शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

एक पाठक का चुनाव : टेड कूजर

किसी कविता को , कविता की किसी किताब , कवि के कृतित्व को उसका  अपना , अपने किस्म का पाठक मिले  इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ! पाठक कैसा हो ? उसे कैसा होना चाहिए ? उसे कैसा दीखना चाहिए? उसे  कैसा सोचना चाहिए? इस प्रकार के प्रश्न और उत्तरों की एक सरणि है जो चल रही और चलती रहेगी। आइए , कुछ इसी  तरह  की बात से जुड़ती हुई एक कविता पढ़ते हैं जिसे लिखा है मशहूर अमेरिकी कवि टेड कूजर ने। आज से कई साल पहले 'द न्यूयार्क टाइम्स ' को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था   कि 'Poetry can enrich everyday experience, making our ordinary world seem quite magical and special.' आइए इस  छोटी - सी कविता के बहाने देखने की  एक कोशिश करते हैं कि हमारी रोज की दुनिया में कविता की कैसी दुनिया है और वह इस दुनिया की  दैनन्दिन साधारणता में कितना और कैसा जादू उपस्थित कर पाती है। तो ,  लीजिए पढ़ते हैं यह कविता :


टेड कूजर की कविता
एक पाठक का चुनाव  
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

सर्वप्रथम , मैं चाहूँगा कि वह सुन्दर हो
और मेरी कविता में  चल रही हो सावधानीपूर्वक
दोपहर बाद के निपट अकेले एकान्त में
धुलाई के बाद  उसकी गर्दन पर चिपके हों गीले बाल
वह पहने हुए हो पुराना मैला रेनकोट
क्योंकि उसके पास फालतू पैसे नहीं है धुलाई करवाने के लिए।
                                                                                                                                         
वह निकालेगी अपना चश्मा
वहाँ किताबों की दुकान में
मेरी कविताओं को उठाकर देखेगी
और बाद में किताब को  रख देगी शेल्फ़ में
वह स्वयं से कहेगी
'इस तरह के पैसों से मैं धुलवा सकती हूँ अपना रेनकोट'
और वह करेगी ऐसा।
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* ( चित्र : शैन्टल जोफ़  की  कृति  'येलो  रेनकोट', गूगल छवि से साभार)

4 टिप्‍पणियां:

meeta ने कहा…

इस दिलचस्प कविता से परिचित करवाने के लिए आप का आभार .

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बहुत सुंदर !

अजेय ने कहा…

सच वो ऐसा ही करेगी .

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-01-2014) को "सत्य कहना-सत्य मानना" (चर्चा मंच-1496) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'