गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

कौन जोहे बाट किसी पागल मधुमास का



गाँव गया लौट आया
बस यही बात खली
चुक रहा है आकर्षण रक्तिम पलाश का.

महुए की नग्न देह सोने के फूल
जादू के हाथ कैसे जायें इन्हें भूल
गँवईपन रूठ गया
ऐसी बतास चली
अब कोई अर्थ नहीं स्वप्निल तलाश का.

दरपन की आँख में मौसम गदराया
फिर भी निठुर कोई पास नहीं आया
बन्द भई खुलते ही
हिरदय की प्रेम गली
कौन जोहे बाट किसी पागल मधुमास का.

डूब गया बिन देखे संयम - सनेह
अब तो रीती गागर जैसी यह देह
जीवन बस इतना ही
एक चिता अधजली
कौन छुए अंतस्तल अनजानी आस का.

गाँव गया लौट आया
बस यही बात खली
चुक रहा है आकर्षण रक्तिम पलाश का

14 टिप्‍पणियां:

एस. बी. सिंह ने कहा…

सच है पलाश का आकर्षण चुक रहा है। अब तो महुए की जगह बबूल ने और पलाश की जगह बांस और यूकेलिप्टस ने ले ली है। गाँव और गवईपन सब बीती बातें हैं अब तो बस उनके विद्रूप खँडहर बचे हैं...

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

आंचलिक शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है!

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

शीर्षक मनभावन है!

मीत ने कहा…

वाह ! सर जी .. आज सारा दिन दफ्तर की आपाधापी में बीता ..... यहाँ आ कर ...... मधुमास ..... क्या बात है !!

PD ने कहा…

भैया! हमने तो जाना ही नहीं कि मधुमास क्या होता है, स्वर्णिम खेत क्या होते हैं और उसका आकर्षण क्या होता है?
रहे बिहार में ही मगर हमेशा शहरों में.. हाइवे से गुजरते हुए, ढाबा पर रोटियां तोड़ते हुए कुछ अनुभव हैं उन खेतों के.. मगर वही अनुभव बेजोड़ रहा है..

Udan Tashtari ने कहा…

गाँव गया लौट आया
बस यही बात खली
चुक रहा है आकर्षण रक्तिम पलाश का


-क्या कहें-एक सा अनुभव है. बहुत सुन्दर भावभीनी रचना. बधाई.

महेन ने कहा…

बहुत सुंदर गीत है. मुझे तो लगा था हिन्दी साहित्य से गीतों का अवसान हो गया है. आपने भरम तोड़ दिया. चचा को सलाम.

महेन ने कहा…

बहुत सुंदर गीत है. मुझे तो लगा था हिन्दी साहित्य से गीतों का अवसान हो गया है. आपने भरम तोड़ दिया. चचा को सलाम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मन में आशायें लेकर के, आया है मधुमास,
किन्तु नही बुझ पाती है, चंचल भँवरे की प्यास।।

KK Yadav ने कहा…

दरपन की आँख में मौसम गदराया
फिर भी निठुर कोई पास नहीं आया
बन्द भई खुलते ही
हिरदय की प्रेम गली
कौन जोहे बाट किसी पागल मधुमास का.
.....Madhumas ka khubsurat agaz !!

poemsnpuja ने कहा…

बहुत ही खूबसूरत लिखा है. पर पलाश का आकर्षण अभी चुका नहीं है, अभी भी कुछ लोग उन दहकते जंगलों की याद आंखों में बसाये हुए हैं. इस पागल मधुमास के बाट जोहना! अद्भुत बात कही आपने.

Manish Kumar ने कहा…

बन्द भई खुलते ही
हिरदय की प्रेम गली
कौन जोहे बाट किसी पागल मधुमास का.

मन को भा गई ये पंक्तियाँ !

अजित वडनेरकर ने कहा…

सुंदर सुंदर बहुत सुंदर....

बेनामी ने कहा…

hi, good one...thanks for posting the same.

which application r u using..? Google indic transliteration gives only to type Indian languages but doesn't provide formatting. Do you have any idea of having both?
by the way i was searching for the same and found 'quillapd' do u use the same...?