बुधवार, 2 दिसंबर 2009

प्रेम कई तरह से आपको छूता है : कविता और कलाकृति की जुगलबंदी


कुछ समय पहले मैंने 'कबाड़खाना' पर रानी जयचन्द्रन की कविताओं के कुछ अनुवाद प्रस्तुत किए थे। इन कविताओं के चुनाव के पीछे मंशा यही थी कि समकालीन भारतीय अंग्रेजी कविता में आजकल क्या / कैसा चल रहा है , उससे रू-ब-रू हुआ जाय और प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते की रागात्मक डोर को स्पर्श किया जाय।अब जबकि हमारे चारों ओर प्रकृति के बिगड़ते चेहरे पर विमर्श का बोलबाला है किन्तु उसको बचाने - बनाने - सँवारने के काम में वह गर्मजोशी और सक्रियता नहीं है जो होनी चाहिए , जो जरूरी ही नहीं अनिवार्य भी है।

रानी जयचन्द्रन की कवितायें हमारे भीतर की बची हुई संवेदनशीलता को नम बनाए रखने में मदद करती हैं साथ ही वह बात को कहने का एक अलग मुहावरा भी सामने रखती हैं।अनुवाद में मैं उनकी बात को कितना पकड़ पाया यह तो सहृदय पाठक जानें किन्तु यह देखकर खुशी हुई कि एक चित्रकार को इससे चित्र बनाने की प्रेरणा मिली। इसी बात को यूँ भी कहा जा सकता है कि कविता और चित्रकला के सम्मिलन का निमित्त मेरे द्वारा किया गया एक अनुवाद बना। अधिकांश लोगों के लिए यह एक साधारण बात हो सकती है किन्तु मेरे लिए यह एक खुशी का अवसर है और अनुवाद जैसे श्रमसाध्य काम की स्वीकृति भी।

भाई रवीन्द्र व्यास के कई रूप हैं - वे एक चित्रकार और ब्लागर हैं उन्होंने 'वेबदुनिया' के अपने साप्ताहिक कालम में रानी जयचन्द्रन की कविता 'जादुई प्रेम' को आधार बनाकर या उसके बहाने या उससे प्रेरित होकर एक चित्र बनाया है और बहुत अच्छा आलेख लिखा है जो इस कविता को देखे जाने के ( एक अलग ) नजरिए की ओर इशारा करता है। शुक्रिया रवीन्द्र भाई ! लीजिए 'वेबदुनिया' से साभार और यथावत प्रस्तुत है रवीन्द्र जी का वह चित्र और आलेख :

चाँदनी की रश्मियों से चित्रित छायाएँ
( रानी जयचंद्रन की कविता और प्रेरित कलाकृति )


प्रेम कई तरह से आपको छूता है, स्पर्श करता है. आपकी साँसों को महका देता है। और यह सब इतने महीन और नायाब तरीकों से होता है कि कई बार आप उसे समझ नहीं पाते। यह एक तरह का जादू है। यह कभी भी, कहीं भी फूट पड़ता है, खिल उठता है, महक उठता है। इसी जादुई अहसास से जब प्रेमी अपनी आँखों से जो कुछ भी देखता है उसे वह प्रेममय जान पड़ता है।

उसे लगता है कायनात का हर जर्रा प्रेममय है। हर तरफ प्रेम के दृश्य हैं, हर तरफ प्रेम के ही बिम्ब हैं और हर तरफ प्रेम के ही फूल खिले हैं। रानी जयचंद्रन केरल की युवा कवयित्री हैं। उनकी कविताओं का नया संग्रह हाल ही में आया है जिसमें कुछ कविताओं का अनुवाद एक ब्लॉगर और कवि सिद्धेश्वर ने किया है। रानी की एक कविता है जादुई प्रेम। इसमें केरल की प्राकृतिक सुंदरता तो है ही लेकिन उससे भी सुंदर है रानी की वह प्रेमिल आँख जिसके जरिए वह प्रकृति का मार्मिक और खूबसूरत मानवीयकरण करती हैं।
कविता इन पंक्तियों से शुरू होती है-

अस्ताचल के आलिंगन में आबद्ध
डूबता सूरज
समुद्र से कर रहा है प्यार
इस सौन्दर्य के वशीकरण में बँधकर
देर तक खड़ी रह जाती हूँ मैं
और करती हूँ इस अद्भुत मिलन का साक्षात्कार।

यह एक आम दृश्य है। हम सब ने इसे कभी न कभी, कहीं न कहीं देखा है लेकिन क्या हमने इसका साक्षात्कार किया है। इसे महसूस किया है। एक कवयित्री एक आम दृश्य को अपनी विलक्षण प्रेमिल निगाह से उसे एक अद्वितीयता दे रही है। आगे की पंक्तियों पर गौर फरमाएँ-

प्यार की प्रतिज्ञाओं और उम्मीदों से भरी
भीनी हवा के जादुई स्पर्श से
अभिभूत और आनंदित मैं
व्यतीत करती हूँ अपना ज्यादातर वक्त
यहीं इसी जगह
और मुक्त हो देखती हूँ
जल में काँपते चाँद को बारम्बार।

हम हमारा ज्यादातर समय कहाँ व्यतीत करते हैं। शायद अधिकांश समय हम नकली और भड़कीले चीजों को देखने में नष्ट कर देते हैं। भड़कीले और शोरभरे दृश्यों को देखने में नष्ट कर देते हैं। लेकिन एक कवयित्री हमें दृश्य दिखा रही है जिसमें सुंदरता है, बिम्ब है और इस दृश्य के जरिये उदात्त मानवीय भावनाएँ अभिव्यक्त हो रही हैं। यहाँ भीनी हवा का अहसास ही नहीं है उसका जादुई स्पर्श है, और मुक्त होकर जल में काँपते चाँद को देखने का विरल अनुभव भी। यह हमारे अनुभव को कुछ ज्यादा मानवीय बनाता है, ज्यादा सुंदर बनाता है।

इस अद्भुत मिलन के दृश्य से
भीगकर भारी हुई पृथ्वी
खड़ी रह गई है तृप्त -विभोर।
और चाँदनी की रश्मियों से चित्रित
बनी - अधबनी छायाएँ
फैलती ही जाती हैं वसुन्धरा के चित्रपट पर
यहाँ-वहाँ हर ओर।

और कविता का असल मर्म आखिर में खुलता है कि यह अद्भुत मिलन का दृश्य है जिससे भीगकर हमारी यह पृथ्वी भारी हो गई है और उसकी छायाएँ वसुंधरा पर फैलती जा रही हैं। यह प्रेम का ही विस्तार है। प्रेम ही हमें उदात्त बनाता है, विशाल बनाता है और आंतरिक खुशी के साथ आंतरिक वैभव भी प्रदान करता है। जिस तरह सूर्य, प्रृथ्वी, हवा, चाँद और मिलन से यह कविता वैभवपूर्ण और विशाल बनती है यह सिर्फ प्रेम की वजह से ही संभव है।

11 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

कविताओं के साथ चित्र!!! पसंद आया..अद्भुत!!

शरद कोकास ने कहा…

सिद्धेश्वर जी, आज सुबह सुबह यह आलेख पढना बहुत अच्छा लगा .. अपनी एक कविता की यह पंक्तियाँ याद आ गई ...
प्रेम की लिखित अलिखित तमाम परिभाषाएँ
अपनी किताबी परिभाषाओं से बाहर घटित होती है
इसलिए प्रेमियों को अज्ञेय अच्छे लगते है इन दिनों
और मार्क्स को दिमाग में जगह मिलती है
अपने दर्शन में तमाम तरह के विरोधाभास लिए
प्रेम हर वक्त बुराईयों से लड़ता है
शोषण का अर्थ समझाता है प्रेम
बदहाली के कारण गिनवाता है
प्रेम मनुष्य के भीतर नायकत्व को जन्म देता है
- शरद कोकास

sanjay vyas ने कहा…

प्रेम आपको कई तरह से स्‍पर्श करता है और एक अच्‍छी प्रेम कविता भी.

अनिल कान्त : ने कहा…

यह आलेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा और यह चित्र वाह !

सागर ने कहा…

ओह ! कितना विशाल पोस्ट... समंदर...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

प्रेम की परिभाषाओं के साथ-साथ चित्र भी नायाब हैं।।
बधाई!!!

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

यह प्रेम का ही विस्तार है। प्रेम ही हमें उदात्त बनाता है, विशाल बनाता है और आंतरिक खुशी के साथ आंतरिक वैभव भी प्रदान करता है। जिस तरह सूर्य, प्रृथ्वी, हवा, चाँद और मिलन से यह कविता वैभवपूर्ण और विशाल बनती है यह सिर्फ प्रेम की वजह से ही संभव है।

इस लेख पर इससे अच्छा कुछ कहा पाना संभव नही मेरे लिये.....!

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

कोकास जी की ये कविता भी बहुत सुंदर...!

दरअसल प्रेम वो भावना है जो अलग अलग लोगो में अलग अलग तरह से आती है....! जहाँ जिस तरह आती है वहाँ उस तरह परिभाषित होती है....! मगर जो भी परिभाषा हो, हर परिभाषा चूँकि हृदय तल से निकली हुई होती है अतः अद्भुत होती है....! प्रेम का हर रूप सम्मोहक है..! बस मन में आ भर जाये...!

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

अद्भुत!
अद्भुत!!
अद्भुत!!!

रानी जयचंद्रन आप और रवींद्र भाई एक सम्पूर्ण जुगलबंदी.

रवींद्र भाई बेहद समर्पित चित्रकार और साहित्यकर्मी हैं

...और चच्चा आपके तो क्या कहने. यही जोश हमेशा बना रहे.

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अद्भुत
अभी प्रेम पर कोई तीन सौ कोटेशन्स का अनुवाद किया है सो तमाम बातें याद आ रही हैं…सोचता हूं विस्तार से एक पोस्ट लगाऊं इस पर

अभी तो बस अद्भुत!!

चंदन कुमार झा ने कहा…

ओह बहुत सुन्दर !!!!!!