शनिवार, 25 जुलाई 2009

परिन्दा





आज सुबह - सुबह एक शे'र उभरा है . देखते हैं शायद शाम तक ग़ज़ल पूरी हो जाय. अर्ज किया है -

परिन्दा अपने पर खुजला रहा है.
कोई मेहमान शायद आ रहा है .

5 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मेरे आँगन में कागा बोलता है,
सन्देशा सुख का कोई ला रहा है।

Parul ने कहा…

परिंदा बेसबब बेचैन ना है
कोई पहलू से उठ कर जा रहा है

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

:) Aap ka matla to hai hi achcha Parul ka sher quabil-e-gaur hai.

M VERMA ने कहा…

अभी अभी एक चीख उभरी है
मासूम पर कोई जुल्म ढा रहा है

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

खग जानै खगही कर भाषा बडे भईया. हमें तो शेर-चीतों से डर लगता है.