टॉमस ट्रांसट्रोमर विश्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित कवियों में से एक हैं। १९३१ में जन्मे स्वीडन के इस ८० वर्षीय कवि को २०११ के साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा हुई है। उनकी कवितायें दुनिया भर की तमाम भाषाओं में अनूदित होती रही हैं। आइए आज पढ़ते - देखते हैं उनकी कुछ कवितायें :
टॉमस ट्रांसट्रोमर की कवितायें
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )
अप्रेल और चुप्पियाँ
बिसर गया है वसंत
गाढ़ी मखमली वंचनायें
रेंग रही हैं मेरी ओर
बिना किसी परावर्तन के।
अगर चमक रही हैं
कुछ चीजें
तो वे हैं बस पीताभ पुष्प।
अपने ही प्रतिबिंब में
ले लिया गया हूँ मैं
जैसे कोई वायलिन बंद हो जाती है
अपने खोल के भीतर।
कोई एक बात
जिसे कहना चाहता हूँ मैं
वह यह कि पहुँच से दूर है दीप्ति
जैसे रेहन की दुकान से
चमकते हैं चाँदी के जेवर ।
तीन हाइकू
खिला है वनपुष्प
फिसल रहे हैं तेल - टैंकर्स परे
और चाँद है पूर्ण।
*
मध्यकालीन दुर्ग
पराया शहर, अडोल सिंह - मानव
निचाट रंगभूमि।
*
और प्रवाहमान है रात
पूरब से पच्छिम की ओर
समय में यात्रारत चाँद के साथ।
----
( टॉमस ट्रांसट्रोमर की कुछ कवितायें 'कबाड़ख़ाना' पर )

8 टिप्पणियाँ:
सुन्दर अनुभव !महान रचनाकार से परिचित कराने का आभार !
और प्रवाहमान है रात
पूरब से पच्छिम की ओर
समय में यात्रारत चाँद के साथ।
टॉमस ट्रांसट्रोमर की रचनाओं और उनसे परिचय कराने के लिये धन्यबाद. आपके अनुवाद ने भी उन कविताओं में प्रस्तुत विचारों को बिखरने नहीं दिया है. बहुत बधाई.
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!यदि किसी ब्लॉग की कोई पोस्ट चर्चा मे ली गई होती है तो ब्लॉगव्यवस्थापक का यह नैतिक कर्तव्य होता है कि वह उसकी सूचना सम्बन्धित ब्लॉग के स्वामी को दे दें!
अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
I recently came across your blog and have been reading along. I thought I would leave my first comment. I don’t know what to say except that I have loved reading. Nice blog. I will keep visiting this blog very often.
जगजीत सिंह आधुनिक गजल गायन की अग्रणी है.एक ऐसा बेहतरीन कलाकार जिसने ग़ज़ल गायकी के सारे अंदाज़ बदल दिए ग़ज़ल को जन जन तक पहुचाया, ऐसा महान गायक आज हमारे बिच नहीं रहा,
उनके बारे में और अधिक पढ़ें : जगजीत सिंह
अनुवाद की बेहतरी से यह वरेण्य कवि हिन्दी पाठकों के लिए भी आकर्षण का विषय बना गया है। आभार।
"वह यह कि हैं पहुँच से दूर है दीप्ति.."-इस वाक्य में ’हैं’ और ’है’ की जुगलबंदी अजीब लग रही है।
धन्यवाद, हिमांशु जी!
’हैं’ और ’है’ की गलती की ओर ध्यान दिलाने के लिए आभारी हूँ। आपने यहाँ का पगफेरा किया मन प्रसन्न हो गया।
अनुवाद प्रभावी और काव्यात्मक बन पड़े हैं ! बधाई !!
सुन्दर अनुवाद!
एक टिप्पणी भेजें