गुरुवार, 24 नवंबर 2011

जहाँ भय से परे है मन

रवीन्द्रनाथ टैगोर को पहली बार हाईस्कूल में  अंग्रेजी के कोर्स  में पढ़ा था। वह एक  छोटा - सा नाटक था 'सेक्रीफाइस'। बाद में स्कूल की लाइब्रेरी से  ही उनकी एक और किताब निकाली थी , उसका शीर्षक 'चित्रांगदा' था शायद। कुछ समय बाद उनका एक उपन्यास पढ़ा 'नौका डूबी'।  इस उपन्यास की कथाभूमि ग़ाज़ीपुर है और उसमें वर्णित  जगहें सब  देखी हुई हैं।  यह  सब स्कूल के दिनों की बात है। एक दिन क्लास में अपने हिन्दी अध्यापक से पूछा कि 'रवीन्द्रनाथ टैगोर और रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक ही है क्या?' अध्यापक ने गौर से देखा, घूरा और कहा कि 'वे  तो एक ही हैं लेकिन तुम अपने कोर्स की किताबें पढ़ने में मन लगाओ। अभी तुम्हारी उम्र नहीं  है टैगोर को पढ़ने की।' पता नहीं टैगोर को पढ़ने की उम्र  कभी हुई  या नहीं या कि  कब होगी  पता नहीं लेकिन सच यह है कि  एक उम्र चाहिए उन्हें पढ़ने - गुनने - सुनने के लिए। टैगोर की 'गीतांजलि' में संकलित एक कविता Where the mind is without fear .. को  इस बीच  अपने कस्बे  में  कई  बार फरमाइश पर बच्चों और बड़ों की गोष्ठियों सुनाया है। इसके  कुछ हिन्दी अनुवाद  भी देखे - पढ़े है । आज शाम को कुछ यूँ ही लिखते - पढ़ते  इस कविता का एक अनुवाद किया है। यह मात्र  भाषांतर नहीं है। मेरे लिए एक तरह का पुनर्सृजन है तो ही , साथ में कविगुरु के प्रति नमन और पुण्य स्मरण भी। आइए इसे  साझा करते हैं :

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता
जहाँ भय  से परे है मन
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

जहाँ मुक्त है ज्ञान
जहाँ भय  से परे है मन
और उन्नत है  मस्तक - ललाट।
और जहाँ जगत को
सँकरी घरेलू दीवारों से
छोटे छोटे टुकड़ों में
नहीं दिया गया है बाँट।

जहाँ सत्य के अतल तल से
अवतरित होते हैं शब्द
जहाँ श्लथ प्रयासरत भुजायें
तलाश करती हैं पूर्णता का उर्ध्व
जहाँ प्रवाहित है तर्क की स्पष्ट धार।
सुनसान रेतीले बियाबान प्रान्तर में
मृत रीतें अब भी
विस्मृत न कर पाई हैं सहज राह
और गतिमय है यात्रा लगातार।

जहाँ मानस में
उपजते हैं विपुल विचार
व्यापक सक्रियता के पथ पर
तुमसे अग्रगामी होता जाता है पंथ।
और पहुँच जाता है
स्वतंत्रता के स्वर्ग में
लाँघता हुआ  दिशायें - दिगन्त।

हे प्रभु
हे ईश्वर
हे करुणानिधान।
जाग्रत हो
जागे मेरा देश
गाये स्वातंत्र्य का नव गान।
---
( पेंटिंग : गगनेन्द्रनाथ टैगोर की चित्रकृति )

7 टिप्‍पणियां:

बाबुषा ने कहा…

मेरी बेहद पसंदीदा कविताओं में है ये - where the mind is without fear and the head is held high.
अनुवाद भी बेहद उम्दा

अनुपमा पाठक ने कहा…

well rendered translation!

meeta ने कहा…

Beautiful translation for this remarkable poem of Tagore. Thanks !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

reena ने कहा…

apney bahut hi bariki sey kavita key marm ko padka hai .....badhai

reena ने कहा…

apney kavita kevita key marm ko bakhubi pakda hai....bahut sateek anuvaas....badhai...

Onkar ने कहा…

सुन्दर अनुवाद