शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

बीते दिनों का अनबीता बयान

'बीतता कुछ भी नहीं है' ...यह निर्मल वर्मा कहते हैं और यह भी कि 'समय वहाँ - वहाँ है , जहाँ - जहाँ हम बीते हैं।'  फिर भी 'अपनी दुनिया' की  प्रचलित शब्दावली  में कहूँ तो बीते  दिनों की 'दूसरी दुनिया'  को याद करते हुए आज  कुछ कवितायें प्रस्तुत हैं :


०१- स्मृति

वह शहर
जहाँ एक झील थी
सतत रंग बदलती हुई।

यह शहर
जहाँ एक झील है श्वेत श्याम
स्मृतियों में जज्ब।

०२- अलबम

तस्वीरों में दिखतें है
चेहरे तमाम
याद आते हैं कुछ के नाम।

कुछ बेनाम
और कुछ ऐसे भी
जिनके लिए खोज न सका
अब तक कोई नाम।

०३- डायरी

कुछ शब्द
कुछ रेखायें
और ढेर सारा हाशिया।

बीते दिनों का
अनबीता बयान
एक संग्रहालय
स्वयं का स्वयं के लिए।


०४- टाइपराइटर

उदित होता था
एक जादू
जाना - पहचाना।

उंगलियाँ रखतीं थीं
कुंजीपटल पर अपने निशान
और कागज पर
उभरता जाता था अंत:साक्ष्य।

०५- चिठ्ठी

एक समय की बात

सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति
हुआ करता था डाकिया
और उसका थैला
मानो जादुई चिराग।
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4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह जनाब!
बहुत बढ़िया!
क्षणिकाओं में परिभाषाएँ अच्छी रहीं!

Rahul Singh ने कहा…

संक्षिप्‍त लेकिन अर्थपूर्ण.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वे घटनायें अपने अपने समय के साथ सबके व्यक्तित्व में चिपकी हैं।

Mukta Dutt ने कहा…

बेहतरीन कविताएँ।