शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

अपना घोंसला



आज वेलेन्टाईन डे पर

घर से दूर

याद कर रहा हूँ

अपना चौका

अपना बेलन !

रोटी की गमक

तरकारी की तरावट

और उसे.. उसे

जिसने आटे की तरह

गूंथ दिया है खुद को!

प्रेम क्या है पता नहीं

वह अगर इंसान होता होगा

तो ...

उसे तुम जैसा ही होना चाहिए !


11 टिप्‍पणियां:

मीत ने कहा…

आह ! इस स्मृति को प्रणाम !

Manish Kumar ने कहा…

सुंदर...

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

बहुत उम्दा लिखा है।

mehek ने कहा…

bahut sundar

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

बहुत उम्दा लिखा है।

.....हेपी वैलेंटाइन

विनीता यशस्वी ने कहा…

Sabse alag...sabse achha...

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत बढिया.....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

याद बहुत आता है,घर का चूल्हा, चौका, रोटी।
प्रेम-दिवस पर झूम रही है,मन में बिन्दी, चोटी।

प्रणय-दिवस पर किसी तरह,
मन को आबाद किया है।
कुछ शब्दों को लिखकर,
मैने उनको याद किया है।

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

वाह साब जी ! कल रात ये सब लिए घूम रहे थे माल रोड पर मेरे साथ !

भौजी को चरण स्पर्श वाला प्रणाम !

एस. बी. सिंह ने कहा…

बिलकुल सच !

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

सभी ऐसे भाग्यशाली नहीं होते जिनके लिए कोई गूँथ दे ख़ुद को आटे की तरह !,जो हैं प्रणम्य है वो !