बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

आकाश एक समुद्र है : अत्तिला इल्हान की कवितायें

विश्व कविता के अनुवाद के  क्रम में इस ठिकाने पर आप अक्सर कुछ कवितायें पढ़ते रहे हैं। मेरे द्वारे किए गए / किए जा रहे इन अनुवादों का उद्देश्य यह है हिन्दी की कविता प्रेमी बिरादरी के साथ अपने पढ़े - लिखे को साझा किया जाय  ; सहेजा  जाय। आज प्रस्तुत हैं तुर्की कवि , कथाकार, अनुवादक , सिने लेखक अत्तिला इल्हान ( १५ जून १९२५ - ११ अक्टूबर २००५) की कवितायें।


अत्तिला इल्हान :  चार कवितायें  
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)                                                                                                                                                  

०१- प्रतीक्षा

वह बोली प्रतीक्षा करो, मैं आउंगी
मैंने नहीं की प्रतीक्षा , वह आई भी नहीं
यह सब कुछ था मृत्यु की मानिन्द
लेकिन नहीं आई किसी को मौत।

०२- कौन है वह

दरवाजे की बजती घंटी के साथ
मैं दौड़ पड़ा
मैंने खोला द्वार और झाँका
नहीं, कोई नहीं यहा॥

मैंने निश्चित रूप से                      
सुनी थी घंटी की आवाज
जरूर किसी ने बजाया था उसे
क्या यह मैं हूँ
चालीस साल छोटा
जिसे छोड़ा गया था गिरफ़्त से।                                                

०३- मेरा नाम पतझड़

यह कैसे हुआ पता नहीं
चारों ओर झड़ने लगे
रोशनी में तैरते
प्लम की गाछ के पत्ते
तुम जिधर भी देखते हो
धुंधलाई हैं तुम्हारी आंखें

फिर भी
मैं परिवर्तित हो गया शाम में
धीरे - धीरे हौले - हौले
झड़ रहे हैं मेरे पत्ते
मेरा नाम है शरद
मेरा नाम पतझड़।

०४- तुम हो अनुपस्थित

तुम अनुपस्थित हो
यहाँ नहीं है कोई समुद्र
सितारे हैं मेरे मीत
आज की रात कुछ घटित होगा चमत्कार की तरह
या बम की तरह तड़क जाएगा मेरा माथा

कुछ पुरानी कवितायें कंठ में धारण किए, मैं हूँ यहाँ
इस्तांबुल की मीनारें मेरे कमरे में हैं विद्यमान
आकाश है खुला और चमकीला
देखो, हमारे अच्छे दिनों ने आपस में कस ली हैं भुजायें
एक विपरीत हवा बह रही है
एक दूजे से विलग समुद्र तटों पर
फास्फोरस से भरी है रोशनी
आकाश एक समुद्र है
हवा में हैं पंखों की आवाजें
और अबूझ वनैली गंध

यहाँ कोई समुद्र नहीं
सितारे होते जा रहे हैं धूमिल
फिर - फिर मैं अकेला हूँ यहाँ
इस्तांबुल... मीनारें ...सब गुम हो गई हैं कहीं
तुम हो  अनुपस्थित
अब अनुपस्थित हो तुम।
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(चित्र : मेरिएन हार्टन की पेंटिंग 'रेड लुक'/ गूगल छवि से साभार)

5 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

सुन्दर रचनाओं को अनुवाद के रूप में पढ़वाने के लिए आभार सर!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़े ही रोचक उपमान..संस्कृतियों की विशिष्टता।

Pratibha Katiyar ने कहा…

sundar!

Ashok Pande ने कहा…

उम्दा रचनाएँ. उम्दा अनुवाद.

लीना मल्होत्रा ने कहा…

bahut badhiya kvita hai tum ho anupasthit aur pahli kavita.. dono