मंगलवार, 30 नवंबर 2010

तुम दफ़्न करो मुझे और मैं दफ़नाऊँ तुम्हें


I have brushed my teeth.
This day and I are even.
                              -Vera pavlova

वेरा पावलोवा छोटे कलेवर की बड़ी कविताओं के लिए जानी जाती हैं। उनके पन्द्रह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। संसार की बहुत सी भाषाओं में उनके कविता कर्म का अनुवाद हो चुका है जिनमें से स्टेवेन सेम्योर द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद 'इफ़ देयर इज समथिंग टु डिजायर : वन हंड्रेड पोएम्स' की ख्याति सबसे अधिक है। यही संकलन हमारी - उनकी जान - पहचान का माध्यम भी है। स्टेवेन, वेरा के पति हैं और उनकी कविताओं के ( वेरा के ही शब्दों में कहें तो ) 'सबसे सच्चे पाठक' भी। १९६३ में जन्मी वेरा पावलोवा आधुनिक रूसी कविता का एक ख्यातिलब्ध और सम्मानित नाम है। वह संगीत की विद्यार्थी रही हैं। इस क्षेत्र में उनकी सक्रियता भी है किन्तु बाहर की दुनिया के लिए वह एक कवि हैं - 'स्त्री कविता' की एक सशक्त हस्ताक्षर। लीजिए प्रस्तुत हैं उनकी दो कवितायें -




वेरा पावलोवा की दो कवितायें
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

०१-

'हाँ' कहना

क्यों इतना छोटा है 'हाँ' शब्द
इसे होना चाहिए
सबसे लम्बा
सबसे कठिन
ताकि तत्क्षण निर्णय न लिया जा सके
इसके उच्चारण का।
ताकि बन्द न हो परावर्तन का पथ
और मन करे तो 
बीच में रुका जा सके इसे कहते - कहते।

०२-

निरर्थकता का अर्थ

हम धनवान हैं 
हमारे पास कुछ भी नहीं है खोने को
हम पुराने हो चले
हमारे पास दौड़ कर जाने को नहीं बचा है कोई ठौर
हम अतीत के नर्म गुदाज तकिए में फूँक मार रहे हैं
और आने वाले दिनों की सुराख से ताकाझाँकी करने में व्यस्त हैं।

हम बतियाते हैं 
उन चीजों के बारे में जो भाती हैं सबसे अधिक
और एक अकर्मण्य दिवस का उजाला 
झरता जाता है धीरे - धीरे
हम औंधे पड़े हुए हैं निश्चेष्ट - मृतप्राय
चलो - तुम दफ़्न करो मुझे और मैं दफ़नाऊँ तुम्हें।




7 टिप्‍पणियां:

mrityunjay kumar rai ने कहा…

कर्मनाशा नदी चौसा(बिहार ) और बारा ( उ प्र ) के बीच से बहते हुवे गंगा में मिलती है , कुछ दूर तक ये बिहार और उ प्र के बीच सीमा निर्धारण भी करती है . जिस जगह ये नदी गंगा में मिलती है , वही गंगा के दुसरी छोर पर मेरा गांव (बीरपुर ) है . कहते है ये नदी लार (saliva) से बनी है , इसलिए अपवित्र मानी जाती है .

आपका इस नदी के नाम से ब्लॉग बनाना कुछ समझ नहीं आया ?

'उदय' ने कहा…

... dono rachanaayen prasanshaneey hain ... shaandaar-jaandaar post !!!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दोनों ही कवितायें गहराई से पूर्ण। पढ़वाने का अतिशय आभार।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सारगर्भित कविताओं का बहुत सुन्दर और सशक्त अनुवाद आपने किया है!

अमिताभ मीत ने कहा…

क्या बात है ...... शुक्रिया शुक्रिया इन लाजवाब रचनाओं के लिया !!

सागर ने कहा…

@ MrityunJay Kumar Rai

अपवित्र नदी

फूली हुई सरसों के
खेतों के ठीक बीच से
सकुचाकर निकलती है कर्मनाशा की पतली धारा ।

कछार का लहलहाया पीलापन
भूरे पानी के शीशे में
अपनी शक्ल पहचानने की कोशिश करता है ।
धूप में तांबे की तरह चमकती है
घाट पर नहाती हुई स्त्रियों की देह ।

नाव से हाथ लपकाकर
एक एक अंजुरी जल उठाते हुए
पुरनिया - पुरखों को कोसने लगता हूं मैं -
क्यों -कब- कैसे कह दिया
कि अपवित्र नदी है कर्मनाशा !

भला बताओ
फूली हुई सरसों
और नहाती हुई स्त्रियों के सानिध्य में
कोई भी नदी
आखिर कैसे हो सकती है अपवित्र ?

indianrj ने कहा…

ओह...कितनी गहरे है "हाँ" कविता में. सच में कितना छोटा शब्द लेकिन कितनी ज़िम्मेदारी से भरा हुआ.