बुधवार, 19 नवंबर 2008

बदल रहा तेवर यह आईना








जल्दी से कर लो सिंगार
बदल रहा तेवर यह आईना

धीरे – धीरे बिछ रही है शीशे पर धूल
उग रहे हैं इसमें बेर और बबूल
कौन जाने आंख झपकाते ही
हो जाये बंजर यह आईना


जल्दी से कर लो सिंगार
बदल रहा तेवर यह आईना

आंखों में आंज लो काजर की रेख
क्या पता निकाल दे कोई मीन – मेख
तन से आलोचक है
मन से है शायर यह आईना

जल्दी से कर लो सिंगार
बदल रहा तेवर यह आईना

7 टिप्‍पणियां:

मीत ने कहा…

बहुत खूब.

swati ने कहा…

बहुत सुंदर - और बिल्कुल अलग सा......खुबसूरत रचना...

ravindra vyas ने कहा…

दिलकश।

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

ye aaina shringaar karne vaale ko itana daraa kyo.n raha hai...???? :) :)

महेन ने कहा…

लूट लिया आपने भाई। क्या खूब।

Manish Kumar ने कहा…

तन से आलोचक है
मन से है शायर यह आईना
kya khayal hai bahut khoob..

एस. बी. सिंह ने कहा…

खूबसूरत! कभी एक शेर लिखा था-
हुश्न की धूप ढली जिस्म के मौसम बदले
आइना कितने हादसों का हमकिनार रहा।