रविवार, 14 जून 2009

अमलतास से दो बातें

घर से बाजार के बीच गुलमुहर के कई वृक्ष हैं किन्तु अमलतास का केवल एक . अब जबकि गर्मियाँ अपने पूरे जोर पर हैं और तब दुपहर में लगभग निचाट -से रास्ते पर लाल -लाल पंक्तियों के बीच स्वर्णवृक्ष अमलतास को देखना एक सुखद अनुभव होता है -कुछ खेल जैसा. अब धीरे -धीरे आसमान में बिखरा हुआ सोना हरा होने लगा है. अमलतास पर नई पत्तियाँ आ रही हैं, यह अगली गर्मियों में सोना बिखराने की तैयारी की शुरुआत है शायद . जो भी हो इस प्यारे अमलतास ने हाल ही में दो कवितायें तो लिखवा ही लीं. लीजिए प्रस्तुत हैं : 'अमलतास से दो बातें' -


अमलतास से दो बातें

१-

जैसे - जैसे
बढ़ता जाता है धूप का ताप
और मौसम को लग जाता है
कोई अनदेखा - अनचीन्हा पाप
वैसे - वैसे
तुम्हारी हर कलिका से उभरता है अनोखा उल्लास
देखा है - सुना है
तरावट के बिना
पत्रहीन होकर नग्न हो जाते हैं गाछ
तब तुम्हारे ये दिव्य वस्त्राभरण
बताओ तो किस करघे पर काता गया
यह मखमली रेशम - जादुई कपास.

भरी दोपहरी में
जब गहराता है आलस का अंधियारा
दोस्त ! तुम्हीं तो ले आते हो
थोड़ी रोशनी - थोड़ा उजास.


२-
अक्षांश - देशान्तरों की सीमा को झुठलाकर
आखिर कहाँ से - किस दिशा से आते हैं
इतने चटकीले पीले रंग
छटायें एक से एक शानदार
कुछ हल्की - कुछ गाढ़ी
कुछ अलग - सी आभा बिखेरने को तैयार.

जब वनस्पतियों से
सूखने लगता है जिजीविषा का आसव
मच जाता है हाहाकार
तब होता है तुम्हारा अवतार
घाम में सीझती हुई प्रकृति
करती है सोलह सिंगार !


( ये कवितायें अमलतास के सुंदर चित्रों के साथ रावेन्द्र रवि जी के ब्लाग 'सरस पायस ' पर भी प्रकाशित हैं , शुक्रिया रवि जी )



5 टिप्‍पणियां:

M VERMA ने कहा…

अक्षांश - देशान्तरों की सीमा को झुठलाकरआखिर कहाँ से - किस दिशा से आते हैं
vaah kya baat hai.

अशोक पाण्डेय ने कहा…

हां...ऐसा ही तो लगता है तपती धूप में अमलतास और गुलमोहर के वृक्षों को देखकर... मानो 'घाम में सीझती हुई प्रकृति करती है सोलह सिंगार।'

mehek ने कहा…

bahut hi sunder

परमजीत बाली ने कहा…

सुन्दर रचनाएं है।बधाई।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

'अमलतास से दो बातें'
अपने में बेजोड़ प्रस्तति है।