मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

'न हो कोई पहचान' और एक पहेली


आज कुछ नहीं , बस्स , बाबा बुल्ले शाह की एक पंक्ति और इस अकिंचन द्वारा किया गया उसका अनुवाद :







चल वे बुल्लेया ! चल ओत्थे चल्लिए ,
जित्थे सारे आन्ने !
ना कोई साड्डी जात पिछाने ,
ते ना कोई सानू मान्ने !


*******


चलो बुल्ला ! चलो वहाँ चलें

जहाँ है अन्धों का जहान!

जहाँ अपनी कोई जाति न पूछता हो

और न हो अपना कोई मान!

***

? ऊपर लगा चित्र क्या है ? अगर पहचान पा रहे हों तो बतायें जरूर !

8 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

कविता का अनुवाद कविता में करने में
आप सिद्धहस्त है!
बहुत बढ़िया अनुवाद किया है जी!

एस. बी. सिंह ने कहा…

बहुत खूब ! बाबा का और आपका दोनों का जवाब नहीं।

Udan Tashtari ने कहा…

अनुवाद से बात समझ आई..


चित्र तो नहीं पहचानते वरना बताने में देर न करते!

पारूल ने कहा…

न बाँचे कोई जात जहां
न पूछे कोई नाम
इंसान,बस इंसान भर
कहने सो हो पहचान
क्या है? क्या सच में है
इस पृथ्वी पर ऐसा कोई
जहान ?


चित्र-किसी पहाड़ी का शायद

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

अत्यन्त सारगर्भित !
अनुवाद बेहतर है । धन्यवाद है ।

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

यह जानकर अच्छा लगा
कि आप पंजाबी भी जानते हैं!
हिंदी जाननेवालों को अच्छी पंजाबी कविताएँ
और
पंजाबी जाननेवालों को अच्छी हिंदी कविताएँ
पढ़ने में आसानी हो जाएगी!
--
"पहेली के रूप में जो दिखाया गया है,
उसे "यहाँ" से लाया जाता है!
फिर काट-काटकर बेचने के लिए
इसी रूप में सजाया जाता है!
अब इसके नाम में क्या रखा है,
जो चाहे, सो बता दे!"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

CaCO3
कैल्शियम कार्बोनेट!
साहब जी!
ये तो मार्बल्स की सिल्लियों के ढेर हैं!
आपके घर के पास ही तो दूकान है!

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

हम तो जी बस बुल्ले शाह को पहचानते है।