शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

ये कैसा गोरखधंधा है, ये कैसा ताना -बाना है ?

ब्लाग से कुट्टी तो कभी थी ही नहीं , हाँ लंबी छुट्टी जरूर मार ली । अब इधर आना हुआ है तो लग रहा है सबसे पहले गाना होना चाहिए शायरी और संगीत आपस में मिल जायें तो क्या कहने ! मेरे पसंदीदा शायर हैं - इंब्ने इंशा (१९२७-१९७८) . आज सुनते हैं उनकी एक बेहद लोकप्रिय नज्म ' ये बातें झूठी बातें हैं' । स्वर है आबिदा परवीन का ।

अब इस अद्भुत शायरी और अद्भुत आवाज के बारे में क्या कहा जाय - बस्स सुना जाय -

ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं .
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं ?

हैं लाखों रोग ज़माने में, क्यों इश्क़ है रुसवा बेचारा
हैं और भी वजहें वहशत की, इन्सान को रखतीं दुखियारा
हाँ बेकल -बेकल रहता है, हो पीत में जिसने जी हारा
पर शाम से लेकर सुबह तलक, यूँ कौन फिरे है आवारा ?
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं ?

वो लड़की अच्छी लड़की है तुम नाम न लो हम जान गए
वो जिसके लाँबे गेसू हैं पहचान गए पहचान गए
हाँ साथ हमारे इंशा जी उस घर में थे मेहमान गए
पर उससे तो कुछ बात न की अनजान रहे अनजान गए
ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं ?

जो हमसे कहो हम करते हैं, क्या इंशा को समझाना है ?
उस लड़की से भी कह लेंगे, गो अब कुछ और ज़माना है
या छोड़ें या तकमील करें, ये इश्क़ है या अफ़साना है ?
ये कैसा गोरखधंधा है, ये कैसा ताना -बाना है ?
ये बातें झूठी बातें हैं, जो लोगों ने फैलाई हैं
तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं ?

इस नज्म को गुलाम अली साहब स्वर में मेरी ब्लाग-बाजीगरी के उस्ताद अशोक पांडे 'सुखनसाज़' पर लगभग एक बरस पहले सुनवा चुके हैं । एक बार वहाँ का फेरा लगा लेने में हर्ज क्या है ! आबिदा जी नज्म के कुछ हिस्से ही गाए हैं, पूरी नज्म के लिए 'प्रतिनिधि कवितायें : इब्ने इंशा (राजकमल प्रकाशन ) देखा जाना चाहिए।

4 टिप्‍पणियां:

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

बढ़िया पोस्ट चच्चा! आधी रात को इससे बेहतर और क्या मिल सकता है भटकते हुए किसी को ! आबिदा की जानदार आवाज़ रात को गूंजा देती है !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुबह सुबह इतना अच्छा संगीत सुनाने के लिए धन्यवाद।

रागिनी ने कहा…

आपके ब्लॉग पर पहली बार आई ! आबिदा परवीन जी को सुनना अच्छा लगा! और देखा की शिरीष जी आपको चच्चा कह रहे हैं ? आप क्या उनके चाचा हैं! उन्हीं के ब्लॉग से कर्मनशा पर आई हूँ.

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

इब्ने इंशा जी का झूठा सच ,सच में बहुत खूबसूरत है और उस पर आबिदा जी की प्रस्तुति ने कमाल ही कर दिया है !बहुत खूब ,पर हमारे लिए तो यही सच है कि.." ये बातें सच्ची बातें है , सिद्धेश्वर ने फैलाईं हैं " (इंशा जी से क्षमा याचना सहित )