मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

मैंने अभी तक क्यों नहीं बनाया कोई झाड़ू ?

यह एक छोटी -सी चीज हुआ करती है ; बेहद मामूली ,नितान्त नगण्य। अक्सर इसे निगाहों से दूर छिपाकर , अलोप कर रखा जाता है। अक्सर यह भी लगता है यह बेहद जरूरी चीज भी है। तमाम कूड़ा - कर्कट को साफ करने , बुहारने की बात जब आती है तो याद आता है झाड़ू। एक शब्द के रूप में इसकी अभिधा तो है ही अपनी अन्यान्य (शब्द) शक्तियों के रूप में यह लक्षणा और व्यंजना के बहुविध रूपों में भी हमारे हिस्से की दुनिया में उपस्थित है। आजकल समाचार - विचार की चाक्षुष दुनिया में यह पर्याप्त चर्चा  में है। खैर, आइए ; विश्व कविता के वृहत्तर संसार में प्रविष्ट होते हुए आज पढ़ते हैं साहित्य के  नोबेल पुरस्कार से सम्मानित  चिली  के महान कवि  पाब्लो नेरुदा  (१९०४-१९७३) की  यह कविता : 



पाब्लो नेरुदा की कविता
दोषी

अपने आप को दोषी घोषित करता हूँ मैं
कि दिए गए इन हाथों से
नहीं बनाया एक झाड़ू तक।

मैंने अभी तक क्यों नहीं बनाया कोई झाड़ू ?

मुझे किसलिए दिए गए थे ये हाथ ?

आखिर किस बात के लिए अच्छे हैं वे
यदि मैं अब तक यही करता रहा कि
निहारता रहा कण के घूर्णन को
सुनता रहा हवा को
और पृथ्वी पर बिखरे बेशुमार हरेपने से
इकठ्ठा नहीं किया सींकों को
एक झाड़ू बनाने के निमित्त।
मैंने धूप में सूखने किए नहीं पसारा सींकों को
उनको बाँधा नहीं
एक सुनहले गठ्ठर में
पीले स्कर्ट में हिलगाया नहीं छड़ी को
ताकि बन जाए रास्तों को बुहारने के लिए एक झाड़ू।

तो , इसी तरह चल रहा है सब
आखिर किस तरह निभेगा मेरा जीवन
बिना देखे , बिना सीखे
बिना इकठ्ठा किए, बिना बाँधे
आधारभूत चीजों को ?

अब बहुत देर हो गई इन्कार किए
मेरे पास समय था
था समय
अब भी हाथ कुछ अभाव अनुभव कर रहे हैं
तो किस तरह मैं
लक्ष्य तय करूँगा महानता के वास्ते
अगर मैं समर्थ नहीं था कभी
कि बना सकूँ कोई झाड़ू
कम से कम एक अदद झाड़ू?
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* (अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / चित्र : सर्जियो बुरानी  की  फोटोकृति  , गूगल छवि से साभार)
** इसी ब्लॉग पर पढ़ें नेरुदा की एक और कविता  तुम्हारे पाँव

4 टिप्‍पणियां:

प्रशान्त ने कहा…

शानदार कविता सिद्धेष्वरजी...नेरूदा वाकई लाजवाब हैं!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बढिया अनुवाद।
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झाड़ू बड़े काम की चीज है।...

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (19-12-13) को टेस्ट - दिल्ली और जोहांसबर्ग का ( चर्चा - 1466 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'