शनिवार, 13 जून 2009

रसना विलास



यह कविता १० अप्रेल २००९ को लिखी गई थी. क्यों / कैसे लिखी गई यह कविता के भीतर ही दीख रहा है. समझ में नहीं आ रहा था कि इसका क्या किया जाय ? आजकल जबकि बाजार में आम की आमद - आमद है तब आज मन हुआ है कि इसे 'कर्मनाशा' पर प्रकाशित कर दिया जाय.तस्वीर उसी / उन्हीं आम की है जिन्होंने यह सब लिखवाया है. खैर, ज्यादा कुछ न कहते हुए प्रस्तुत है कविता : 'रसना विलास' .


रसना विलास

यत्र -तत्र प्राय: सर्वत्र
उभर रही हैं कालोनियाँ
जहाँ कभी लहराते थे फसलों के सोनिया समन्दर
और फूटती थी अन्न की उजास
वहाँ इठला रही हैं अट्टालिकायें
एक से एक भव्य और शानदार.
इस तद्भव समय में
रखे जा रहे हैं उनके तत्सम - संस्कॄत नाम.
ऐसे में आश्चर्य की तरह
ठेले पर दीख गए पीले - चमकीले आम.
पर्यावरण की नुमाइश भर को
बचे -खुचे बाग - बगीचों में
अभी कायदे से गदराये भी नहीं हैं टिकोरे
तब ये प्यारे पीले - चमकीले आम
जैसे सौन्दर्य और स्वाद की एक लहर -
उन्मत्त - उद्दाम.

बताया गया - ये साउथ से आते हैं
साउथ अर्थात तत्सम हिन्दी का दक्षिण - दक्षिणावर्त
और अपनी उर्दू का दक़न या दक्खिन.
वही दक्षिण जिसे अपनी एक कविता में
'जैसे हाथ हो दायाँ अपने तन का'
कह गये हैं युवा कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव.
दक्षिण के और भी कई हो सकते हैं नाम - उपनाम-पर्याय
जैसे इस आम को कहा जा सकता है -
आम्र या रसाल.
यह पीला - चमकीला आम
इसकी संज्ञा है बेगमपल्ली
ठेलेवाले भैया के शब्दों में कहें तो बैंगनफली
अगर कर सकते हैं तो यकीन करें
यह बेगमपल्ली - बैंगनफली
मेरी भाषा के भंडार में मचाये हुए है अजब -सी खलबली.

दक्षिण -
जिधर की यात्रा पर गए
शायद बीत गए हैं अठारह-उन्नीस - बीस साल
दक्षिण -
पुराकथाओं में वर्णित विन्ध्य का उस पार
और भूगोल की किताबों का बहुचर्चित दक्षिणी पठार.
मध्ययुग में यहीं से चलकर आए थे संत आलवार
और उत्तर में उगा था भक्ति का वटवृक्ष छतनार
जिसकी सघन छाया में कविता की कोंपलें फूटी थीं
और हाशिए की दुनिया को मिली थी शब्दों की धार.
सम्मोहित करता है
इस इलाके का साहित्य - संगीत - नॄत्य - गान
मात्र क्षुधा शमन ही नहीं करते
इडली - दोसे -साँभर -वड़ा जैसे करिश्माई पकवान
उत्तर -दक्षिण के दो छोरों के मध्य
सतत सेतु बन जाते हैं ये दॄश्य -अदृश्य उपादान.
फिर भी भारत की भाषा समस्या पर
संगोष्ठियों में सिर धुनते हैं नेता --आचार्य -विद्वान.

दक्षिण देश से आए हैं
ये पीले - चमकीले आम
जिनका भला - सा है नाम
और बिक रहे हैं चालीस रुपये प्रति किलो के भाव.
मंदी के मार से बौराये बाज़ार में
चालीस पार का एक उत्तर भारतीय हिन्दी अध्यापक
दक्षिण की लहर का का देख रहा है बहाव.

दक्षिण -
जहाँ रहा करते थे कवि वेणुगोपाल
अपने एक संस्मरण में जिन्हे
'निखालिस प्रकाश' कह गए हैं
हमारे समय के सजग कवि वीरेन डंगवाल.
यहीं इसी उर्वर प्रदेश में
वली दक़नी के सूफी स्वर का दामन थाम
उर्दू शायरी ने भरी थी शुरुआती उड़ान
सत्य के प्रयोगकर्ता की पावन भूमि में
उसी वली की मजार का कहाँ है नामोनिशान ?
यह समय तद्भव समय है
ऐसा तो होता ही रहता है रोज -रोज
समझदार साथी कहेंगे - आम खाओ क्यों गिनते हो पेड़
क्यों कुरेद रहे हो व्यतीत - अतीत
क्यों खँगाल रहे हो इतिहास.
क्या करूँ - आम आदमी हूँ
कैसे बिसार दूँ आम की बात
इस तद्भव समय में कहाँ से प्रकट करूँ तत्सम शब्द - संसार
रेशमी रेशेदार शब्दों कैसे लिखूँ -
कुछ विशिष्ट - कुछ खास.

देश का दिल दिल्ली
जिससे तुक मिलाती है काली बिल्ली
उसी दिल्ली का एक मुगलिया बादशाह
जिसे कहा जाता है क्रोधी -हठी - धर्मान्ध
दक्षिण जय -विजय अभियान में
उसने चखा था वहाँ का आम
और उसे नाम दिया था रसना विलास
(तद्भव कंठ में तत्सम उल्लास ! )
एक निजी वार्तालाप में
यह जानकारी देते हैं प्रोफेसर मैनेजर पांडेय
हिन्दी के मूर्धन्य आलोचक - मशहूर विद्वान.
मैं क्या - मेरी क्या बिसात
दक्षिण देशीय आम ने
सभी की रसना को विलासी बनया है -
क्या राजा -क्या प्रजा
क्या साहित्यकार - क्या सुलतान.

मेरे प्रिय दक्षिण देशीय आम
तुम्हारी महिमा अनन्त है
यह तुम्हारा ही है पुण्य - प्रताप.
जो हिमालय की तलहट का एक अदना -सा वासी
बिना टिकट - भाड़े - रिजर्वेशन के
समूचा दक्षिण भारत आया नाप.

जय हो !
रहमान के आस्करीय संगीत से
आप्लावित- आच्छादित -आह्लादित - सम्मोहित - कुपित
इस तद्भव समय में
दक्षिण देशीय आम की जय हो !
सिर्फ जेब और जिह्वा भर नहीं है जिनका जीवन
वे जरूर सुन रहे होंगे
उत्तर दिशा के वाद्ययंत्र पर
झंकृत हो रही दक्षिण की लय
जय हो ! सचमुच जय !!




3 टिप्‍पणियां:

naveen kumar naithani ने कहा…

इस तद्भव समय में आम का रसियाना अच्छा लगा.
हैं कहां?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

"रसना विलास"
भारत दर्शन कराती कविता
आम पर खास है।