शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

जैसे कि किसी लम्बे वाक्य से गिर पड़ता है एक शब्द

कल दिलीप चित्रे नहीं रहे। साहित्य और सिनेमा तथा चित्रकला की दुनिया में उन्हें बहुत आदर के साथ याद किया जाता है। अब यह कहते हुए कितना अजीब-सा लग रहा है कि वे हमारे बीच नहीं हैं। हमारे साथ अगर कुछ है तो उनका विपुल सृजन और बेशुमार यादें। शायद ऐसे ही मौकों के लिए 'प्यारे हरिचंद जू' ने कहा था कि ' कहानी रहि जायेगी' और दिलीप चित्रे जी की कहानी रहेगी , रहि जायेगी॥

कल देर रात उन पर एक श्रद्धंजलि पोस्ट लिखी थी , लिखी क्या थी कंपाइल की थी। बहुत दिनों दे उनकी कुछ कविताये अपने 'कंपूटरजी' के 'अनुवाद के लिए ' नाम्नी फोल्डर पड़ी थीं / पड़ी हैं और आलस्य तथा कार्याधिक्य के कारण 'आज नहीं तो कल' चलता रहा। अभी कुछ देर पहले दिलीप चित्रे जी की एक कविता 'Father Returning Home' का अनुवाद किया है दिवंगत सृजनकर्ता के प्रति पूरे आदर और सम्मान के साथ श्रद्धांजलि स्वरूप इसे साझा कर रहा हूँ :



घर वापस आते हुए पिता
( दिलीप चित्रे की कविता अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह ))


देर शाम की रेलगाड़ी से
यात्रा करते हैं मेरे पिता
चुप्पी मारे यात्रियों के साथ
पीली रोशनी के साए में
खड़े हैं वे।
आँखे जो कुछ नहीं देखना चाहती हैं फिलहाल
उन्हीं से गुजर कर पीछे छूटते जा रहे हैं उपनगर।
गीली हैं उनकी पैन्ट व कमीज
काली बरसाती पर लगे हैं कीचड़ के धब्बे
और बाहर निकलने को बेचैन हैं उनके झोले में ठुँसी किताबें।
उम्र के भार से मंद हो चली उनकी आँखों में
उतर रहा है घर का रास्ता
बारिश से आर्द्र हुई इस रात में।

अब मैं देख सकता हूँ कि वे ट्रेन से उतर रहे हैं
वैसे ही जैसे कि किसी लम्बे वाक्य से गिर पड़ता है एक शब्द
वे हड़बड़ी में पार कर रहे हैं स्लेटी प्लेटफार्म की लम्बाई
फलाँग रहे हैं रेल की पटरियाँ और दाखिल हो जाते हैं गली में
कीचड़ से चिपचिपी हो चुकी हैं उनकी चप्पलें
फिर भी कम नहीं होती है उनकी हड़बड़ी।

घर वापसी - एक बार फिर
मैं उन्हें देखता हूँ -
पनियल चाय पीते
बासी रोटी कुतरते
किताब पढ़ते
वे संडास में दाखिल होते हैं ताकि विचार कर सकें
कि मनुष्य की बनाई दुनिया में
क्यों बढ़ रहा है मनुष्य का विलगाव
बाहर आकर वे काँपते दीखते हैं सिंक के पास
उनके भूरे हाथों से बह रहा है ठंडा पानी
कलाई के बुढ़ाते बालों से चिपकी हैं कुछ जल-बूँदें।
उनके रूठे - से बच्चे अक्सर टाल जाते हैं
साथ बाँटना मजाक और गुप्त बातें।

अब वे सोने चले जायेंगे
और सुनते रहेंगे रुके हुए समय को अपने रेडियो पर
वे सपने देखेंगे पुरखे - पुरनिया और नाती पोते के
वे सोचेंगे बंजारों के बारे में
जो एक सँकरे दर्रे से दाखिल हो रहे हैं किसी उपमहाद्वीप में।

6 टिप्‍पणियां:

Ashok Pande ने कहा…

क्या कहा जाए भाई!

अफ़सोस, सद अफ़सोस!

Udan Tashtari ने कहा…

उनके रूठे - से बच्चे अक्सर टाल जाते हैं
साथ बाँटना मजाक और गुप्त बातें।

-दिल में कहीं गहरे पैठ कर गया यह अनुवाद!!

आह्ह!!


दिवंगत को श्रृद्धांजलि!!

शरद कोकास ने कहा…

दिलीप चित्रे जी का जाना दुखद है, उनकी कविताओं का आम इंसान कहाँ कहाँ दिखाई दे जाता है , अभी उनकी इस कविता में मुम्बई मे रहने वाले मेरे चाचा मुझे दिखे और मेरे मामा जो अब इस दुनिया में नहीं हैं .. दिलीप जी से अभी अभी फेस बुक पर मुलाकात हुई थी जब उनका कैंसर का उपचार चल रहा था ,किसे पता था वे चले जायेंगे।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

दिलीप चित्रे जी को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूँ और उनकी आत्मा की सदगति के लिए परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ!

अनिल कान्त : ने कहा…

दिल में कहीं गहरे तक जाती हैं ये पंक्तियाँ

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर कविता और अनुवाद । दिलीप चित्रे जी को विन्म्र शरद्धाँजली । धन्यवाद्