मंगलवार, 21 जुलाई 2009

ब्लागर - तितली संवाद

कल शाम की चाय पीते समय फुरसत के पलों में एक तितली आसपास मँडराती रही , तुलसी के सूखे डंठल पार बैठ - बैठ अपनी फोटो खिंचवाती रही। उससे कुछ बातें हुईं, आइए आप भी देखिए -

ब्ला० - तितली रानी - तितली रानी
बोलो क्या हो गई परेशानी
फूलों पर तुम मँडराती हो
आज ठूँठ से छेड़ाखानी ?

तित० - ना यह खेल ना ही कौतुक
ना ही कोई छेड़ाखानी
गर्मी से बेहाल हुई हूं
जाने कब बरसेगा पानी !

7 टिप्‍पणियां:

राजेश स्वार्थी ने कहा…

यही सबकी परेशानी है वहाँ..

Udan Tashtari ने कहा…

बस इसी तितली संवाद को बच रहे हैं ब्लॉगर...बकिया तो कोई संवाद स्थापित कर नहीं रहा. :)

एस. बी. सिंह ने कहा…

तुलसी और तितली । वाह !

अनूप शुक्ल ने कहा…

सुन्दर संवाद!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

तितली पानी की आशा में दर-दर घूम रही है।
फर-फर उड़कर सावन में ठूँठों को चूम रही है।।

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

सुंदर संवाद!
सामयिक भी और प्रासंगिक भी!
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तितली न तो बोलती है
और
न ही पानी पीती है!
फिर भी हम सब
उससे कितना बतिया लेते हैं
और
अपनी बात उसके मुँह से
कहलवा लेते हैं!