शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको

पिछली पोस्ट के क्रम को आगे बढ़ाते हुए  विश्व कविता के प्रेमियों और पाठकों के लिए आज  एक बार फिर प्रस्तुत है तुर्की कवि  - गीतकार अहमेत इल्कान की यह एक  और कविता :

तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको
( अहमेत इल्कान की कविता )

किस किस्म की विदाई है यह , किस किस्म की अलविदा
तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको , तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान
तुंहारी छवि है कुंजियाँ , तुम्हारी आँखे ताले
तुम्हारी बाँहें कहती हैं खुलो, तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

बिछोह है वह नदी जो नहीं पलटती उद्गम की ओर
अकेलापन है एक उजड़ा वीरान नगर
कौन जाने कितना- कितना प्रेम मिल गया खाक़ में
तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको, तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

यदि मैं चला गया तो  होगा नहीं पुनरागमन
यदि मैंने कह दी मन की बात दु:खता रहेगा दिल
तुम्हें अब तक समझ सका न मैं, हो जाऊँगा पागल
तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको , तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

क्या दीवारों पर चस्पा कर दिए गए हमारे चित्र?
क्या सबके लिए हमारा नाम हो गया अजूबा?
कहो , किस जतन से गुजर रही हैं पगलायी रातें?
स्मृतियाँ कहती हैं रुको , तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

यह किस्सा भी खत्म हो जाएगा बहुत जल्द
प्रेम ने तहस नहस कर दिया सारा संकोच , सब मान
फिर हिजाज़* से सिसकियाँ भरेंगे सुर
गीत कहते हैं रुको , तुम्हारे अधर  कहते हैं प्रस्थान।
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* जगह / क्षेत्र का नाम
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग :  भारवि  त्रिवेदी  की  कृति  'बेस्ट फ़्रेंड्स' , गूगल छवि से साभार)

3 टिप्‍पणियां:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति ,,,आभार
दीपावली की हार्दिक बधाईयाँ एवं शुभकामनाएँ ।।
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RECENT POST -: तुलसी बिन सून लगे अंगना

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार (03-11-2013) "बरस रहा है नूर" : चर्चामंच : चर्चा अंक : 1418 पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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प्रकाशोत्सव दीपावली की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रविकर ने कहा…

पाव पाव दीपावली, शुभकामना अनेक |
वली-वलीमुख अवध में, सबके प्रभु तो एक |
सब के प्रभु तो एक, उन्हीं का चलता सिक्का |
कई पावली किन्तु, स्वयं को कहते इक्का |
जाओ उनसे चेत, बनो मत मूर्ख गावदी |
रविकर दिया सँदेश, मिठाई पाव पाव दी ||


वली-वलीमुख = राम जी / हनुमान जी
पावली=चवन्नी
गावदी = मूर्ख / अबोध