गुरुवार, 13 नवंबर 2008

'तर्ज़' का तवील तजकिरा ..और शहरे - लखनऊ में हिना बन गई ग़ज़ल



तारीख ठीक से याद नहीं , इतना जरूर याद है कि अक्टूबर या नवम्बर का महीना था. जगह और साल की याद अच्छी तरह से है - गुवाहाटी,१९९२. दशहरा - दुर्गापूजा की उत्सवधर्मिता के उल्लास का अवसान अभी नहीं हुआ था. मौसम के बही - खाते में सर्दियों के आमद की इंदराज दर्ज होने लगी लगी थी और मैं पूजा अवकाश के बाद पूर्वोत्तर के धुर पूरबी इलाके की यात्रा पर था. गुवाहाटी में एक दिन पड़ाव था. पलटन बाजार में यूं ही घूमते - फिरते एक म्यूजिक शाप में घुस गया था. नई जगहों पर, 'नए इलाके में' म्युजिक शाप और बुकशाप का दीख जाना कुछ ऐसा -सा लगता है मानो दुनिया -जहान के गोरखधंधे में सब कुछ लगभग ठीकठाक चल रहा है. अच्छी तरह पता है कि यह अहसास बेमानी है - यथास्थिति से एक तरह का पलायन फिर भी.. खैर, किस्सा - कोताह यह कि उस संगीतशाला से दो कैसेटें खरीदी थी -एक तो टीना टर्नर के अंग्रेजी गानों की और दूसरी हिन्दी -उर्दू सिनेमा की मौसिकी को नई ऊँचाइयां देने वाले नौशाद साहब की पेशकश 'तर्ज़'. यह १९९२ की बात है.तब से अब तक इसे कितनी बार सुना गया है - कोई गिनती नहीं. तब से अब तक ब्रह्मपुत्र में कितना पानी बह चुका है - कोई गिनती नहीं . तब से अब तक भाषा के सवाल को लेकर कितने उबाल आ चुके हैं / आते जा रहे हैं -उन्हें शायद गिना जा सकता है...

पता नहीं क्यों जब भी 'तर्ज़' की गज़लों को सुनता हूँ तो मुझे मेंहदी हसन साहब और शोभा गुर्टू की आवाज में भीगा हुआ गुवाहाटी शहर दिखाई देने लगता है.सराइघाट के पुल से गुजरती हुई रेलगाड़ियों की आवाजें ललित सेन के इशारों पर बजने वाले साजों- वाद्ययंत्रों से बरसने वाली आवाजों की हमकदम -सी लगने लगती हैं. स्मृति की परतों की सीवन शिथिल पड़ने लगती है और एक -एक कर विगत के विस्मयकारी पिटारे का जादू का 'इन्द्रजाल' रचने लगता है. ब्लूहिल ट्रेवेल्स के बस अड्डे की खिड़की पर लगी डा० भूपेन हजारिका की बड़ी -सी मुस्कुराती तस्वीर.. मन में गूँजने लगता है - हइया नां , हइया नां... बुकु होम -होम करे. इस इंसान की आवाज जितनी सुंदर है उससे कई गुना सुंदर इसकी मुसकान है - कुछ विशिष्ट , कु्छ बंकिम मानो कह रही हो कि मुझे सब पता है, रहस्य के हर रेशे को उधेड़कर दोबारा -तिबारा बुन सकता हूं मैं...'एक कली तो पत्तियाँ' . सचमुच हम सब एक कली की दो पत्तियाँ ही तो हैं - एक ही महावॄक्ष की अलग - अलग टहनियों पर पनपने -पलने वाली दो पत्तियाँ- आखिर कहाँ से, किस ओर से , कौन से चोर दरवाजे से आ गया यह अलगाव.. हिन्दी ,अरे नहीं - नही देवनागरी वर्णमाला का बिल्कुल पहला अक्षर - पहला ध्वनि प्रतीक ही तो है यह 'अ' जो उपसर्ग के रूप में जहाँ लग जाता है वहीं स्वीकार - सहकार नकार - इनकार में में बदल जाता है. वैसे कितना हल्का , कितना छोटा - सा है यह 'अ' . क्या हम इसे अलगा -विलगा कर 'अलगाव' को 'लगाव' में नहीं बदल सकते ?
बतर्ज 'तर्ज़' मैं जब चाहता हूँ स्मॄति के गलियारे में घूम आता हूँ. बिना टिकट -भाड़ा के , बिना घोड़ा-गाड़ी के चाय बागानों की गंध को नथुनों में भर कर 'ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे -धीरे' की दुनिया में विचरण लेता हूँ. क्या केवल इसीलिए कि इस कैसेट को गुवाहाटी के पलटन बजार की एक दुकान से खरीदा था .या कि पूर्वोत्तर में बिताए सात -आठ साल किताबों और संगीत के सहारे ही कट गए. सोचता हूँ अगर किताबें न होतीं ,संगीत न होता तो आज मैं किस तरह का आदमी होता ? शायद काठ का आदमी !

मित्रो. अगर आपने अभी तक के मेरे एकालाप - प्रलाप को झेल लिया है और 'कुछ आपबीती - कुछ जगबीती' की कदाचित नीरस कहन को अपनी दरियादिली और बड़प्पन से माफ कर दिया है तो यह नाचीज अभी तक जिस 'तर्ज़' का तवील तजकिरा छेड़े हुए हुए था उसी अलबम से गणेश बिहारी 'तर्ज़' के शानदार शब्द, नौशाद साहब के स्वर में 'तर्ज़' की परिचयात्मक भूमिका और उस्ताद मेंहदी हसन साहब की करिश्माई आवाज में उर्दू शायरी की सबसे लुभावनी, लोकरंजक, लोकप्रिय विधा 'ग़ज़ल' के वैविध्य , वैशिष्ट्य और वैचित्र्य का पठन और श्रवण भी अवश्य कर लीजिए -

दुनिया बनी तो हम्दो - सना बन गई ग़ज़ल.
उतरा जो नूर नूरे - खुदा बन गई ग़ज़ल.

गूँजा जो नाद ब्रह्म बनी रक्से मेह्रो- माह,
ज़र्रे जो थरथराए सदा बन गई गज़ल.

चमकी कहीं जो बर्क़ तो अहसास बन गई,
छाई कहीं घटा तो अदा बन गई ग़ज़ल.

आँधी चली तो कहर के साँचे में ढ़ल गई,
बादे - सबा चली तो नशा बन गई ग़ज़ल.

हैवां बने तो भूख बनी बेबसी बनी,
इंसां बने तो जज्बे वफा बन गई ग़ज़ल.

उठ्ठा जो दर्दे - इश्क तो अश्कों में ढ़ल गई,
बेचैनियां बढ़ीं तो दुआ बन गई ग़ज़ल.

जाहिद ने पी तो जामे - पनाह बन के रह गई,
रिन्दों ने पी तो जामे - बक़ा बन गई ग़ज़ल.

अर्जे दक़न में जान तो देहली में दिल बनी,
और शहरे - लखनऊ में हिना बन गई ग़ज़ल.

दोहे -रुबाई -नज़्म सभी 'तर्ज़' थे मगर,
अखलाके - शायरी का खुदा बन गई ग़ज़ल.

स्वर - मेंहदी हसन
शब्द - गणेश बिहारी 'तर्ज़'
संगीत - ललित सेन




( 'तर्ज़' से ही शोभा गुर्टू जी के स्वर में एक ग़ज़ल किसी और दिन .आज बस इतना ही.आभारी हूँ कि आपने इस प्रस्तुति को पढ़ा -सुना, वैसे इसमें मेरा योगदान है ही क्या ? )

6 टिप्‍पणियां:

संजय पटेल ने कहा…

सादा ख़याल,सादी गायकी ...
लेकिन ये सादापन कितना कठिन है दादा...
कितनी मुश्किल से ये सादगी फ़राहम होती है.
अहा ! क्या लाजवाब महफ़िल में ले आए आप.
सदक़े.

महेन ने कहा…

ग़ज़ल से ज़्यादा तो लिखे हुए की खुमारी चढ़ गई है मुझे… मेरी मानें तो तफ़सील से यात्रा-वृतांत लिखें।

डॉ .अनुराग ने कहा…

शुक्रिया...मेहंदी हसन को सुनना हमेशा अच्छा लगता है

मीत ने कहा…

आनंद में हूँ.. सच में इस एल्बम का जवाब नहीं ..... इसी की एक ग़ज़ल, शोभा गुर्टू की आवाज़ में .... यहाँ भी है :

http://kisseykahen.blogspot.com/2008/02/blog-post_06.html

"अर्श" ने कहा…

Mehandi hasan sahab mere pasandida gayakon mese hai ...... aapko dhero badhai..swikarkaren......

एस. बी. सिंह ने कहा…

बस इतना कहूंगा कि मेरे तुम्हारे दिल कि सदा बन गई ग़ज़ल ।

शानदार लिखा और जानदार सुनवाया भाई। शुक्रिया