सोमवार, 14 अप्रैल 2008

कहां है वसंत:वसंत आते हुए तो दिखा नहीं,क्या आप उसे जाते देख पा रहे हैं?

वसंत यानि मधुऋतु ।वसंत यानि ऋतुओं का राजा,मधुमास,बहार,स्प्रिंग.अरे वही वसंत जिसके आगमन,ठहराव और प्रस्थान को लेकर साहित्य,संगीत,कला के पन्ने के पन्ने रंगे गये हैं.वही वसंत जो मनुष्य की आयु-गणना का मानदंड माना गया है.वही वसंत जिसके आने से आमों में बौर आते हैं,फूल खिलते हैं,कोयल कूकती है,प्रेमियों के ह्र्दय में प्रेम का समुद्र ठाठें मारने लगता है और वे एक दूसरे से पूछते है-'कौन हो तुम वसंत के दूत'! वही वसंत जिसके आने की धमक अब सुनाई नहीं देती और वह अपना रसिया कब कहां ,कैसे कूच कर जाता है पता भी नहीं चलता.

क्या सचमुच वसंत अब भी आता है? या अब ऐसा होता है कि हमारी आंखें उसे देख नहीं पाती हैं? या उसे देख पाने के लिये जिन आंखों की जरूरत होती है वे हमसे छिन गई हैं-छीन ली गई हैं? या कि वे आंखें हमने ही खो दी हैं,या फिर यह भी हो सकता है हमने स्वयं ही मूंद ली हैं अपनी आखें? कहीं कुछ तो गड़बड़ है।लोग कहेंगे सबकुछ दुरुस्त है बस समय नहीं है,फुरसत नहीं है.ठीक भी है, ऐसी चीज के लिए समय कहां जिसका बाजार में कोई मोल नहीं! जिसका न कोई बेचनहार न खरीदने वाला! आज ऐसी चीजों पर बात करने वालों को लोग अजीब-सी निगाह से देखते हैं-गोया किसी लुप्तप्राय प्रजाति के लगभग अंतिम जीवधारी को देखने के भाव से.

वसंत क्या सचमुच 'बस-अंत' की ओर है? या कि मेरा ही दिमाग खराब है जो आज की आपाधापी वाले क्रूर समय में रागात्मकता के तंतुजाल की तलाश कर रहा हूं- इस भयावह समय में एक भावुक उपक्रम? क्या सचमुच कविता और अन्य कला रूपों में ही बचा है वसंत? क्या वही रह गई है उसके सुरक्षित बचे रहने की जगह? क्या जीवन-जगत,प्रकृति-पर्यावरण से उसकी बेदखली का कागज तैयार हो गया है?

इस बरस भी वसंत को बहुत खोजा-किताब,कापियों,डायरियों,फाइलों,सीडी-डीवीडी-कैसेटों से बाहर और परे।जानकार लोगों से खोद-खोदकर पूछा,चश्मे का नम्बर फिर से जंचवाया लेकिन वसंत नजर नहीं आया तो नहीं आया.सोचा बाजार चला जाय, अगर वह वहां बिक रहा हो तो तमाम मंहगाई के बावजूद थोड़ा खरीद कर लाया जाय.आखिर अपनी जरूरत का सामान आदमी खरीद ही रहा है.लेकिन क्या आप विश्वास करेंगे-बाजार में सबकुछ था ,सबकुछ है अपनी दमक,दीप्ति, दर्प और दबंगई से दुनिया-जहान को दुलारता-दुरदुराता. नहीं था, नही है तो वसंत नहीं है- वैसा वसंत जैसा कि मैं देखना चाहता हूं.वैसा वसंत जैसा कि कविताओं,किस्सों,कहानियों,कलाओं में देखा सुना पढ़ा है.आज की जमीन पर खड़े होकर इतिहास के पन्ने पलटते हुए 'मेरा रंग दे बसंती चोला' वाले रंग,रौनक और रोशनी वाला वसंत अब नहीं दीखता.लोग कह रहे हैं उसकी जरूरत क्या है? समय बदल गया है, तुम भी बदलो.कहां चक्कर में पड़े हो मौज करो.खाओ,पीओ मस्त रहो,या दिमाग खराब है तो वसंत को खोजो,कुढ़ो और पस्त रहो.

(मित्रो,वसंत पर यह संवाद/पोस्ट लिखते समय कई कवितायें याद आ रही थीं।कुछ डायरी में लिखी हैं ,कुछ किताबों में हैं और कुछ सीधे जेहन के सीपीयू में.सच मानें इनमें से एक भी अपनी, खुद की लिखी नहीं थीं.शैल मेरे संवाद या किसी भी तरह के लेखन की पहली पाठक-श्रोता होती है,संपादक तो वह है ही.उसने ऊपर लिखे अंश को पढ़कर कहा इसके साथ अपनी कोई कविता लगा दो. अपनी...? मैं संकोच में पड़ गया.शायद तमाम कलमघिसाई के बावजूद इसी संकोच के कारण ही अब तक कोई संग्रह नहीं आ सका है. मई-जून १९९५ में 'आजकल' का 'युवा हिन्दी लेखन' विशेषांक आया था उसी में प्रकाशित अपनी दो कविताओं में से एक 'कहां है वसंत' प्रस्तुत है.शैल ने कहा- उस साल हमारे जीवन में सचमुच वसंत आया था,उसी साल हमारी बिटिया का जन्म हुआ था-गर्मी, धूल-धक्कड़ और लाल मुर्रम वाले शहर बिलासपुर में, जिसके एक सिरे पर बहने वाली नदी 'अरपा' के नाम पर बिटिया का नाम रखना चाहा था.मैं याद कर रहा हूं; जैसे-जैसे तपिश बढ़ती जाती है वैसे-वैसे बिलासपुर की सड़कों पर गुलमुहर और अमलतास की आभा बढ़ती जाती है.यह कई बरस पहले की बात है अब तो तीन-चार सालों से बिलासपुर नहीं जा पाया हूं.इस बार जाना होगा. देखूंगा अब कैसे हैं वहां के गुलमुहर और अमलतास! क्या इस बार वहां आया था वसंत? या फिर वहां भी॥?)

कहां है वसंत

कहां है वसंत
आओ मिलकर खोजें
और खोजते-खोजते थक जायें
थोड़ी देर किसी पेड़ के पास बैठें
सुस्तायें
काम भर ऑक्सीजन पियें
और फिर चल पड़ें.

कहीं तो होगा वसंत!
अधपके खेतों की मेड़ से लेकर
कटोरी में अंकुरित होते हुये चने तक
कवियों की नई-नकोर डायरी से लेकर
स्कूली बच्चों के भारी बस्तों तक
एक-एक चीज को उलट-पुलट कर देखें
चश्मे का नम्बर थोड़ा ठीक करा लें
लोगों से खोदखोदकर पूछें
और बस चले तो सबकी जामातलाशी ले डालें.

कहीं तो होगा वसंत!
आज ,अभी, इसी वक्त
उसे होना चाहिए सही निशाने पर
अक्षांश और देशांतर की इबारतको पोंछकर
उभर आना चाहिये चेहरे पर लालिमा बनकर.

वसंत अभी मरा नहीं है
आओ उसकी नींद में हस्त्क्षेप करें
और मौसम को बदलता हुआ देखें.

5 टिप्‍पणियां:

अतुल ने कहा…

कहीं तो होगा वसंत!
अधपके खेतों की मेड़ से लेकर
कटोरी में अंकुरित होते हुये चने तक
कवियों की नई-नकोर डायरी से लेकर
स्कूली बच्चों के भारी बस्तों तक

अतुल ने कहा…

कहीं तो होगा वसंत!
अधपके खेतों की मेड़ से लेकर
कटोरी में अंकुरित होते हुये चने तक
कवियों की नई-नकोर डायरी से लेकर
स्कूली बच्चों के भारी बस्तों तक

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

बहुत अच्छी कविता है चच्चा !
बिटिया भी प्यारी होगी !
उसे उसके शिरीष चच्चा का प्यार !

Mired Mirage ने कहा…

अच्छी कविता है । असली वसंत तो हमें अपने अंदर ही खोजना होता है ।
घुघूती बासूती

जोशिम ने कहा…

ठुल ददा - तलाश में लगे रहने में हर्ज़ नहीं - बसंत न फूले तो क्या ऑक्सीजन पिलाते शब्द नींद को हिला तो रहे हैं - देखिये
"ले आएँगे वसंत वहाँ / लाएँगे कुछ मिट्टी / जो होगी गीली पनीली/ वहाँ भी जहाँ अब शिशिर दीवारें हैं खोई, खाली रंगीली /सीमेंट की गरम चादरें ठनठनाएंगे, कसेंगे पिंजरों के पेंच हँसते हँसते / बारहमासी कागज़ में सजेंगे नए नरम गुलदस्ते / मिट्टी से लाएंगे वसंत / और मिट्टी को बदलते देखेंगे "