रविवार, 7 नवंबर 2010

मन में मोद भरा है फिर भी !

दीवाली,दीपावली,ज्योति पर्व, प्रकाशोत्सव..जो भी कहें अब तो बीत गया। घरों पर बिजली की कृपा से जगमग - जगमग करने वाले लट्टुओं - झालरों - लड़ियों की पाँत अभी उतरी नहीं है। जगह - जगह बिखरे जल - बुझ चुके दीये, मोमबत्तियों की पिघलन और अपनी आभा व आवाज लुटा चुके पटाखों के खुक्खल दीख रहे हैं।अन्न्कूट- गोवर्धन पूजा भी हो ली। आज भाई दूज है। कुछ ही दिनों के बाद छ्ठ पर्व है। उत्सव अभी जारी है। सर्दी अपना रंग दिखने लगी है। ओस और शीत ने भी अपनी नर्म तथा नम उपस्थिति से  मौसम के बदलाव को इंगित करना शुरू कर दिया है। खेत- खलिहानों से होता हुआ नवान्न जिह्वा तक आ चुका है। ऐसे परिवर्नतशील पलों   को महसूस करते हुए  अभी कुछ दिन पहले ही कुछ लिखा है। इसे कविता , गीत , नवगीत कुछ भी कहा जा सकता है। आइए आज , अभी इसे साझा करते हैं :


बीता क्वार शरद ऋतु   आई

बीता क्वार शरद ऋतु  आई।
कार्तिक मास करे पहुनाई।

भंग हुआ आतप का व्रत-तप
बरखा रानी हुईं अलोप
तुहिन कणों से आर्द्र अवनि पर
नहीं रहा मौसम का कोप

पंकहीन मग पर पग धरती
सर्दी करने लगी ढिठाई।
बीत क्वार शरद  ऋतु  आई।

खेतों में अब राज रही है 
नये अन्न की गंध निराली
गुड़ भी आया  नया नवेला
सोंधी हुई चाय की प्याली

दिन हैं छोटे रातें लम्बी
भली लगे दिन की गरमाई।
बीता क्वार शरद ऋतु आई।

राग रंग उत्सव पूजा में
डूब रही है  दुनिया सारी
त्योहारों का मौसम आया
बाजारों में भीड़ है भारी

मन में मोद भरा है फिर भी 
डाह रही डायन मँहगाई।
बीता क्वार शरद ऋतु आई।
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* चित्र : पुनीता  मंदालिया की कलाकृति - 'डांडिया रास'

4 टिप्‍पणियां:

Patali-The-Village ने कहा…

कविता बहुत अच्छी लगी धन्यवाद|

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

मन में मोद भरा है फिर भी
डाह रही डायन मँहगाई।
बीता क्वार शरद ऋतु आई

आधुनिक चित्र..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शरद ऋतु की हल्की ठंडक।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

शायद पहली बार आपकी इस तरह की कविता पढ़ रहा हूँ!
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बहुत बढ़िया लगी मुझे तो!
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यहाँ तो मन मोद है और प्लेट में मोदक!
मगर शुगर होने के कारण खाने में डर लगता है!