शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

क्योंकि पता चल गया है प्रेम का पता !




प्रेम

यह क्या है?
क्या पता !

यह क्यों है?
पता नहीं !

यह कैसा है?
क्या जाने !

यह कहाँ है?
अपने पते पर !

इसका पता ?
क्या पता !

क्या लापता ?
नहीं तो
यह मैंने कब कहा !

तो क्या कहा ?
प्रेम : मैंने कहा ।

और कुछ शेष ?
नहीं।

क्यों ?
क्योंकि पता चल गया है प्रेम का पता !

7 टिप्‍पणियां:

शरद कोकास ने कहा…

अब पता चल ही गया है तो क्या किया जाये?

Dev ने कहा…

वाह
अत्यंत उत्तम लेख है
काफी गहरे भाव छुपे है आपके लेख में
.........देवेन्द्र खरे

sidheshwer ने कहा…

@ शरद कोकास
भाई ! प्रेम किया जाए , और क्या ! !

वाणी गीत ने कहा…

पता चल गया ...
आख़िर कब तक छुपता ...:)....!!

'अदा' ने कहा…

अच्छा पता चल गया ?
मुझे पता नहीं चला :):)

pratibha ने कहा…

अरे वाह! जिसकी तलाश में सब इधर-उधर भटकते फिर रहे हैं आपको उसका पता चल गया. छुपाकर रखियेगा.
बहुत सुंदर!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

देखन में छोटे लगें,
मार करें गम्भीर!