बुधवार, 18 नवंबर 2009

'पृथ्वी पर एक जगह' को मंडलोई सम्मान / शिरीष कुमार मौर्य को बधाई !



युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य के कविता संग्रह 'पृथ्वी पर एक जगह' को प्रतिष्ठित लक्षमण प्रसाद मंडलोई सम्मान देने की घोषणा की गई है और यह खबर बहुत प्रमुखता से भाई बोधिसत्व ने अपने ब्लाग 'विनयपत्रिका' पर बहुत महत्व के साथ प्रकाशित की है। शिरीष मेरे पसंदीदा कवियों में हैं और उनके ब्लाग 'अनुनाद' का भी मैं नियमित विजिटर हूँ उनके इस प्रशंसित , सम्मानित कविता संग्रह पर एक समीक्षात्मक आलेख मैंने कुछ माह पूर्व लिखा था जो पाक्षिक पत्र 'नैनीताल समाचार' के १४ - ३१ मई २००९ के अंक में प्रकाशित हुआ था। उसे आज इस खुशी के मौके पर पर यथावत प्रस्तुत कर रहा हूँ हो सकता है कि इससे 'पृथ्वी पर एक जगह' को देखने , पढ़ने और सराहने में हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया के सथियों को किंचित मदद मिल सके। यदि ऐसा भी हो तो शिरीष और उनकी कविता के पाठक इसे एक सूचना का परिशिष्ट भर मान लें।


आज अपने इस साथी , कवि, ब्लागर, रेखाचित्रकार, अनुवादक और शिक्षक की किताब को सम्मानित होते देखना सुखकर है।




पृथ्वी पर एक जरूरी जगह

* सिद्धेश्वर सिंह

यह सुखद है कि पिछले एक - दो वर्षों से हिन्दी की युवा कविता के कई महत्वपूर्ण संग्रह सामने आए हैं. केवल परिमाण की दृष्टि से अपितु गुणात्मकता से भी युवा कविता की एक महत्वपूर्ण उपस्थिति से हिन्दी समाज रू- - रू हुआ है. यहां पर यह भी देखा जाना आवश्यक है कि जब हमारा लगभग समूचा परिवेश अपने ही रचे हुए हाहाकार से हैरत में है हलकान है, तब कविता जीवन और जगत में कितना कोलाहल मचाने में सक्षम हो सकने की स्थिति में है? फिर भी इसमें कोई दो राय नहीं कि समय , समाज और सत्ता के निरन्तर गझिन होते दुराग्रह -दुष्चक्र में व्यक्ति के भीतर संवेदनशीलता , तरावट, तरलता नमी को बचाए रखने की प्रक्रिया में कविता की भूमिका कम नहीं हुई है वरन वह लगातार बढती ही जा रही है. इसी बात को युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य के शब्दों में कुछ इस तरह कहा जा सकता है -

सुन लें वे जिन्हें सुनाई देता है
समझ आता है जिन्हें वे समझ लें अच्छी तरह
कि बोलना
और बोलना सही समय पर सही बात का
बेहद जरूरी है

'पृथ्वी पर एक जगह' शिरीष कुमार मौर्य का नया और क्रम के लिहाज से उनका तीसरा संग्रह है जिसमें कुल इक्यासी कवितायें संग्रहीत है. ऐसे समय में जब आमतौर पर हिन्दी के कविता संग्रह कृशकाय होते जा रहे हैं तब २१५ पृष्ठों की यह किताब धैर्य से पढ़े जाने की मांग करती है. इन इक्यासी कविताओं में अण्तिम हिस्से की तेरह कवितायें विभिन्न रागों पर / रागों से प्रभावित होकर लिखी गई हैं जो एक विलक्षण अनुभूति की अभिव्यक्त छवियाँ हैं.आज की युवा पीढ़ी जब सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ने के शार्टकट के रास्ते पर दौड़ लगा रही दीख रही है और अल्पकाल में ही सब कुछ समेट लेने की जल्दबाजी के प्रति मोहग्रस्त है तब एक युवा कवि की कविता में संगीत की समझ और उसकी संवेदना का सहज , सरल और सान्द्र प्रकटीकरण बहुत बड़ी बात है -

सचमुच गाए बिना भी सुना जा सकता है गीत
जरूरी नही
कि हर चीज़ दे सिर्फ़ कानों से
सुनाई.

शिरीष केवल कवि भर नही हैं उन्होंने विश्व कविता के पटल से येहूदा आमीखाई, ओटो रैने, क्रू सेंग, हंस मानूस एजेंत्सबर्गर टामस ट्रान्सटोमर आदि कवियों की कविताओं के महत्वपूर्ण उल्लेखनीय अनुवाद भी किए हैं. निश्चित रूप से इन अनुवादों से उनकी भाषा और भावाभियक्ति की उर्वरता में वृद्धि हुई है. हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया में कविता और कविता के अनुवाद पर केन्द्रित अपने ब्लाग 'अनुनाद डाट ब्लागस्पाट डाट काम' के माध्यम से अभिव्यक्ति के इस नए माध्यम पर वे अपनी सक्रिय उपस्थ्ति निरन्तर बनाए हुए हैं. साथ ही 'अनुनाद' पत्रिका के संपादक और विश्विद्यालय के प्राध्यापक के रूप में तो वे विद्यमान हैं ही. २००४ में मिले प्रथम अंकुर मिश्र कविता पुरस्कार ने अपने समकालीनों में उन्हें नई पहचान दी है. ऊँचे पहाड़ों से उर्ध्वगामिता , समतल मैदानों से सहजता और ऊबड़ - खाबड़ पठारों से बहुविध विविधता- बहुलता से निर्मित कवि का जीवन उसकी कविताओं में स्पष्ट दिखाई देता है. अपने परिवेश , अपने परिवार, अपने दोस्त -मित्र और अपने निकट के संसार से कवि का गहरा राग यहाँ सतत विद्यमान है . 'गालियाँ' , 'रानीखेत से हिमालय' , 'सौराल', 'बारह बरस बाद अपने गाँव में', 'दोस्तों के डेरे पर एक शाम' , 'गैरसैंण' , 'इटारसी भुसावल पैसेंजर', 'दादी की चिठ्ठियाँ', ' बेटे की स्कूली किताबें देखते हुए' जैसी कवितायें कवि के अनुभव जगत का एक ऐसा कोलाज़ पेश करती हैं जो कि दरअसल हमारे हिस्से की वह दुनिया है जिसके सबसे निकट रहते हुए भी हम सब उसी के बारे में शायद सबसे कम जानते हैं और अगर जानते भी हैं तो सबसे कम बात करते हैं. जिन चीज़ों से हमारी दुनिया बनती है उसी दुनिया के एक - एक रेशे को उधेड़कर दोबारा बुनना एक यंत्रणादायक - यातना भरी प्रक्रिया है , वैसे देखा जाय तो रचना एक यातना ही तो है , बाहर से भीतर और भीतर से बाहर के संसार के बीच अव्यक्त को व्यक्त करने का एक पुल या सेतु. इस संग्रह से गुजरते हुए निस्संकोच कहा जा सकता है कवि ने अपने अपने परिवेश को बखूबी जिया है , उसे शाब्दिक अभिव्यक्ति में अवतरित करने की यंत्रणा झेली है साथ यह भी कहा जाना जरूरी है उसकी अभियक्ति में ईमानदारी की गहरी छाप देखी जा सकती है

कुछ भी हो मगर वे होती है
और हम भी बसायें उन्हें तो वे होंगी
जैसे हम ना भी करें प्रेम तो वह होगा
हमारे लिए जीवन में कहीं कहीं

'पृथ्वी पर एक जगह' में अधिकतर बड़े कलेवर की कवितायें हैं जिन्हें हिन्दी की प्रचलित शब्दावली में लंबी कवितायें कहे जाने की परिपाटी है. अब यह भी क्या खूब है कि समय के हमारे इस हिस्से में चीजें जितनी सूक्ष्म और सूक्ष्मतर होती जा रही हैं उसी के विपर्यय अनुपात उनके बारे में कहे जाने की जरूरत विस्तृत और विस्तीर्ण होती जा रही है. कवि अपने समय के इस विपर्यय को पहचानने , परखने और प्रस्तुत करने के काम में सन्नध दिखाई देता है उसका मानना है कि दुनिया सिर्फ वही नहीं है जो दिखाई देती है , एक वह दुनिया है जिसमें हम सब रहते भी हैं और उससे बाहर और परे होने का भ्रम भी पाले हुए हैं.कविता का एक बड़ा काम है भ्रमभंग और उसके भग्नावशेषों पर एक निर्मल , निष्कलुष, साफ , सहज, संवेदनशील,सरल दुनिया की निर्मिति के पथ का अन्वेषण. कवि शब्दों के संसार में विचरण करते हुए एक ऐसी ही दुनिया के निर्माण का रास्ता तलाश करता हुआ दिखाई देता है. वह दुनिया को बदलने के लिए उतना आतुर - आकुल नहीं दीखता है जितना कि आज से कुछ समय पहले की हिन्दी कविता दिखाई देती थी और अक्सर ( बकौल गोरख पांडेय ) 'अक्षर -अक्षर शब्द -शब्द से छापामार' करती हुई नजर आती थी .वह उस समय का मुहावरा तो था , उस समय बदलते हुए वैश्विक परिवेश में बदलाव की उपस्थिति सतह पर आनी जरूरी भी थी किन्तु आज के गुंफित समय में बदलाव का बहाव तल में अधिक है तट सतह पर प्राय: कम और बहुत कुछ गोपन, अनिर्वच तथा अगोचर भी. गोपन को अगोपन, अनिर्वच को व्यक्त और अगोचर देखने की समझदारी में हस्तक्षेप करती हुई इस महापृथ्वी पर गतिमान एक दुनिया है जो इन कविताओं के माध्यम से प्रकट होती है

बच्चो !
गाय पर निबन्ध लिखना
तो दूध का ज़िक्र करना
डाकिए पर निबन्ध लिखना तो चिठ्ठी का जिक्र करना
लेकिन कभी लिखना पड़े
मुल्क के सबसे अच्छे शहर के बारे में कोई निबन्ध
तो पन्ना खाली छोड़ देना
क्योंकि वो
अभी बसा ही नही है कहीं

इस किताब के ब्लर्ब पर हमारे समय के प्रमुख कवि और उभरते हुए समर्थवान आलोचक पंकज चतुर्वेदी ने एक जगह लिखा है - ' शिरीष की रचनाओं में ताजा , स्वस्थ, निर्मल और अकुंठित सौन्दर्य है , जो चीज़ों के निकटस्थ निरीक्षण और आत्मीय अनुचिंतन से जन्मा है. उनमें बिम्बों के अंतराल की काफी अच्छी समझ है, मात्रा और अनुपात की अचूक और संतुलित दृष्टि है और एक उमड़ता हुआ भावुक आवेग , पर वह उसी समय वैग्यानिक चेतना से अनुशासित है.' आज की हिन्दी युवा कविता पर प्राय़: यह आरोप लगाया जाता है कि वह भाषा के चरखे पर बहुत महीन कताई करती हुई दिखाई देती है , संभवत: इसीलिए पढ़ने लिखने वालों की व्यापक दुनिया का हिस्सा बनने में कहीं पीछे भी रह जाती है लेकिन यह सच है कि ऐसा कहते हुए हम कविता के भाव और शिल्प जगत के साथ ज्यादती तो करते ही हैं , कविता से कुछ अधिक - अतिरिक्त माँग भी कर जाते हैं. प्रत्येक कवि अपनी आँख से अपनी दुनिया को देख - परख - पहचान रहा होता है और चूँकि उसकी आँख समय की प्रतिनिधि आँख होती है, सबको [पता है कि समय कोई रुकी हुई चीज़ नहीं है, इसलिए कविता की काया में तात्कालिकता के लक्षण तलाश करना बहुत वाज़िब नहीं होता. इस आलोक में शिरीष के प्रस्तुत संग्रह की कुछ कवितायें अगर किंचित गूढ़ और तनिक गुरु - गंभीर - गहरी लगती हैं तो यही कहा जा सकता है समय की बहती हुई अविराम नदी में उनका जल उलीचने के लिए हथेलियों का जुड़ाव होना अभी शेष है .साथ ही यह भी कि यदि कुछ कवितायें जैसे 'शनि', ' बनारस से 'निकला हुआ आदमी', 'टीकाराम पोखरियाल की वसंत कथा' आदि को पढ़ते हुए यह लगे कि इनके कलेवर को कुछ समेटा जा सकता था तो एक पाठक के नाते कम से कम मुझे तो यही लगता है कि हर एक छोटे -से बीज के के भीतर एक छतनार वृक्ष छिपा हुआ होता है , कवि उसकी जड़ों के साथ तने -टहनियों ,पत्तियों को ही नहीं देख रहा होता है बल्कि उसकी छाया में सूखती -छीजती पत्तियों की ओट तले अपने जगह बनाती हुई चींटियों पर भी पैनी और आत्मीय निगाह बनाए रखना कवि होने की अनिवार्य शर्त है


'पृथ्वी पर एक जगह' एक ऐसा कविता संग्रह है जिसपर केवल वाह और आह कहकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है. मेरी अल्पबुद्धि के हिसाब से एक अच्छी कविता का गुण यह भी है कि एक संवेदनशील- सहृदय-सजग पाठक के निकट पहुँचकर वह दोबारा और बार -बार निर्मित होती है, पाठक उसका आस्वादक -भावक भी होता है और पुनर्सर्जक भी.एक पाठक की हैसियत से मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिन लोगों के लिए कविता मन बहलाव की चीज़ भर नहीं है और जीवन - जगत की तमाम तरह की प्रतिकूलताओं के बावजूद जो लोग अपने भीतर नमी , तरलता और तरावट बचाए रखने के लिए सदैव बेचैन - से रहते हैं उन्हें इस संग्रह की कवितायें कतई निराश नहीं करेंगी.
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पुस्तक : पृथ्वी पर एक जगह / कवि : शिरीष कुमार मौर्य / प्रकाशक : शिल्पायन ,१०२९५, लेन नं -१ ,वेस्ट गोरखपार्क, शाहदरा , दिल्ली-११००३२ / मूल्य : २५० रुपये
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( समीक्षा से पहले छपा रेखांकन शिरीष जी का ही बनाया हुआ है )

8 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

शिरीष कुमार मौर्य जी को बधाई !

vijay gaur/विजय गौड़ ने कहा…

शिरीष को बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।

पारूल ने कहा…

यही लगता है कि हर एक छोटे -से बीज के के भीतर एक छतनार वृक्ष छिपा हुआ होता है , कवि उसकी जड़ों के साथ तने -टहनियों ,पत्तियों को ही नहीं देख रहा होता है बल्कि उसकी छाया में सूखती -छीजती पत्तियों की ओट तले अपने जगह बनाती हुई चींटियों पर भी पैनी और आत्मीय निगाह बनाए रखना कवि होने की अनिवार्य शर्त है।

बढ़िया समीक्षा ...संकलन की हर कविता अपने में अनूठी/पूर्ण है ..कई कवितायें हैरत में डालती हैं ... कई काफ़ी बेचैन करती हैं ..

विनीता यशस्वी ने कहा…

Bahut Bahu shubhkamnaye...

गौतम राजरिशी ने कहा…

शुक्रिया सिद्धेश्वर जी, इस समीक्षा को यहाँ डालने के लिये...वर्ना हम जैसे पाठक तो अछूते रह जाते!

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

क्या कहूँ जवाहिर चा... अपने हमेशा ही सराहा- बढाया है - आपकी ये समीक्षा ही नही, इसके अलावा भी आपका कहा मेरे लिए बहुत अहम् रहा है. मैं हैरत में हूँ कि आपको मेरा ये पुरातन रेखांकन कहाँ से मिला ! आपके हाथ अपनी पीठ पर महसूस करता हूँ. बधाई देने वाले सभी साथियों का आभार.

रागिनी ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा सर आपने शिरीष जी की कविता पर. उन्हें सम्मान मिलने की बधाई.

leena malhotra ने कहा…

shireesh ji ki kavitayen main aksar padhti rahti hoon aur mujhe unki kavitayen bahut pasand hain.. aapne unki kavitao par jo likha hai vah unhe padhne me adhik vistaar dega.. abhaar.