कहूँ , आज पहली बार चाँद को गौर से देखा मैंने, शायद।

*
'तुम्हें संशय क्यों है?' उसने कहा।

मेरा प्रश्न- 'किस बात पर?'

- 'चाँद और उसकी नजदीकी पर।'

- ' नहीं यह संशय नहीं।'

- 'तो फिर?'

- 'कुछ नहीं।'

थोड़ी देर चुप्पी। मौन। गोया चाँद के उभरने, खिलने , निखरने को जरूरी हो वह। हो सकता है चुप्पियों के रास्ते पर चलता हो चाँद। हो सकता है शब्द उसके परिपथ विघ्न डालते हो।

- 'कुछ कहा तुमने?'

- 'नहीं।'

- 'तुमने कहा कुछ?'

- 'नहीं।'

- 'कुछ सुना मैंने शायद?'

- 'चाँद ने कुछ कहा होगा।'

- 'क्या? किससे?'

फिर थोड़ी देर चुप्पी। फिर थोड़ी देर मौन। गोया चुप्पियों में ही सुनी जा सकती है चाँद की बात। चुप्पी न हो तो कैसे बीते रात।

**
मैंने कहा -'कहाँ है चाँद?'

उसने कहा -' तुम बताओ?'

फिर थोड़ी देर चुप्पी। फिर थोड़ी देर मौन। गोया चुप्पियों में ही देखा जा सकता है चाँद। चुप्पी न हो तो आवाजों से भर जाए धरती - आसमान।

उसने चुटकी भर गुलाल लिया और मेरे माथे पर एक वृत्त उकेर दिया। ऐसा ही कुछ मैंने भी किया उसके गाल पर।

फिर थोड़ी देर चुप्पी। फिर थोड़ी देर मौन। गोया चुप्पियों में ही छुआ जा सकता गुलाल। चुप्पी न हो तो मंद पड़ जाए उनकी चटख।

***
- 'अब तुम लोग एक दूसरे की आँखों में देखो।' यह चाँद की आवाज थी। 

चाँद कह रहा था - ' बताओ तो कहाँ है चाँद?'

उसने मुझे देखा , मैंने उसे। जैसे पहली बार एक दूसरे को देख रहे हों। दृष्टि मिली तो दोनो ने एक साथ ऊपर देखा आसमान की ओर।

उसने कहा -'देखो वहाँ भी है एक चाँद।'

मैंने कहा- 'हाँ , वहाँ भी।'

आसमान में चाँद निकल आया था। वैसा नहीं जैसा कि वह तस्वीरों में दिखाई देता है। 

9 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर वार्तालाप रचना!
आपको पूरे परिवार सहित होली की बहुत-बहुत शूभकामनाएँ!

दीपक बाबा ने कहा…

चाँद चाँद में फर्क होता है जी, और ये फर्क देखने वाले की आखों और दिलो दिमांग से बनता है.....


रंग भरे इस त्यौहार ही शुभकामनाएं.

Poorviya ने कहा…

उसने कहा -'देखो वहाँ भी है एक चाँद।'

मैंने कहा- 'हाँ , वहाँ भी।'

आसमान में चाँद निकल आया था। वैसा नहीं जैसा कि वह तस्वीरों में दिखाई देता है।

आपको पूरे परिवार सहित होली की बहुत-बहुत शूभकामनाएँ.......jai baba banaras....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ा चाँद है होली में, सबको बधाई।

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनायें!

baabusha ने कहा…

अजब विधा है 'बतकही ' . बात बिना मुड़े - तुड़े सीधे दिल में उतरती है . Interpretation की कोई गुंजाइश नहीं. ये 'बतकही ' तो सीधे उतरी कलेजे में ! उम्दा !

pratibha ने कहा…

Adbhut!

PRAGYAN ने कहा…

Will you please, permit us to publish this beautiful short story in our regular journal PRAGYAN, get published regularly from Tinsukia College?
Sushanta Kar,
Executive Editor,
Please mail us at pragyan.tsc50@gmail.com

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

सूचनाः

"साहित्य प्रेमी संघ" www.sahityapremisangh.com की आगामी पत्रिका हेतु आपकी इस साहित्यीक प्रविष्टि को चुना गया है।पत्रिका में आपके नाम और तस्वीर के साथ इस रचना को ससम्मान स्थान दिया जायेगा।आप चाहे तो अपना संक्षिप्त परिचय भी भेज दे।यह संदेश बस आपको सूचित करने हेतु है।हमारा कार्य है साहित्य की सुंदरतम रचनाओं को एक जगह संग्रहीत करना।यदि आपको कोई आपति हो तो हमे जरुर बताये।

भवदीय,

सम्पादकः
सत्यम शिवम
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