शनिवार, 27 सितंबर 2008

पटना से बैदा बोलाइ द हो नजरा गइनीं गुइयां....


आज सुबह पता नहीं कैसे इस गाने की याद आ गई. शायद रात में कोई सपना देखा होगा. पद्मश्री शारदा सिन्हा जी के गीतों को सुनते- सुनते कब गदहपचीसी पार हो गई और दुनियादारी से साबका-सामना हुआ पता ही नहीं चला-यह कहना झूठ बोलना होगा-बिल्कुल सफ़ेद झूठ. सबकुछ याद है -एक सिरे से दूसरे सिरे तक. यह याद है अपनी स्कूली पढ़ाई के दिनों तक गांव में न तो सड़क थी और बिजली.हां यह जरूर था कि अपने 'दुआर' पर एक सार्वजनिक पुस्तकालय था जिसका नाम 'आदर्श पुस्तकालय' था जिसकी काठ की आलमारियों में खूब सारी किताबें थी, एक रैक पुरानी पत्रिकाओं का था तथा बनारस से निकलने वाला अखबार 'आज' नियमित आया करता था.वह अपना बचपन,अपनी किशोरावस्था थी जहां किताबें ही नहीं कोई भी कागज 'विद्या माई' था और आपस में हमउम्र लड़के कसम खाने की नौबत आने पर अक्सर 'गऊ कीरे' आदि-इत्यादि कसमें खाने के स्थान पर 'बिदिया माई कीरे' यानि विद्या माता की ही कसम खाते थे. न रही हो अपने बचपन के गांव में बिजली की रोशनी और लालटेन-ढ़िबरी की मलगजी रोशनी ही नसीब में रही हो परंतु यह कहने में फ़ख्र होता है कि अपनी आसपास किताबों की दुनिया थी जहां छापाखाने से छपे अक्षर सीधे दिल-दिमाग पर छपते थे अभ्यास पुस्तिका के पन्नों पर नहीं. लेकिन मैं यह सब क्यों पता रहा हूं ? अतीत का उत्खनन करके आखिर क्या कहना चाह रहा हूं ? मैं तो शारदा सिन्हा जी के गाने की बात कर रहा था.

शारदा जी के गीत जब पहली बार सुने थे तब लगा था कि यह तो अपना खलिस-खांटी उच्चारण है,खास अपनी मिट्टी का सोंधापन.भोजपुरी फ़िल्मों के गीतों में भी यह तत्व कम महसूस होता था.उस समय बिरहा के दंगल और लवंडा नाच नुमा गाने भी आसपास बजते थे लेकिन उन्हें सुनना बिगड़ने और आवारा होने का अलिखित प्रमाणपत्र माना जाता था. इसी दौर में शारदा जी ने अपने स्वर से सम्मोहित किया और हिया को सुखद बयार मिली.संगीत के पारखी लोगों के लिए मेरे ये उद्गार बेहद बचकाने व गलदश्रु भावुकता वाले लग सकते हैं किन्तु मैं तो अपने उन दिनों की बाद कर रहा हूं जब भावुकता ही पूंजी थी. आज भोजपुरी संगीत जो गति और गत्त है उस पर फिर कभी..

शारदा जी को आजकल सुनते हुए जी कुछ उदास हो जाता है.हालांकि उनके अधिकतर गीत खुशी और रागात्मकता के है फ़िर भी इस चंचल- पागल मन के हिरणशावक का क्या कीजे? अगर मुझे आजकल शारदा जी के गीतों को सुनते हुए उफ़नाई कोसी और उसके जल की विकरालता बाढ़ के रूप में दीखने लगती है तो मैं क्या करूं ? और हां, यह मैं पूरे होशोहवास में कह रहा हूं कि ऐसा सिर्फ़ सपने में ही नहीं होता...

चलिए,छोड़िए भी अगर आप इस एकालाप को पढ़कर यहां तक पहुंच ही गये हैं तो और आपके कीमती वक्त में से कुछ चुरा लिया गया है तो इस नाचीज को क्षमा करते हुए सुन लेते हैं पद्मश्री शारदा सिन्हा जी के स्वर मे यह गीत- पटना से बैदा बोलाइ द हो नजरा गइनीं गुइयां....



4 टिप्‍पणियां:

मीत ने कहा…

Sir,

This is sheer joy.

Parul ने कहा…

badhiyaa ..bahut badhiya hai ..khuub gaayaa hua!!

एस. बी. सिंह ने कहा…

मत पूछिए सिद्धेश्वर जी किन दिनों की याद दिला दी । दिन में खलिहान में पुआल के ऊपर जाड़े की धुप में और रात को ढिबरी की रोशनी में किताबें पड़ने का मज़ा गजब था। बिरहा सुन कर और लवंडा का नाच देख बिगडे थे हम भी पर परिस्कार भी हुआ था उसी से। अब के भोजपुरी गीत सुन सर धुनने को ही रह गया है। धन्यवाद उन दिनों की याद दिलाने के लिए और शारदा जी का यह गीत सुनवाने के लिए। मै तो आपका फैन बनता जा रहा हूँ।

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

मार्मिक लोकगीत और शारदा जी की गायिकी सुनकर मन कहाँ कहाँ उड़ता फिरता है राम जाने और इस सतरंगी उडान के लिए बधाई भाई सिद्धेश्वर जी !