शुक्रवार, 18 अप्रैल 2008

'पीढ़ी प्रलाप'- आखिर कितना पढ़ा जाय-कितना लिखा जाय?

इस बीच काफी किताबें एकत्र हो गई हैं जिन पर लिखना है-कुछ पत्रिकाओं के लिए,कुछ मित्रों के आग्रह पर और कुछ अपनी रुचि तथा पसंद की वजह से।हर रोज दो अखबार,हर महीने कई-कई पत्रिकायें,कुछ नेट पर खोजबीन.आखिर कितना पढ़ा जाय-कितना लिखा जाय? जब एक छोटे से गांव में रहने वाला मेरे जैसा एक अदना सा कलमघिस्सू परेशान है तब समझ में नहीं आता कि बड़े-बड़े नगरों-महानगरों में रहने वाले बड़े-बड़े लिक्खाड़ अपने टाइम का मैनेजमेंट कैसे करते होंगे? वैसे शायद मेरा यह सवाल या मेरी उत्सुकता बचकानी हरकत हीमानी जाएगी. भई! वे बड़े लोग हैं, उनकी हर बात बड़ी है .वे छींक दें तो खबर बन जाय और चुप रहें अबोला भी बोल उठे! जहां तक लिखने की बात है लगता है कि उनका हाथ साफ हो गया है. उनके हाथ में कलम आते ही कागज पर फर्र-फर्र चलने लगती है.सुना है उन्हें और भी कई काम करने होते हैं-सभा-सम्मेलन,गोष्ठी-परिचर्चा,पद-पुरस्कार,खान-पान-सम्मान...आदि-इत्यादि.अपना तो ज्यादा वक्त कामकाज और नून- तेल-लकड़ी के जुगाड़ में निकल जाता है.अगर कुछ बाकी बचा तो वही लिखने -पढ़ने और संगीत सुनने-सुनाने के लिए पकड़ में आता है,वह भी अक्सर नींद और आराम की बलि देकर.

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि कि बहुत व्यस्त आदमी हूं।कभी-कभार मौका मिलने पर आलस्य का आनंद उठाने से भी बाज नहीं आता हूं.कभी-कभी दीवार पर चढ़ती चींटी को देर तक देखने का आनंद भी ले लेता हूं.लेकिन लिखने-पढ़ने का काम तो पिछड़ ही रहा है.ऐसा नहीं है कि विषयों की कमी है, ऐसा भी भी नहीं है कि शब्द फिसल जा रहे हों लेकिन कहीं तो कुछ है कि सुई अटक जाती है.समकालीन साहित्यिक परिदृष्य के मुख्य पटल पर सक्रिय मित्र कहते हैं कि तुम व्यावहारिक नहीं हो- यू आर नाट प्रेक्टिकल.तुम्हारा मुहावरा पुराना पड़ गया है, बाजार में उसकी कोई कीमत नहीं हैं.अपने आप को प्रेजेंटेबल और सेलेबल बनाओ,तभी कद्र है ,कीमत है ,काबिलियत है.

हमारे हाईस्कूल की हिन्दी की किताब 'गद्य संकलन' में आधुनिक हिन्दी के निर्माताओं में से एक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का एक निबंध था-'क्या लिखूं?'वहां सवाल विषयों के चुनाव का था किन्तु यहां तो सवाल कुछ और है विषय भी हैं उन्हें व्यक्त करने भाषा भी लेकिन फिर भी काम है कि सध नही रहा है।क्या जाने मेरी रचना प्रक्रिया में ही कहीं कोई गड़बड़ है.जब कोई अंतरंग कविताओं की डायरी / फाइल देखता है तो कविताओं के नीचे लिखे समय / तारीख को देखकर चौंकता है.वजह- अधिकतर कवितायें आधी रात के बाद लिखी गई हैं, ऐसे वक्त जब सोने का वक्त होता है!

पस्तुत है 'पीढ़ी प्रलाप' शीर्षक अपनी एक पुरानी कविता जो दो पत्रिकाओं में(एक साथ नहीं) प्रकाशनार्थ स्वीकृत हुई थी लेकिन छपी एक जगह भी नहीं ।पता नहीं इसमें कविता जैसा कुछ है भी कि नही? यह अपने विद्यार्थी जीवनकाल का एक कोलाज भी है और पीछे मुड़कर देखने का उपक्रम भी.चलिए लगे हाथ यह तो बता ही दिया जाये कि यह रात के एक बजकर पचपन मिनट पर लिखी गई थी... खैर॥ देखते हैं इसके बारे में ,अब इतने दिनों बाद पाठकों की क्या राय है!

पीढ़ी प्रलाप


मैं एक साथ कई काम करता हूं
अच्छा लगता है
एक साथ कई कामों को निपटाना.

किताबों की दुकान पर
एक ही दिन

'वर्तमान साहित्य','डेबोनेयर','इंडिया टुडे'और 'रोजगार समाचार' खरीदते
कोई संकोच-कोई आश्चर्य नहीं होता.

लोकसेवा आयोग के आवेदन पत्रों पर
अपना फोटो चिपकाते हुए
पत्र-पत्रिकाओं से काटता रहता हूं
नेताओं,भिखारियों और औरतों की तस्वीरें
ताकि 'माई लाइफ' शीर्षक कोलाज बना सकूं.

फिल्म देखते हुए
नाटक के बारे में सोचता हूं
और नाटक करते हुए
जिन्दगी के बारे में - दार्शनिक की तरह.
कमरे का उखड़ता हुआ पलस्तर
गारा-मिट्टी ढ़ोने वाले मजदूरों की तस्वीर नहीं उकेर पाता
और न ही आंखों में चुभती हैं
देर रात गए तक
मेस की किचन में बरतन साफ करने वाले
पहाड़ी किशोर की ठंडी उंगलियां.
बलात्कार की शिकार औरतों की सहानुभूति में
तख्ती उठाकर जुलूस में शामिल होते हुए
मैं देखना चाहता हूं प्रेमिका का शारीरिक सौन्दर्य.
परिचित-अपरिचितों की शोकसभा में
सिर्फ दो मिनट का मौन मुझे अशान्त कर देता है
लाईब्रेरी में बैठते ही
किताबों के शब्द निरर्थक लगने लगते हैं
मैं भाग जाना चाहता हूं
एवरेस्ट या अंटार्कटिका की तरफ़

दिन भर खटने के बाद
लगता है कि आज कुछ भी नहीं किया
प्रभु!
मुझे जीने का बहाना दो
अब तक मैंने कुछ भी नहीं जिया.

6 टिप्‍पणियां:

जोशिम ने कहा…

मैं इसे रात के बारह बज कर पाँच मिनट पर पढ़ चुका हूँ, और सोच रहा हूँ की कल ऑफिस भी जाना है अलस्सुबह और ये भी कि अगर कोई बड़ा लेखक / समालोचक होता तो शायद पट से ऐसे बोल जाता कि आप सर्जना के प्रसूति काल में होने वाली हार्मोनल अभिक्रियाओं के दौर में हो जिसकी अपनी तंद्रा होती है और शायद जिसकी समकालीन व्याख्या के लिए आप फलाने को पढ़ें और रोज़ सबेरे चार किलोमीटर नितांत अकेले तेज़ कदमों से वर्तमान के चक्कर काटें या फिर .. इत्यादि .....इत्यादि... - खैर चुटकी बजा कर - कविता और उसकी प्रस्तावना आनंद बांटने वाली हैं - एक और बात है इस पोस्ट से फिर शुरू हुई - जो जब कर्म में होगी तब पहुंचेगी -
जब तक प्रतिक्रिया पोस्ट होगी अरब देश बारह पचीस हो जाएँगे मतबल भारत के एक बजकर पचपन रात के - संयोग के लिए कैसा रहा ? - सादर - मनीष

बेनामी ने कहा…

लेख , कविता भी और उस पर मनीषजी की टिप्पणी भी .. अनंद आया

pratyaksha

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा मंथन चित्रण और फिर मनीष जी की मनीषी टिपाणी-बहुत खूब!

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

पहले तो तुमने गजब ढाया चाचा, फिर मनीष जी ने !
कविता बहुत उम्दा !
छापने का अधिकार जिनके पास रहता आया है,उनकी समझ पर कई प्रश्नचिन्ह लगाती हैं - ऐसी कविताएं!
यह इनकी सार्थकता है और सुन्दरता भी !
खटीमा में छोटी सी मुलाकात भी अच्छी रही !
है, ना ?

swapandarshi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
swapandarshi ने कहा…

वाह, वाह
समय की खस्ताहाली यहा भी है. मुझे तो संगीत और रेडियो भी सुनने का टाइम भी ड्राईव करते समय मिलता है आजकल, और कोई नई किताब पढनी हो तो बस पकड्ती हूँ.

खूब याद दिलाई..
तुम्हारे कोलाज़ और अखबार काटने ने बरसो पहले, रात को दो-चार के बीच बनाया हुया, "मेरा भारत महान" वाला SR hostel मे बनाया कोलाज़ याद आ गया!!!!
और जुग़ाड लगाकर एक ही रंगीन तस्वीर थी, वो भी पमेला ईन्डर्सोन की, बाकी सब वार्डेन के गलियारे मे पडे अखबार, और ले दे कर सैटायर की थीम बन गयी. और मज़े की बात कि इस बे सर-पैर के कोलाअ को दूसरा ईनाम भी मिला था.

वो जमाने ऐसे ही थे. हम छोटे शहर के वासियो का अपने आसमान को बडा करने के प्रयास, वो भी अक्सर् आधी रात मे.