शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

दिन तर रहेगा ऊष्मा से :धूप मुबारक !

आज कितने - कितने दिनों बाद कायदे से धूप खिली है। सुबह से ही कुहरा गायब - सा था। तभी उम्मीद जग गई थी कि आज का दिन सचमुच चमकीला होगा। भीषण सर्दी से कुछ राहत मिलेगी और बदन का जोड़- जोड़ कुछ खुलता हुआ - सा लगेगा। आज रोज की तरह दस बजे के आसपास बिजली भी नहीं गई।छुट्टी है ,सो धूप सेंकने की (नेक) नीयद से  काम - धाम भी जल्दी समेट लिया गया। मैं अभी कमरे में कंप्यूटर पर कुछ खटर - पटर किए जा रहा हूँ जबकि सब छत पर धूप से रू-ब- रू हैं।अंचल जी दो - तीन बार आवाज लगा चुके हैं कि छत पर आ जाओ मम्मी बुला रही हैं ( मम्मी या धूप !)। पोस्टमैन अभी - अभी डाक दे गया है। लिफाफे बता रहे हैं  एक के भीतर एक पत्रिका है और दूसरा कुछ ऑफिशियल काम जैसा लेकर आया है। और नहीं अब और नहीं, घर के अंदर अब और नहीं। धूप बुला रही है - सबको धूप मुबारक ! अभी , बिल्कुल अभी लिखी गई  इस कविता के साथ ....


धूप मुबारक

कल कुछ कम थी
आज खुलकर खिल रही है धूप
कुहरा उड़ गया
बनकर पतंग
आसमान के नीले कैनवस पर
बिखर रहे हैं चटकीले रंग।

खुश हैं सब
पेड़ों ने फैला दिए हैं पत्तियों के पंख
अकड़ कर इतरा रही हैं गेहूँ की बालियाँ
महसूस की जा सकती है
हर शै में एक सुरीली लय।
छत पर निकल आए हैं रजाई - गद्दे
धुले कपड़ों को महसूस नहीं हो रही है ठंड
देखो तो
आज सभी को सुलभ हुआ है
सुख का सानिध्य।

दिन तर रहेगा ऊष्मा से
उनींदी नहीं होगी उजास
शाम देर रहेगी चहल - पहल
और  जब गहराएगी रात
तब भी
बची रहेगी सूरज की आँच।

14 टिप्‍पणियां:

पूर्णिमा वर्मन ने कहा…

बहुत बढ़िया। धूप मुबारक

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति..मकर संक्रांति पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ....

पारुल "पुखराज" ने कहा…

धूप खिलनी बहुत-बहुत ज़रूरी ..छत पर , मन पर.. सभी ओर

Rangnath Singh ने कहा…

आपको भी धूप मुबारक :-)

नीरज बसलियाल ने कहा…

यार, हमारे ऑफिस में आज छुट्टी नहीं है :( और इस शहर में सर्दी भी वैसी नहीं थी | खैर तुम्हे दोनों चीजें मुबारक |

राजेश उत्‍साही ने कहा…

मुबारक हो।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

खिली हुई धूप को शब्दों के माध्यम से बहुत खूबसूरती से परोसा है आपने!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वातावरण में धूप की गुनगुनाहट है।

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत बढ़िया। धूप मुबारक|

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

कविता में ही सही,
गेहूँ पर बालियाँ
और
बालियों पर गदराहट
दिखाई देने लगी है!
--
वेरी नाइस अभिव्यक्ति!

Er. सत्यम शिवम ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचना.....बधाई...

mridula pradhan ने कहा…

bahut achchi lagi aapki samyik kavita.

alka sarwat ने कहा…

सच ये मौसम तो दिल को खिला देता है

Vivek Rastogi ने कहा…

बहुत ही अच्छी कविता प्रकृति के रंग बिखेरती हुई