बुधवार, 10 नवंबर 2010

कम नहीं होता है कुरुपताओं का कारोबार

अक्सर ऐसा होता है कुछ पढ़ते - पढ़ते लिखने का मन हो आता है। और जब तक लिख न लिया जाय तब तक लगता है कि अपना कुछ सामान कहीं कहीं खोया हुआ है। लिखने के बाद (भी) लगता है कि जो कुछ सोचा , महसूस किया ( था) उसे रूपायित करने में कितना संकोच  बरत गई भाषा।एक बार फिर आज कुछ शब्द , जिनमें अपने सोचने व होने का अक्स देखा जा सकता है।आइए देखते हैं...


धीरे - धीरे : ०१

धीरे - धीरे आती है शाम
धीरे - धीरे उतरता है सूरज का तेज।

धीरे - धीरे घिरता है अँधियारा
धीरे - धीरे आती है रात।

धीरे - धीरे लौटते हैं विहग बसेरों की ओर
धीरे - धीरे नभ होता है रक्ताभ।

धीरे - धीरे कसमसाती है कविता की काया
धीरे - धीरे सबकुछ होता जाता है गद्य।

धीरे - धीरे
देखती रहती हैं आँखें सुन्दर दृश्य।

फिर भी
कम नहीं होता है कुरुपताओं का कारोबार
धीरे - धीरे ..!

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धीरे - धीरे : ०२


एक रहस्य है
जो खुल रहा है धीरे - धीरे।

एक गाँठ है
जो कस रही है खुलते - खुलते।

एक छाया है
जिसमें पाते हैं हम तीव्र तपन।।

एक नाम है
जिसे कहना जादू हो जाना है।

एक रूप है
जिसमें दिखता है सारे संसार का  अक्स।

एक धैर्य है
जिससे प्रेरणा पाते हैं धरती और आकाश
एक धैर्य है
जो उफनने से रोके हुए है सात समुद्रों को..

वही , हाँ वही
तुम्हारी उपस्थिति के सानिध्य में
टूट रहा  है
धीरे - धीरे !

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

एस.एम.एस बन जाते हैं कँवल

इस समय आधी से अधिक गुजर चुकी रात। रोज की तरह खुद से कहने जा रहा हूँ कि 'चलो अब सो जाओ रे भाई'... क्योंकि सुबह काम पर जाना है। कामकाज के बीच खुद से बतियाना अक्सर कम ही हो पाता है।आज अभी कुछ देर पहले खुद से एक संवाद हुआ है। यह कविता के फार्म में ग़ज़ल भी हो सकती है और नहीं भी क्योंकि 'कवित विवेक एक नहिं मोरे' ..खैर..




आत्म संवाद

चल अकेला, बस यूं ही चलता चल।
बदलना चाहता नहीं , मत बदल।

माना कि आज थोड़ी मुश्किल है,
देखना कल होगी, कुछ राह सहल।

नेमतें लाई है यह बारिश की झड़ी,
डूब जायेंगे सभी सहरा - दलदल।

उसको देखा तो छाँव - सा पाया,
वर्ना छाई थी तेज धूप मुसलसल।

जब भी बजता है मेरा मोबाइल,
एस.एम.एस बन जाते हैं कँवल।

खुद को हलकान किए रहता हूँ,
आओ कुछ बात करें पल - दो पल।

रविवार, 7 नवंबर 2010

मन में मोद भरा है फिर भी !

दीवाली,दीपावली,ज्योति पर्व, प्रकाशोत्सव..जो भी कहें अब तो बीत गया। घरों पर बिजली की कृपा से जगमग - जगमग करने वाले लट्टुओं - झालरों - लड़ियों की पाँत अभी उतरी नहीं है। जगह - जगह बिखरे जल - बुझ चुके दीये, मोमबत्तियों की पिघलन और अपनी आभा व आवाज लुटा चुके पटाखों के खुक्खल दीख रहे हैं।अन्न्कूट- गोवर्धन पूजा भी हो ली। आज भाई दूज है। कुछ ही दिनों के बाद छ्ठ पर्व है। उत्सव अभी जारी है। सर्दी अपना रंग दिखने लगी है। ओस और शीत ने भी अपनी नर्म तथा नम उपस्थिति से  मौसम के बदलाव को इंगित करना शुरू कर दिया है। खेत- खलिहानों से होता हुआ नवान्न जिह्वा तक आ चुका है। ऐसे परिवर्नतशील पलों   को महसूस करते हुए  अभी कुछ दिन पहले ही कुछ लिखा है। इसे कविता , गीत , नवगीत कुछ भी कहा जा सकता है। आइए आज , अभी इसे साझा करते हैं :


बीता क्वार शरद ऋतु   आई

बीता क्वार शरद ऋतु  आई।
कार्तिक मास करे पहुनाई।

भंग हुआ आतप का व्रत-तप
बरखा रानी हुईं अलोप
तुहिन कणों से आर्द्र अवनि पर
नहीं रहा मौसम का कोप

पंकहीन मग पर पग धरती
सर्दी करने लगी ढिठाई।
बीत क्वार शरद  ऋतु  आई।

खेतों में अब राज रही है 
नये अन्न की गंध निराली
गुड़ भी आया  नया नवेला
सोंधी हुई चाय की प्याली

दिन हैं छोटे रातें लम्बी
भली लगे दिन की गरमाई।
बीता क्वार शरद ऋतु आई।

राग रंग उत्सव पूजा में
डूब रही है  दुनिया सारी
त्योहारों का मौसम आया
बाजारों में भीड़ है भारी

मन में मोद भरा है फिर भी 
डाह रही डायन मँहगाई।
बीता क्वार शरद ऋतु आई।
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* चित्र : पुनीता  मंदालिया की कलाकृति - 'डांडिया रास'

गुरुवार, 4 नवंबर 2010

घात लगाए बैठा है अंधकार का तेंदुआ खूंखार







उजास
(एक कविता : एक आस)

हर ओर एक गह्वर है
एक खोह
एक गुफा
जहाँ घात लगाए बैठा है
अंधकार का तेंदुआ खूंखार.
द्वार पर जलता है मिट्टी का दीपक एक.
जिसकी लौ को लीलने को
जीभ लपलपाती है हवा बारंबार.

बरसों - बरस से
चल रहा है यह खेल
तेंदुए के साथ खड़ी है
लगभग समूचे जंगल की फौज
और दिए का साथ दिए जाती है
कीट - पतंगों की टुकड़ी एक क्षीण
जीतेगा कौन ?
किसकी होगी हार ?

हमारे - तुम्हारे दिलों में
जिन्दा रहे उजास की आस
और आज का दिन बन जाए खास !

* 'कर्मनाशा'  के सभी  हमराहियों को दीवाली की मुबारकबाद !.